बुधवार, 12 सितंबर 2018

नेशनल हेराल्डः न मुख पत्र और न ही समाचार पत्र, कैसे चलता!

नेहरु परिवार से संबंधित समाचार पत्र नेशनल हेराल्ड इन दिनों चर्चा में है।  पेट्रोल-डीजल की बढती कीमतों की आग में कांग्रेस को राजनीतिक रोटियां सेंकने से रोकने के लिए भाजपा ने नेशनल हेराल्ड का मुद्दा उछाला है। “सास भी कभी बहू थी“ टीवी सीरियल कलाकार से केन्द्रीय कपडा मंत्री बनी स्मृति ईरानी ने मंगलवार को इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर जमकर प्रहार किए। सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और “राजमाता“ सोनिया गांधी की आयकर निर्धारण मामले को चुनौती देने वाला याचिका खारिज कर दी। सोनिया और राहुल ने  याचिका में 2011-12 में दायर आयकर रिटर्न  की फाइल को दोबारा खोलने की आयकर विभागीय कार्रबाई   को चुनौती दी थी। अदालत ने  व्यवस्था दी है कि आयकर विभाग को किसी भी आयकर मामले की दोबारा जांच करने का पूरा हक है। राहुल गांधी ने अपनी रिटर्न  में यह जानकारी छिपाई थी कि 2010 से वे 'यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' कंपनी के निदेशक भी थे।  निदेशक बनने के कारण उनकी आय 154 करोड रु थी मगर रिटर्न  में उन्होंने मात्र 68 लाख रु दिखाई थी। जाहिर है आयकर बचाने के लिए यह जानकारी छिपाई गई । स्मृति ईरानी ने इस पर कांग्रेस को काफी खरी-खोटी सुनाई। कहा“ जो शख्स देश  का प्रधानमंत्री बनने का ख्याब देख रहा है, वह अगर अपनी आय छिपाए, तो कैसे चलेगा देश  “।  मामला भाजपा के  वरिष्ठ  नेता सुब्रामनयम स्वामी ने उठाया था। स्वामी का आरोप था कि नेशनल हेराल्ड  को चलाने वाली कंपनी एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड (एजेएल) ने कांग्रेस पार्टी से  90.25 करोड रु का कर्जा  लिया था जो कभी लौटाया ही नहीं गया। इतना ही नहीं नवंबर, 2010 में 50 लाख रु की पूंजी से यंग इडिया नाम की एक कंपनी खोली गई और इस कंपनी ने एजेएल के सारे शेयर्स खरीद लिए।  एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड के पास उस समय  5000 करोड रु की विशाल संपत्ति थी। अदालत ने माना कि मामला तो बनता है। बहरहाल, 1937 में बनाई गई  एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड कंपनी ने 1938 में अंग्रेंजी अखबार नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन शुरु किया था । बाद में हिंदी में ”नवजीवन” और उर्दू में ”कौमी आवाज” अखबार भी निकाले गए। जवाहर लाल नेहरु नेशनल हेराल्ड के पहले संपादक थे। आजादी के बाद जब तक कांग्रेस का जलवा रहा, अखबार को बत्तेरे विज्ञापन मिलते रहे और तीनों चलते रहे। इसके बावजूद नेशनल हेराल्ड ने कई उतार-चढाव देखे। वित्तीय संकट के कारण अखबार् सबसे पहले 1940 में अखबार का प्रकाशन बंद करना पडा। फिर, 1977 में बंद हो गया। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के बावजूद 2008 में अखबार फिर  बंद हो गया और आठ साल  2016 में  इसका  प्रकाशन  फिर  शुरु किया गया और जैसे-तैसे चल रहा है। आजादी से पहले की अवधि को छोडकर, सरकारी संरक्षण के बावजूद ये अखबार चले ही नहीं। यहां तक कि कांग्रेसी भी इस अखबार को नहीं पढते हैं।  चटपटी, मसालेदार खबरों और रोचक साम्रगी से ही अखबार पठनीय बनता है। नेशनल हेराल्ड मूलतः कांग्रेस का मुख पत्र है। आजादी से पहले यह इसीलिए चला क्योंकि तब अखबार आजादी के लिए लडने वाले सेनानियों का मुख पत्र था। आजादी को लेकर कुछ भी छपता, तब पाठक इसे हाथों-हाथ ले लेते। आजादी के बाद कांग्रेस ने फिरंगियों का चोला ओढ लिया । पार्टी अब सेनानियों की बजाए बिचौलियों, ठेकेदारों और सता-लोलुप नेताओं का जमावडा बन गया। न तो कांग्रेस की कोई  स्पष्ट  विचारधारा थी और न ही राजनितिक  दर्शन । इसी असमंजस में नेशनल हेराल्ड न तो कांग्रेस का मुख पत्र ही बन पाया और न ही लोकप्रिय सामाचार पत्र।  आजादी के बाद से, खासकर सतहर के दशक के बाद यह सरकारी विज्ञापन बटोरने और नेहरु-गांधी परिवार के लिए संपत्ति जोडने का जरिया बन गया।