मोबाइल ( वायरलेस टेलिफोन)) के प्रति लोगों, खासकर युवाओं की दीवानगी देखकर चिंता होने लगती है। बडे-तो-बडे, बच्चे भी दिन-रात सेल फोन से चिपके रहते हैं। यह प्रवृति बच्चों के समग्र विकास के लिए बेहद खतरनाक है। मोबाइल फोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। इसकी घंटी न भी बजे, तो भी हम मैसेज, रिमाइंडर,अलर्ट के लिए बार-बार मोबाइल का प्रयोग करते हैं। सेल फोन रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी (नॉन-आयोनाइजिंग रेडियन) उत्सर्जित करता है। इससे कैंसर हो सकता है। रेडियो वेवज शरीर के ऊतकों (टिस्सुस ) को नुकसान पहुंचाते हैं और यह अंत्तोगत्वा कैंसर का कारण बनता है। दुनिया में कैंसर का अभी तक कोई तसल्लीबख्श उपचार नहीं है। विभिन्न अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि मोबाइल के अत्याधिक प्रयोग से कैंसर के अलावा दिल की बीमारी, बहरापन, स्ट्रेस, सरदर्द, मेमॉरी लॉस जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं। रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी को बार-बार कान के पास ले जाने से, जैसा कि अक्सर मोबाइल फोन प्रयोग करते समय होता है, चेहरे पर मुहांसे निकलना और खुजली होना तो आम बात है। अध्ययन मे यह भी पता चला है कि भारत में यूजर व्हटसप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ऐपस पर अपना 70 फीसदी समय व्यतीत करते हैं। भारत में हर रोज यूजर कम-से-कम 200 मिनट के लिए सेल फोन का प्रयोग जरुर करता है। भारत में पचास फीसदी बच्चे और टीनऐजर्स सेल फोन का अत्याधिक प्रयोग करते हैं। हैल्थ एक्सपेर्ट इसे बहुत ज्यादा मानते हैं। स्वीडन की गोथनबर्ग यूनिवर्सिटी में मोबाइल यूजर्स पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि सेल फोन की हाई फ्रीक्वेंसी का स्ट्रेस लेवल पर बहुत बुरा असर पडता है और इससे मानसिक रोग की समस्या खडी हो सकती है। भारत में स्मार्टफोन की लोकप्रियता बढने से युवाओं के पथभ्रष्ट होने का खतरा भी बढ रहा है। भारत पश्चिम की तरह उदार समाज नहीं है और हमारा सामाजिक ताना-बाना अभी भी यथावत है। इंटरनेट पर अश्लील वीडियो, सीन्स और सामग्री युवाओं को पथभ्रष्ट करने के लिए पर्याप्त है। युवाओं को इन सब से दूर रखने के लिए अभिभावक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। भारत में युवाओं को संस्कारित शिक्षा-दीक्षा देने की जरुरत है। पश्चिम की अंधी नकल करना हमारे सुदृढ सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस कर रही है।
सोमवार, 17 सितंबर 2018
खतरनाक है मोबाइल की दीवानगी
Posted on 11:43 am by mnfaindia.blogspot.com/
मोबाइल ( वायरलेस टेलिफोन)) के प्रति लोगों, खासकर युवाओं की दीवानगी देखकर चिंता होने लगती है। बडे-तो-बडे, बच्चे भी दिन-रात सेल फोन से चिपके रहते हैं। यह प्रवृति बच्चों के समग्र विकास के लिए बेहद खतरनाक है। मोबाइल फोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। इसकी घंटी न भी बजे, तो भी हम मैसेज, रिमाइंडर,अलर्ट के लिए बार-बार मोबाइल का प्रयोग करते हैं। सेल फोन रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी (नॉन-आयोनाइजिंग रेडियन) उत्सर्जित करता है। इससे कैंसर हो सकता है। रेडियो वेवज शरीर के ऊतकों (टिस्सुस ) को नुकसान पहुंचाते हैं और यह अंत्तोगत्वा कैंसर का कारण बनता है। दुनिया में कैंसर का अभी तक कोई तसल्लीबख्श उपचार नहीं है। विभिन्न अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि मोबाइल के अत्याधिक प्रयोग से कैंसर के अलावा दिल की बीमारी, बहरापन, स्ट्रेस, सरदर्द, मेमॉरी लॉस जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं। रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी को बार-बार कान के पास ले जाने से, जैसा कि अक्सर मोबाइल फोन प्रयोग करते समय होता है, चेहरे पर मुहांसे निकलना और खुजली होना तो आम बात है। अध्ययन मे यह भी पता चला है कि भारत में यूजर व्हटसप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ऐपस पर अपना 70 फीसदी समय व्यतीत करते हैं। भारत में हर रोज यूजर कम-से-कम 200 मिनट के लिए सेल फोन का प्रयोग जरुर करता है। भारत में पचास फीसदी बच्चे और टीनऐजर्स सेल फोन का अत्याधिक प्रयोग करते हैं। हैल्थ एक्सपेर्ट इसे बहुत ज्यादा मानते हैं। स्वीडन की गोथनबर्ग यूनिवर्सिटी में मोबाइल यूजर्स पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि सेल फोन की हाई फ्रीक्वेंसी का स्ट्रेस लेवल पर बहुत बुरा असर पडता है और इससे मानसिक रोग की समस्या खडी हो सकती है। भारत में स्मार्टफोन की लोकप्रियता बढने से युवाओं के पथभ्रष्ट होने का खतरा भी बढ रहा है। भारत पश्चिम की तरह उदार समाज नहीं है और हमारा सामाजिक ताना-बाना अभी भी यथावत है। इंटरनेट पर अश्लील वीडियो, सीन्स और सामग्री युवाओं को पथभ्रष्ट करने के लिए पर्याप्त है। युवाओं को इन सब से दूर रखने के लिए अभिभावक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। भारत में युवाओं को संस्कारित शिक्षा-दीक्षा देने की जरुरत है। पश्चिम की अंधी नकल करना हमारे सुदृढ सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस कर रही है।






