कांग्रेसियों ने इन दिनों मोदी सरकार पर एक जुमला गढ रखा है, “लोग पस्त, सरकार मस्त“। कांग्रेस की यही नौटंकी विपक्ष में रहते हुए भाजपा भी किया करती थी। न तो कांग्रेस शासन में और न अब मोदी राज में लोगों के “अच्छे दिन“ लाने की किसी को फुर्सत है। सियासी दलों को सिर्फ और सिर्फ वोट की चिंता खाए रहती है, और उनकी सारी “फच्छकडियां" इसी मकसद से की जाती हैं। ्पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान को छू रही है। भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है और महंगाई बढ रही है। कमजोर रुपए के कारण सेंसेक्स-निफ्टी में पहली बार छह माह की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई है। लोगों के लगातार “बुरे दिन“ चल रहे हैं मगर केन्द्र और राज्य की सरकारें लोगों को लूटने में लगी हुई है। महानगर मुंबई में पेट्रोल की कीमत 90 रु लीटर के आसपास पहुंच गई है। मंगलवार को मुंबई में पेट्रोल 88.26 रु लीटर और दिल्ली में 80.87 रु लीटर बिक रहा था। पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार बढ रही है। कच्चे तेल की मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर तेल कंपनियों को कच्चे तेल की लागत लगभग 43 रु लीटर आ रही है। बाकी सब शुल्क (वैट समेत) के रुप में केन्द्र और राज्य सरकारों की जेब में जा रहा है। पेट्रोल-डीजल पर शुल्क-दर-शुल्क लगाकर सरकार तो मालामाल हो रही है पर लोग-बाग बेहाल हो रहे हैं। आखिर कब तक जनता सियासी नेताओं की खडमस्तियों का बोझ ढोती रहेगी? 2014 से अब तक मोदी सरकार 12 बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढा चुकी है और 11 लाख करोड रु से ज्यादा कमा चुकी है। 2016 में कच्चे तेल की कीमतें न्यूनतम स्तर (29 डॉलर बैरल) तक गिरने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं घटाए। तब लोगों को झांसा दिया गया कि जब कभी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढेंगी, सरकार उत्पाद शुल्क घटा देगी। मगर अब सरकार मुकर रही है। कह रही है, ऐसा करना मुमकिन नहीं है क्योंकि इससे विकास के लिए पैसा कम पड जाएगा। मानो जैसे सरकारी खजाने की पाइ-पाई जन विकास पर खर्च की जा रही है। सच्चाई यह है कि अपने शाही खर्चे पूरे करने के लिए सरकार लोगों की जेब काटने का कोई मौका नहीं छोडती। इस मामले सब एक जैसे हैं। पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें के लिए मोदी सरकार को घेरने वाली कांग्रेस सरकारें भी वही कर रही है जो भाजपा सरकारें कर रही हैं। कांग्रेस शासित पंजाब और कर्नाटक में भी वैट कम नहीं किया गया है। कांग्रेस को अगर लोगों की इतनी ही चिंता होती, तो पेट्रोल-डीजल पर कांग्रेस शासित राज्यों में वैट कम करती। उत्पाद शुल्क के साथ-साथ पेट्रोल पर 27 फीसदी और डीजल पर 16.75 फीसदी वैट (हर राज्य में अलग-अलग) लगता है। कुल मिलाकर राज्यों को एक लीटर पेट्रोल से 27.85 रु और डीजल से 10.41 रु (सोमवार की कीमत) मिल रहा है। न तो केन्द्र और न ही राज्य इस विषाल राजस्व को छोडने के लिए तैयार है। इसीलिए, पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत नहीं ला जा रहा है क्योंकि ऐसा करने से केन्द्र से ज्यादा राज्यों को राजस्व का मुकसान हो सकता है। सब सियासी नौटंकीबाज हैं। लोगों की किसी को कोई चिंता नहीं है। मोदी सरकार मौका देख रही है और मुमकिन है लोकसभा चुनाव अथवा इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंर्तगत लाकर कुछ राहत दे। तब तक कुढते, झुंझलाते रहिए!
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