कानून को जेंडर न्यूट्रल होना चाहिए और इसका इस्तेमाल लिंग भेदभाव के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कानून सबके लिए एक बराबर होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण से जुडे मामले में बुधवार को अहम व्यवस्था दी। जस्टिस मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा है कि यौन शोषण से पीडित बालकों को भी ठीक वही मुआवजा दिया जाए, जैस पीडित बच्चियों को दिया जाता है। अदालत ने कहा है कि “जीवन अनमोल है और कोई भी अदालत रुपए-पैसे की दृष्टि से उसका आकलन नहीं कर सकती“। यौन शोषण के शिकार पीडितों के मुआवजे पर बनी योजना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह व्यवस्था दी। अदालत ने नेशनल लीगल सर्विस ऑथॉरिटी (नाल्सा-एनएएलएसए) की मुआवजा योजना को पूरे देश में दो अक्टूबर से लागू करने के आदेश भी दिए हैं। इस साल मई माह में नाल्सा द्वारा यौन शोषण और एसिड अटैक के पीडितों को मुआवजा योजना को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मदन लोकुर वाली खंडपीठ ने स्वीकार कर लिया था। जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण से पीडित बालकों को नाल्सा स्कीम में लाने के लिए जरुरी संशोधन के आदेश दिए थे। नेशनल लीगल सर्विस ऑथॉरिटी ने सामूहिक बलात्कार की शिकार पीडिता को कम-से-कम पांच लाख और अधिकतम दस लाख रु मुआवजा निर्धारित किया है। बलात्कार और अप्राकृतिक यौन शोषण की शिकार पीडिता को कम-से-कम चार और अधिकतम सात लाख रु मुआवजा दिया जाएगा। एसिड अटैक से पूरी तरह से झुलसी महिला को सात से आठ लाख रु और 50 फीसदी पीडित महिला को कम से कम पांच और अधिकतम आठ लाख का मुआवजा तय किया गया है। आम तौर पर यौन शोषण और एसिड अटैक की शिकार महिलाएं होती हैं, इसलिए नाल्सा मुआवजा योजना में बालकों और पुरुषों का कोई उल्लेख नहीं है। मगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनएएलएसए मुआवजा योजना को पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिस) के तहत चल रहे सभी मामलों के लिए अनिवार्य कर दिया है, इसलिए यौन शोषण से पीडित बालक भी मुआवजे के हकदार होंगे। अदालत ने कहा है कि मुआवजा योजना जेंडर न्यूट्रल होनी चाहिए। पोक्सो कानून में चूंकि व्यस्क पुरुष नहीं आते हैं, इसलिए एसिड अटैक से पीडित पुरुषों को अभी भी मुआवजा योजना से बाहर हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से पुरुषों पर भी एसिड अटैक हो रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 30 से 40 फीसदी एसिड अटैक पुरुषों पर होते हैं। एसिड सरवावर्स ऑफ इंडिया के अनुसार 35 फीसदी एसिड अटैक पुरुषों पर होते हैं। ्इस स्थिति में व्यस्क पुरुषों को नाल्सा मुआवजे से बाहर रखना लिंग तट्स्थ (जेंडर न्यूट्रल) योजना नहीं मानी जा सकती। 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाए जाने के बावजूद एसिड अटैक रुके नहीं है। 2014 में देश भर में 225, 2015 में 247 और 2016 में 307 एसिड अटैक किए गए हैं। 1 जनवरी से अब तक पुरुषों पर 18 एसिड अटैक हो चुके हैं। एसिड अटैक से पीडित पुरुशों को भी नाल्सा जैसा मुआवजा दिलाने के लिए एसिड अटैक से पीडित व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस साल फरवरी में इस पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए थे। इस जुलाई में अदालत ने इस याचिका को मुआवजे पर् चुनौती देने वाली याचिका के साथ ही जोड दिया था। बुधवार को अदालत ने नाल्सा योजना को जेंडर न्यूट्रल बताते हुए व्यवस्था दी कि यय योजना पुरूश और महिला दोमों पर एक समान लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा दिषा-निर्देष तक तक लागू रहेंगे जब तक केन्द्र यौन पीडितों और एसिड अटैक के लिए मुआवजे पर स्पश्ट नीति नहीं बनाती।
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