सोमवार, 24 सितंबर 2018

मालदीव का सबक

मालदीव के  राष्ट्रपति   चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार की जीत  भारत में निरंकुश  शासन के पैरवीकारों के लिए कडा सबक है। लोकतंत्र में जनता की आवाज को कानून और सत्ता की ताकत से भी नहीं दबाया जा सकता।  भारत के घुर विरोधी और चीन समर्थक निवर्तमान राष्ट्रपति  अब्दुला यामीन (पूरा नाम अब्दुला यामीन अब्दुल गयूम) को विपक्ष के उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने परास्त कर दिया है। सोलिह को भारत समर्थक माना जाता है। इस रविवार को सपन्न हुए राष्ट्रपति   चुनाव  के लिए श्रीलंका और मलेशिया में मतदान केन्द्र बनाए गए थे।  मालदीव हिंद महासागर में लगभग चार लाख की आबादी वाला एक छोटा सा मुल्क है। अपनी ब्लू लैगून और व्हाइट तटों (बीचिच) के लिए जाना जाता है। कुल मिलाकर 1190 द्वीप हैं मगर  198 में ही आबादी बसती है। मालदीव की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर आश्रित है। इस देश  का  28 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और 60 फीसदी विदेशी   मुद्रा पर्यटन से सृजित होती है।  हिंद महासागर में स्थित होने के कारण यह छोटा सा मुल्क   भारत के लिए सामरिक  दृष्टि  से बेहद अहम है। 1966 में फिरंगियों के  शासन से आजाद होने के बाद से मालदीव के भारत के साथ प्रगाढ संबंध रह हें मगर  2013 में  अब्दुला यामीन के सत्ता में आने के बाद से भारत के साथ  रिश्ते  बिगडते ही गए। यहां तक कि यामीन ने भारत द्वारा भेजे गए दो हेलिकॉप्टर भी लौटा दिए और मालदीव में भारतीय कंपनियों के कॉन्ट्रेक्ट भी रदद कर दिए  । सता में आने के बाद  यामीन ने ऐसे कानून बनाए जिनसे विरोधियों और आलोचकों को जेल में ठूंस दिया गया और अनेक देश  छोडकर भाग गए। राष्ट्रपति  का विरोध करने वाले सांसदों को भी गिरफ्तार कर लिया जाता। यामीन ने न्यायपालिका को भी अपनी मुठ्ठी में कर लिया। इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट  के पांच जजों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति   को राजनीतिक बंदियों को रिहा करने के आदेश  दिए थे। इन आदेशों  को मानने की बजाए यामीन ने देश   में इमरजेंसी लगा दी और जजों को भी जेल में ठूंस दिया था। यामीन का झुकाव चीन की तरफ था, इसीलिए उन्होंने भारत की हर मदद को ठुकराया। 2011 तक माले (मालदीव की राजधानी) में चीनी दूतावास तक नहीं था मगर अब वहा बीजिंग के मिल्ट्री बेस बनाने की तैयारियां चल रही है। बहरहाल, जिस तरह से यामीन ने अधिकतर संस्थाओं पर अपना शिकंजा कस रखा था, उससे  माना जा रहा था कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार भी उन्ह हरा नहीं पाएगा, मगर जनता सबसे ज्यादा ताकतवर निकली और तानाशाह यामीन हार गया। यही लोकतंत्र है। मालदीव चुनाव भारत के  लिए भी  सबक है।