रविवार, 9 सितंबर 2018

ऐसे हो सकती है निर्भीक पत्रकारिता

पत्रकारिता के मौजूदा दौर   को लेकर सोशल मीडिया, परिचर्चाओं और सार्वजनिक मंचों पर अक्सर यही सुनने को मिलता है कि इसका स्तर उत्तरोतर गिरता जा रहा है। पत्रकारों में अब पहले जैसा जज्बा नहीं रह गया है और न ही बीजी वर्गीज, इंद्र मल्होत्रा, एस निहाल सिंह, राजेन्द्र माथुर, कन्हैया लाल नंदन सरीखे दबंग पत्रकार रह गए हैं। अखबार अब ब्रांड बन गए हैं और संपादक नाम का प्राणी मालिकों का पीआरओ। न्यूज चैनल्स  को बस टीआरपी की पडी रहती है। 'मुनाफे के पीर' अखबार मालिकों में  सरकार से पंगा लेने की हिम्मत ही नहीं है। अगर विष्वास नहीं होता है तो एनडीटीवी और एबीपी  के मालिकों  से पूछ लें। जब तक समाचार पत्र और इलेक्ट्रानिक मीडिया पूंजीपतियों के चंगुल और विज्ञापन के लिए सरकारी नियंत्रण में रहेगें, निष्पक्ष  और दबंग पत्रकारिता हो ही नहीं सकती। दबंग और निर्भीक  पत्रकारिता से अखबार मालिकों के पेट में मरोड उठने लग जाते हैं। हर समाचार पत्र मालिक रामनाथ गोयनका नहीं हो सकता।  गोयनका में निर्भीक पत्रकारिता को लेकर जबरदस्त जज्बा था और पत्रकारिता को छोड़कर उनका और कोई बड़ा व्यवसाय भी नहीं था।  तरह-तरह के  व्यापार से जुड़े समकालीन अखबार मालिकों में  वैसा  जज्बा हो ही  नहीं सकता ।   अस्सी के दशक में इंडियन एक्सप्रैस ने जब रिलायंस इंड्स्ट्री बनाम बाम्बे डाइंग का मुददा उठाया था,  तब चुनौती बतौर अंबानी  ग्रुप  ने अपना इग्लिश  अखबार निकाला था।  इस अखबार में एक्सप्रैस के खोजी पत्रकारों को मोटा वेतन देकर तोडा गया मगर यह अखबार चल ही नहीं पाया। इसकी प्रमुख वजह थी कि अंबानी का व्यापार  बहुत ज्यादा फैला  था और इसके मालिकों  में  सरकार से  पंगा  लेने का माद्दा ही नहीं था और रामनाथ गोयनका जैसी  खोजी पत्रकारिता का जज्बा भी नहीं था।  प्रणय राय, बरखा दत्त, एम जे अकबर, करण थापर राजदीप सरदेसाई  जैसे नामी पत्रकारों ने तो पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए हैं। दुनिया में निजी क्षेत्र में अखबार एकमात्र  ऐसा उत्पाद है जो अपनी लागत से कहीं कम दाम पर बिकता। मौजूदा समय में कम-से-कम  (16 पन्नों) के अखबार की एक प्रति की लागत 20 रुपए से कम नहीं है मगर इसे ज्यादा से ज्यादा  तीन रुपए में बेचा जाता है। बाकी 17 रुपए विज्ञापन से आते हैं और विज्ञापन तब मिलते हैं जब अखबार की ज्यादा से ज्यादा प्रसार संख्या हो। जितनी ज्यादा प्रसार संख्या होगी, घाटा उतना ही बढेगा। घाटा पाटने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा विज्ञापन की दरकार होती है।  अखबारों की आर्थिकी का यह ताना-बाना पूंजीपतियों के ही वश  की बात है। और जब तक यह ताना-बाना रहेगा, अखबार आत्म-निर्भर नहीं बन सकता। अखबारों को पूंजीपतियों  और मुक्त करने का एक ही विकल्प है। अखबार को उत्पादन लागत पर ही बेचा जाए। यानी अखबार की औसत कीमत  20 रुपए है तो इसे इतनी ही कीमत प्लस एजेंट की कमीशन (लगभग 25 रु) में बेचा जाए और अखबार पूरी तरह से विज्ञापन मुक्त हो जाए़ं। इसमें पाठकों का  ही फायदा है । उन्हें विज्ञापनों से भरपूर पन्नों से मुक्ति मिल जाएगी और ज्यादा पठनीय सामग्री मिलेगी। निसंदेह, मार्केट और ताजातरीन उत्पादों की जानकारी भी उतनी  ही  जरुरी  है, जितने ताजा समाचार मगर इसके लिए भ्रामक विज्ञापनों की जगह समाचार पत्रों की  सामग्री ज्यादा विश्वसनीय होती  है । देश  के कई अखबारों में इन दिनों फैशन से लेकर नए   उत्पाद, इनोवेशन और प्रोन्नत तकनीक की ऐसी ताजा जानकारी दी जा रही है जो विज्ञापनों नें भी नहीं होती है। मगर,कहना आसान है, करना बेहद  मुश्किल ।   आजादी से पहले कुछ इस तरह का चलन था मगर यह  कमर्सिअली   फला-फूला नहीं। तब पत्रकारिता मिशन  हुआ  कराती थी, व्यापार नहीं और जिस व्यवसाय में प्रॉफिट न हो, वहां व्यापारी झांकते भी नहीं है। समकालीन भारत में पाठकों की मानसिकता में यह बात रच-बस गई है कि अखबार तो सस्ते में ही मिलते हैं और उन्हें महंगे दामों पर खरीदने की क्या जरुरत?   पाठकों  को इस  मानसिकता   बाहर निकलना  होगा।   बहरहाल, प्रबुद्ध पाठकों को इस पर मंथन करना चाहिए। मेरे इस ख्यालीपुलावी विचार से जो भाई लोग सहमत हैं, उन्हें इसे आगे बढाना चाहिए। जय भारत, जय निर्भीक-निष्पक्ष  पत्रकारिता।