मंगलवार, 4 सितंबर 2018

गुरुओं को सलाम

“अध्यापक मोमबती की तरह होता है, जो ज्ञान की रोषनी फैलाने के लिए खुद ही पिघलता रहता है“, आधुनिक तुर्की के निर्माता कमाल अतातुर्क उर्फ  मुस्तफा कमाल पाशा  का यह कथन हमेशा  प्रासंगिक रहेगा। अध्यापक देश  के निर्माता होते हैं और जितना उनका सम्मान होगा, देश  का  भविष्य  उतना ही उज्जवल होगा। कहते हैं “गुरु बिना ज्ञान नहीं“ अथवा “गुरु बिन ज्ञान अधूरा“। दुनिया की  शीर्ष  हस्तियां भी इस बात को स्वीकारती हैं। युग पुरुष   महात्मा गांधी के जीवन और सोच पर उनके आध्यात्मिक गुरु श्रीमद्य राजचन्द्र का गहरा प्रभाव रहा है। अहिंसा और सत्याग्रह के मूल्यों का आदर करना  महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु से ही सीखा था।  माइक्रोसोफ्ट कंपनी के संस्थापक और  दुनिया के सफलतम कारोबारी बिल गेटस ने अपनी माता, नानी के साथ-साथ अपनी टीचर ब्लांश  कैफीरे को उन्हें  टॉप मुकाम तक पहुंचाने का श्रेय दिया हे। बिल गेटस के मुताबिक अगर उनकी टीचर  कैफीरे उन्हें प्रेरणा नहीं देती, तो वे भी आम छात्र की तरह ही रह जाते। देश  के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु पर उनके बाल्यकाल के अध्यापक एफ टी ब्रुक्स  और उनके राजनीतिक गुरु महात्मा गांधी  का प्रभाव रहा है।  चाणक्य से लेकर डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन  और एपीजे कलाम तक भारत में दुनिया के  सर्वोतम  अध्यापक रहे हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विकेका नंद, सावित्री फुले आज भी भारत के प्रेरणास्त्रोत हैं।  भारत को ऋषि -मुनियों एव प्रकांड  विद्वानों  का  ज्ञान का सागर माना जाता है और  अध्यापकों  को यहां मां-बाप बराबर का दर्जा दिया जाता है। प्राचीन भारत में गुरुकुल  शिक्षा पद्धति का दुनिया भर में सिक्का चलता था। इस  शिक्षा पद्धति के तहत छात्रों को घर-परिवार से बहुत दूर आश्रमों में रहकर शिक्षा दी जाती थी। 8 साल की आयु में छात्रों को  गुरुकुल में प्रवेश  दिया जाता और 25 साल की आयु तक उन्हें सख्त अनुशासन में कई विधाओं में पारंगत किया जाता। गुरुकुल के विख्यात प्राचार्यों से  शिक्षा ग्रहण वाले छात्रों का देश -विदेश  में सम्मान किया जाता था। मर्यादा पुरुषोतम राम ने ऋषि  वशिष्ठ  और पांडवों ने ऋशि द्रोणाचार्य से आश्रम में रहकर  शिक्षा ग्रहण की थी। रामायण काल में ऋषि  वशिष्ठ  और भारद्वाज मुनि के बृहद आश्रम और इनके गुरुओं की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। प्राचीन भारत में जात-पात और वर्ण  भेद का वर्चस्व के बावजूद गुरुकुल में हर छात्र को बराबर का दर्जा  दिया जाता और राजकुमार से लेकर गरीब परिवार के छात्र को एक जैसा ज्ञान दिया जाता। तब गुरुकुल की पढाई निशुल्क हुआ करती थी और बडे गुरुकुल तो खुद कमाई करके काफी हद तक आत्म निर्भर होते थे। ग्रुरुकुल आश्रम के छात्र  शास्त्रों से लेकर हथियार चलाने में भी पारंगत होते थे । कालांतर में  शिक्षा के  “व्यापारीकरण“ ने गुरुकुल  पद्धति  का भी वही हश्र किया जो अन्य शिक्षा पद्धतियों का हुआ है।  यूनिवर्सिटीज और  स्कूल-कॉलिजों को आत्म- निर्भर बनाना बुरी बात नहीं है मगर शैक्षणिक संस्थाओं को “ शिक्षा की दुकान“ बनाना बेहद खतरनाक है। दुखद स्थिति यह है कि पूंजीपति व्यवस्था में  शिक्षक और  शैक्षणिक संस्थाएं दोनों ही “धन कमाने“ के नित नए-नए तरीके ईजाद कर  रहे हैं। एक जमाना था जब अध्यापक पढाई में कमजोर छात्रों को घर बुलाकर  मुफ्त में पढाया करते  मगर अब इसकी जगह ट्यूशन धंधा बन चुका है और इसके नाम पर बडी-बडी दुकानें चलाईं जा रही हैं। देश  में कोचिंग का धंधा पूरी तरह से उधोग के रुप में स्थापित हो चुका है। बडे-बडे कोचिंग इंस्टीटयूट्स सालाना अरबों रुपए का कारोबार कार रहे हैं। मगर सुखद स्थिति यह है कि देश  में आज भी इने-गिने अध्यापक जरुरतमंदों के लिए ज्ञान पुंज बनकर खडे हैं। ऐसे सच्चे, कर्मठ और समर्पित अध्यापकों को सलाम।