गुरुवार, 6 सितंबर 2018

पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप

भारत में उदारीकरण के बाद से  विकास की रफ्तार को तेज करने में  पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की अहम भूमिका रही है। सार्वजनिक पार्किंग से लेकर मेट्रो रेल तक, लगभग हर बडे क्षेत्र में सरकार ने वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए पीपीपी मॉडल को तवज्जो दी है।  शुरु में भारत को पीपीपी मॉडल के लिए काफी  रिस्की माना गया मगर जैसे-जैसे उदारीकरण ने अपने पंख फैलाए, पीपीपी मॉडल ने भी उडान भरनी शुरू  कर दी। 2018 में अब सरकार ने  नागरिक उडडयन (सिविल एविएशन) क्षेत्र में भी  पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप मॉडल को अपनाने का फैसला लिया है।   देश  में करीब सौ हवाई अडडे (एयरपोर्ट) बनाने के लिए अगले दस-पंद्रह सालों में 4.2 लाख करोड रु की जरुरत है और इतने  विशाल निवेश  के लिए पीपीपी ही एकमात्र विकल्प है। ज्यादा हवाई अडडे होंगे, तो अधिक हवाई सेवाएं उपलब्ध होंगी और हवाई सफर करने वालों की तादाद भी बढेगी।  इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) का आकलन है कि 2037 तक भारत में हर साल  520 मिलियन भारतीय यात्री हवाई सेवाओं का इस्तेमाल करेंगे। 2010 में हर साल 79 मिलियन यात्री हवाई सफर करते थे। 2017 में यह संख्या बढकर 158 मिलियन को पार कर गई थी। जाहिर है जैसे-जैसे हवाई सफर की सुविधाएं बढ रही है, यात्रियों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। अगले दस सालों में भारत एयर ट्रेवल में दुनिया का तीसरा सबसे बडा मुल्क बन जाएगा और जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड और स्पेन को भी पीछे छोड देगा।  भारत में अभी इंफरास्ट्रक्चर की भारी कमी है और कोई भी देश  मजबूत बुनियादी सुविधाओं के बगैर आगे नहीं बढ सकता।  देश  में  सुढृढ़ इंफरास्ट्रक्चर  तैयार करने के लिए ही 70 खरब रुपयों (एक खरब डॉलर) की दरकार है। सरकार के पास इतने  वित्तीय संसाधन नहीं है। नब्बे के दशक में उदारीकरण के बाद  इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर में भी निजी निवेश  का रास्ता खुल गया था। भारत सरकार ने  पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत कई मह्त्वपूर्ण मॉडल अपनाए हैं। इनमें यूजर-फ्री आधारित बीओटी (बिल्ड एंड ट्रांसफर), परफोर्मेंस बेस्ड मैनेजमेंट एंड मेनटेंनेंस  और मोडिफाइड  डिजाइन-बिल्ड कांट्रटेक्ट  शा मिल है। केन्द्र सरकार ने  पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए कई कारगर कदम भी उठाए हैं। इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर में पीपीपी के लिए वाइबिलिटी गैप फंडिंग स्कीम को लागू किया गया है। इसके तहत इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस को बीस फीसदी तक वित्तीय मदद दी जाती है। 2006 में इंफरास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी (आईआईएफसीएल) का गठन किया गया। यह संस्था  इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस को लंबी अवधि के लिए ऋण मुहैया कराती है। 2007 में इंडिया इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डवलपमेंट फंड स्थापित किया गया। यह संस्था  इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का 75 फीसदी  डवलपमेंट खर्च  वहन  करती है। 2012 में भारत सरकार ने  इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस के लिए जमीन खरीद को और आसान बना दिया। सरकारी जमीन के निजी क्षेत्र आवंटन  पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया। भूमि ट्रांसफर को और सरल बनाया गया।  इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी की  शर्त  भी हटा ली गई। नतीजतन,  इंफरास्ट्रक्चर में निवेश  बढा है और विकास तेज हुआ है।  1990 के बाद से अब तक देश  में 824  पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप   प्रोजेक्टस सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। इनमें मुंबई मेट्रो, कोलकता का द्धितीय स्वामी विवेकानंद ( अब सिस्टर निवोदिता) ब्रिज और भूमिगत पार्किंग प्रमुख हैं। मगर पीपीपी मॉडल कुछ जगह पूरी तरह से विफल रहा है। दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रैस मार्ग, वडोदरा-हलोल टोल प्राजेक्ट, दिल्ली एयरपोर्ट  मेट्रो एक्सप्रैस प्रमुख है। इनके अलावा वाटर और सेनिटेशन में भी पीपीपी मॉडल कामयाब नहीं रहा है जबकि इन क्षेत्रों में  पीपीपी की सबसे ज्यादा जरुरत है। गलतियों से सबक सीख कर पीपीपी मॉडल का दायरा और ज्यादा बढाने की जरुरत है।