आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी का फैसला सुनाते समय प्रधानमंत्री मोदी ने अवाम से 30 दिसंबर तक 50 दिन का समय मांगा था और कहा था,“ भाइयों और बहनों अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, मेरी कोई गलती रह जाए, मेरा कोई गलत इरादा निकल जाए, आप जिस चौराहे पर मुझे खडा करेंगे, मैं खडा होकर देश जो सजा देगा, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं“। प्रधानमंत्री जी गलती तो निकल गई है। नवंबर 2016 में विमुदीकरण अथवा नोटबंदी (डेमोनिटेजेशन) का फैसला उल्टा पड गया है। 2016 के विमुद्रीकरण से काला धन तो बाहर निकला नहीं, सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी। लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पडा। नगदी पर आश्रति ग्रामीण व्यवस्था की कमर टूट गई और अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुक गई । 500 और 2000 रुपए के नए नोट छापने के लिए सरकार खजाने पर खामख्वाह का बोझ पडा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई)की ताजा रिपोर्ट से नोटबंदी पर सरकार के सारे दावों की हवा निकल गई है। आरबीआई के अनुसार नवंबर 2016 की नोटबंदी की 99.3 फीसदी मुद्रा आरबीआई के पास वापस पहुंच गई है और पुराने 500 और 1000 रुपयों के मात्र 10,270 करोड रु लौटाए नहीं गए हैं। जाहिर है सरकार को नोटबंदी से काला धन बाहर निकालने की जितनी उम्मीद थी, उसकी तुलना में 10,270 करोड रु “ऊंट के मुंह में जीरा“ जैसा है। नोटबंदी से कहीं ज्यादा असरदार जून, 2016 में शुरु की गई स्वेच्छा से काला धन घोशित करने की योजना सफल रही है। इसके तहत जून से अक्टूबर, 2016 तक 65,250 करोड रु का काला धन बाहर आ गया था। यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि इस योजना के फौरन बाद नवंबर, 2016 में नोटबंदी करने का क्या औचित्य था? सरकार को 500 और 2000 रु के नए नोट छापने के लिए 12877 करोड रु (2016-17 में 7,965 करोड, 2017-18 में 4,912 करोड रु) खर्च करने पडे। बहरहाल, जमीनी हकीकत यह है कि नोटबंदी अब काला धन बाहर निकालने का कारगर उपाय नहीं रह गया है। काले धन में नगदी का अंश ज्यादा से ज्यादा एक फीसदी रहता है। अधिकांश काला धन देश -विदेश में संपत्ति खरीदने, सोना और आभूषणों और हवाला के जरिए विदेशी बैंकों में छिपा कर रखा जाता है। देश में पहली बार 1946 में 1000 और 10,000 रुपए की नोटबंदी की गई थी। तब फिरंगियों का शासन था, इसलिए इसका अच्छा असर हुआ था। आठ साल बाद 1954 में 1000, 5000 और 10,000 रु के नोट निकाले गए थे। 1978 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता सरकार ने 1000, 5000 और 10,000 रु का विमुद्रीकरण करके इनके चलन को बंद कर दिया। तब देश में कुल मुद्रा का दस फीसदी 5000 और 10,000 रु के नोटों में जमा हो रखा था और इस धन को काला धन माना गया था। नोटबंदी का असर भी हुआ और यह काला धन (दस फीसदी) बेकार हो गया था। 1978 की तुलना में 2016 की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। 2016 में कुल मुद्रा का 87 फीसदी 500 और 1000 रुपयों में जमा था। यह नगदी देश के 25 करोड मध्यम और निम्न मध्यम के पास नगदी के रुप में खर्च के लिए जमा थी। और उनकी गाढी कमाई का हिस्सा था। नतीजतन, इन तबकों को सबसे ज्यादा कष्ट सहने पडे। अब जनता को फैसला करना है।
शनिवार, 1 सितंबर 2018
नोटबंदी : देश जो सजा देगा, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं“
Posted on 10:18 am by mnfaindia.blogspot.com/






