भारतीय सेना के प्रराक्रम को कोटि-कोटि सलाम। पाकिस्तानी आतंकियों के अडडों पर भारतीय सेना के सटीक सर्जिकल ऑपरेशन से समस्त भारत का सीना 56 इंच चौडा हो गया है। देश भर में जश्न मनाया जा रहा है और आतिशबाजी की जा रही है। इस कार्रवाई ने शहीदों के परिजनों के जख्मों पर मलहम-पट्टी का काम किया है। सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल से कहीं आगे जाकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में दो किलोमीटर अंदर घुसकर आतंकियों के 7 ठिकानों को नेस्तानाबूद कर डाला और 38 आतंकियों को मार गिराया। सेना के इस् पराक्रम से 125 करोड भारतीयों के सीने में सुलग रही “बदले की आग““ काफी हद तक शांत हो गई है। यही तो देश चाहता था। उडी आतंकी हमले में शहीद हुए 19 सैनिकों का बलिदान जाया न जाए, पाकिस्तान को उसकी जुबान में जवाब देना लाजिमी था। देश की मांग थी कि जिस तरह जून 2015 को भारतीय सेना ने 40 मिनट के सर्जिकल ऑपरेशन में म्यांमार में घुसकर 35 आतंकियों को मार गिराया था, उसी तरह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को मार गिराया जाना चाहिए। और सेना ने वही किया। सेना पहले से इस कार्रवाई की ओर इशारा रकर रही थी। उडी आतंकी हमले के बाद सेना ने पाकिस्तान को साफ-साफ चेतावनी दी थी कि वह समय आने पर माकूल जवाब देगी। इस कार्रवाई से स्तब्ध और तिलमिलाया पाकिस्तान भले ही गला फाड-फाड कर इस सैन्य कार्रवाई को “छलावा“ बताए मगर सच्चाई छिपाए भी छिप नहीं सकती। पाकिस्तान की फरेबी फितरत के दृष्टिगत भारत ने पूरी कार्रवाई को कैमरे और वीडियो में रिकॉर्ड किया है। भारत ने इस सर्जिकल कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान को भी अवगत करा दिया गया था। भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिल्ट्री ऑपरेशन ले़, जनरल रणबीर सिंह ने साफ-साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान को जबाव देना बनता था। उडी आतंकी हमले के अलावा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों की घुसपैठ लगातार बढ रही थी। इसी माह 11 और 18 सितंबर को पूंछ और उडी में दो बडे हमले हुए। इस साल ब तक सेना पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों के 20 से ज्यादा घुसपैठ के प्रयास विफल कर चुकी है। पकडे गए आतंकियों ने अपने कबूलनामे में पाकिस्तान की सलिंप्तता को स्पष्ट शब्दों में बयां किया है। पाकिस्तान के उव्च अधिकारियों को इन कबूलनामों से अवगत भी कराया गया है और दूतावासीय असेस की सुविधा भी दी गई मगर इस्लामाबाद है कि अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 2004 को हुए करार के मुताबिक इस्लामाबाद ने नई दिल्ली को वचन दे रखा है कि वह अपनी जमीन को आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा। मगर पाकिस्तान हर बार अपने वायदे से मुकरता रहा है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं का सख्त पहरा रहता है। सेना और सरकार की मदद के बगैर पाकिस्तान से भारत में परिंदा तक पर नहीं मार सकता। जाहिर भारत में आने वाले आतंकियों को पाकिस्तान की हर तरह से भरपूर मदद मिल रही है और पाकिस्तानी सेना ही आतंकियों को भारत में घुसपैठ करा रही है। कोई भी देश ज्यादा देर तक इस स्थिति को सहन नहीं करेगा। बहरहाल, पाकिस्तानी आतंकियों के “लंचपैडस“ को नष्ट करने की भारतीय सेना की कार्रवाई से दो बातें स्पष्ट है। पहली यह है कि भारत अब “रक्षात्मक“ (डेफेसिंव“ की जगह अब “आक्रामक“ (ओफेसिंव) हो गया है। मोदी सरकार की यह नई रणनीति काबिलेतारीफ है। देश भी यही चाहता है। पाकिस्तान जैसे पांखडी और फितरती पडोसी से आक्रामक होकर ही निपटा जा सकता है। दूसरी यह कि भारत अपनी “संप्रभुता“ की रक्षा के लिए एलओसी को भी लांघ सकता है। आज तक भारत ने ऐसा नहीं किया था। मगर यह आक्रमक रणनीति भारत को युद्ध की भट्ठी में भी झोंक सकती है। पाकिस्तान चुप बैठने से रहा और भारत पर हमला कर सकता है। पूरे देश को इस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।
शुक्रवार, 30 सितंबर 2016
सेना के पराक्रम को सलाम
Posted on 7:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय सेना के प्रराक्रम को कोटि-कोटि सलाम। पाकिस्तानी आतंकियों के अडडों पर भारतीय सेना के सटीक सर्जिकल ऑपरेशन से समस्त भारत का सीना 56 इंच चौडा हो गया है। देश भर में जश्न मनाया जा रहा है और आतिशबाजी की जा रही है। इस कार्रवाई ने शहीदों के परिजनों के जख्मों पर मलहम-पट्टी का काम किया है। सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल से कहीं आगे जाकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में दो किलोमीटर अंदर घुसकर आतंकियों के 7 ठिकानों को नेस्तानाबूद कर डाला और 38 आतंकियों को मार गिराया। सेना के इस् पराक्रम से 125 करोड भारतीयों के सीने में सुलग रही “बदले की आग““ काफी हद तक शांत हो गई है। यही तो देश चाहता था। उडी आतंकी हमले में शहीद हुए 19 सैनिकों का बलिदान जाया न जाए, पाकिस्तान को उसकी जुबान में जवाब देना लाजिमी था। देश की मांग थी कि जिस तरह जून 2015 को भारतीय सेना ने 40 मिनट के सर्जिकल ऑपरेशन में म्यांमार में घुसकर 35 आतंकियों को मार गिराया था, उसी तरह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को मार गिराया जाना चाहिए। और सेना ने वही किया। सेना पहले से इस कार्रवाई की ओर इशारा रकर रही थी। उडी आतंकी हमले के बाद सेना ने पाकिस्तान को साफ-साफ चेतावनी दी थी कि वह समय आने पर माकूल जवाब देगी। इस कार्रवाई से स्तब्ध और तिलमिलाया पाकिस्तान भले ही गला फाड-फाड कर इस सैन्य कार्रवाई को “छलावा“ बताए मगर सच्चाई छिपाए भी छिप नहीं सकती। पाकिस्तान की फरेबी फितरत के दृष्टिगत भारत ने पूरी कार्रवाई को कैमरे और वीडियो में रिकॉर्ड किया है। भारत ने इस सर्जिकल कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान को भी अवगत करा दिया गया था। भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिल्ट्री ऑपरेशन ले़, जनरल रणबीर सिंह ने साफ-साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान को जबाव देना बनता था। उडी आतंकी हमले के अलावा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों की घुसपैठ लगातार बढ रही थी। इसी माह 11 और 18 सितंबर को पूंछ और उडी में दो बडे हमले हुए। इस साल ब तक सेना पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों के 20 से ज्यादा घुसपैठ के प्रयास विफल कर चुकी है। पकडे गए आतंकियों ने अपने कबूलनामे में पाकिस्तान की सलिंप्तता को स्पष्ट शब्दों में बयां किया है। पाकिस्तान के उव्च अधिकारियों को इन कबूलनामों से अवगत भी कराया गया है और दूतावासीय असेस की सुविधा भी दी गई मगर इस्लामाबाद है कि अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 2004 को हुए करार के मुताबिक इस्लामाबाद ने नई दिल्ली को वचन दे रखा है कि वह अपनी जमीन को आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा। मगर पाकिस्तान हर बार अपने वायदे से मुकरता रहा है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं का सख्त पहरा रहता है। सेना और सरकार की मदद के बगैर पाकिस्तान से भारत में परिंदा तक पर नहीं मार सकता। जाहिर भारत में आने वाले आतंकियों को पाकिस्तान की हर तरह से भरपूर मदद मिल रही है और पाकिस्तानी सेना ही आतंकियों को भारत में घुसपैठ करा रही है। कोई भी देश ज्यादा देर तक इस स्थिति को सहन नहीं करेगा। बहरहाल, पाकिस्तानी आतंकियों के “लंचपैडस“ को नष्ट करने की भारतीय सेना की कार्रवाई से दो बातें स्पष्ट है। पहली यह है कि भारत अब “रक्षात्मक“ (डेफेसिंव“ की जगह अब “आक्रामक“ (ओफेसिंव) हो गया है। मोदी सरकार की यह नई रणनीति काबिलेतारीफ है। देश भी यही चाहता है। पाकिस्तान जैसे पांखडी और फितरती पडोसी से आक्रामक होकर ही निपटा जा सकता है। दूसरी यह कि भारत अपनी “संप्रभुता“ की रक्षा के लिए एलओसी को भी लांघ सकता है। आज तक भारत ने ऐसा नहीं किया था। मगर यह आक्रमक रणनीति भारत को युद्ध की भट्ठी में भी झोंक सकती है। पाकिस्तान चुप बैठने से रहा और भारत पर हमला कर सकता है। पूरे देश को इस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।
गुरुवार, 29 सितंबर 2016
भारत की कूटनीतिज्ञ जीत
Posted on 7:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/
इस्लामाबाद में नवंबर माह में होने वाली सार्क ( साउथ एशियन एसोसिएषन फॉर रीजनल कोऑपरेशन)
शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट में भारत को तीन देशों के समर्थन से पाकिस्तान चारों खाने चित हो गया है। भारत ने उडी आतंकी हमले की प्रतिक्रियावश सार्क की बैेठक का बॉयकॉट का निर्णय लिया है। भारत का अनुसरण करते हुए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भूटान ने भी शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट का ऐलान किया है। अब इस बैठक की कोई अहमियत नहीं रह गई है और इसे रदद करने के सिवा कोई चारा नहीं है। बॉयकॉट में अफगानिस्तान का साथ भारत की बहुत बडी कूटनीतिज्ञ जीत है। जम्मू-कश्मीर में उडी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को यह खासा करारा जवाब है। सिंधु जल संधि को निरस्त करने की धमकी और पाकिस्तान को “मोस्ट फैवरड नेशन“ का दर्जा वापस लेने से इस्लामाबाद इतना नहीं तिलमिलाया है, जितना अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भूटान का सार्क का बॉयकॉट करने के लिए भारत का साथ देने पर। भारत द्वारा “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा वापस लेने से पाकिस्तान को कोई फर्क नहीं पडता है। पाकिस्तान ने आज तक भारत को “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा नहीं दिया है। मगर अफगनिस्तान का बॉयकॉट पाकिस्तान के लिए जबरदस्त धक्का है। भूटान को भारत का अनुकरण करना ही था क्योंकि वह हमेशा भारत के साथ चलता है। बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार भी भारत के साथ है। बांग्ला देश की मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना बंग बन्धु शेख मुजबीर रहमान की पुत्री हैं और देश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के लिए भारत की कृतज्ञ हैं। उनका साथ भी मिलना ही था मगर अफगानिस्तान का सार्क बॉयकॉट में भारत का साथ देना भारत की वाकई ही बहुत बडी कूटनीतिज्ञ सफलता है। अफगानिस्तान पश्चिम में पाकिस्तान का पडोसी है और उसके इस्लामाबाद से गहरे संबंध रहे हैं। पूरे सार्क में अफगानिस्तान ही पाकिस्तान का गहरा मित्र है। 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के हमले के बाद से पाकिस्तान पडोसी अफगानिस्तान के लगभग 60 लाख शरणार्थियों को अपने यहां पालता रहा है। अफगानिस्तान के कई शीर्ष नेता पाकिस्तान में राजनीतिक श रण लिए हुए हैं। इन हालात में अफगानिस्तान का पाकिस्तान को नाराज करने के यही अर्थ निकाले जा सकते हैं कि काबुल भी पाकिस्तान की “आतंकी छवि“ से आजिज आ चुका है। दरअसल, पाकिस्तान की आतंकी फितरत से अफगानिस्तान भी खासा पीडित है। अफगानिस्तान को अपना पांचवा प्रांत जैसा सलूक देते हुए पाकिस्तान तालिबान के माध्यम से वहां छदम युद्ध छेडे हुए है। काबुल यह बात भी आज तक नहीं भुला है कि तालिबान शासन के समय यूएई और सऊदी अरबिया के बाद पाकिस्तान तीसरा देश था, जिसने तालिनान सरकार को मान्यता दी थी। पाकिस्तान की बदनाम खुफिया मिल्ट्री एजेंसी आईएसआई भारत की ही तरह अफगानिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त रहती है। इसी वजह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हमीद करजई पाकिस्तान से खासे नाराज थे। करजई के उतराधिकारी अशरफ गनी ने पद संभालते ही सबसे पहले पाकिस्तान और अफगानिस्तान की इंटेलीजेस ऐजेसियों के बीच एक-दूसरे के क्षेत्र में विध्वंसक गतिविधियों नहीं फैलाने का करार करवाया मगर इसका भी पालन नहीं हुआ। गनी ने खुद माना है कि पाकिस्तान आज भी अफगानिस्तान को हर तरह से कमजोर करने की बराबर कोशिश कर रहा है। इसी माह (सितंबर) में अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान अफगान राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान पाकिस्तान की आतंकी फितरती पर गहरी चिंता जताई थी। पाकिस्तान की तुलना में भारत अफगानिस्तान से मजबूती से दोस्ताना रिश्ते निभा रहा है। इसी वजह अफगानिस्तान भारत को ज्यादा करीबी मानता है। बहरहाल, भारत, पाकिस्तान को अलग-थलग करने में सफल रहा है। मगर कश्मीर के हालात अभी भी चिंताजनक है। दुश्मनों से लडना आसान है मगर अपनों से लडना बेहद मुश्किल । कश्मीर घाटी में दिन-ब-दिन अवाम राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर होती जा रही है। मोदी सरकार को इस मोर्चे को भी अविलंब संभालना होगा।
बुधवार, 28 सितंबर 2016
मार्केट और डोनाल्ड ट्रंप
Posted on 7:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अमेरिका में इस साल नवंबर माह में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुईं हैं। विशेषकर, निवेश क इस चुनाव में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था अमेरिका के शीर्षस्थ पद के चुनाव पर में निवेशकों की दिलचस्पी स्वभाविक है। सोमवार को पूरी दुनिया की स्टॉक मार्केट में लगभग भूचाल सा आ गया था। सोमवार को न्यूयार्क में राष्ट्रपति उम्मीदवारों के बीच होने वाली राष्ट्रीय बहस से पहले ही मार्केट में डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अफरा-तफरी फैल गई । जर्मनी के शीर्ष ड्यूश बैंक की खस्ता हाल ने आग में घी का काम किया। निवेशकों को इस बात का भय सता रहा है कि अगर खरबपति बिजनेसमैन डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर पड सकता है। ट्रंप हर पहलू का नफे-नुकसान में आकलन करते है। सरकार और अर्थव्यवस्था नफे-नुकसान के नजरिए से नहीं चलती। डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार है। वैसे अमेरिका की दो प्रमुख रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों में टिकट पाने की पुख्ता प्रकिया है। संभावित उम्मीदवारों को हर राज्य के पार्टी डेलेगेटस का बहुमत समर्थन हासिल करना पडता है। अमेरिकी की अधिकांश जनता पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी किलंटन की ईमेल प्रकरण में विवादास्पद भूमिका से भी नाराज है मगर डोनाल्ड ट्रंप को भी ज्यादा पसंद नहीं करते हैं। ट्रंप ने श्वेत बनाम अश्वेत का मुद्दा उठाकर अमेरिका के अश्वेतों को खासा नाराज कर रखा है। अश्वेत पूरी तरह से हिलेरी क्लिंटन के साथ हैं। मुसलमानों को आतंकी बताकर और अमेरिका में उनकी एंट्री पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान करके ट्रंप ने मुस्लिम समुदाय की नाराजगी मोल ले रखी है। अमेरिका के पडोसी मेक्सिको की सीमा पर दीवार खडी करने की घोषणा करके ट्रंप ने अमेरिका में बसे मेक्सिकन लोगों को नाराज कर रखा है। रुस के राश्ट्रपति पुतिन की तारीफ करके अमेरिकी पूंजीपतियों को और चीन के साथ सभी वाणिज्यिक संधियों का पुनरावलोकन की बात करके चीनी समुदाय को नाराज कर दिया। महिलाओं को भोग की वस्तु मानने के लिए अमेरिका का यह शक्तिशाली तबका डोनाल्ड ट्रंप का मुखर विरोधी है। अमेरिका बहु-नस्लीय देश है और यहां की अर्थव्यवस्था में हर नागरिक का अहम योगदान है। पार्टी नामांकन अभियान के शुरुआत में ट्रंप हिलेरी से काफी पीछे थे मगर ताजा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में वे डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के बराबर आ गए हैं। अभी चुनाव के लिए दो माह का समय है और अगर मतदाताओ का रुझान यही रहा तो वे हिलेरी से आगे निकल सकते हैं। सोमवार को दुनिया भर की मार्केट में यही आशंका बलवित रही और अधिकतर शेयर औंधे मुंह गिर गए। तथापि, मंगलवार को स्थिति एकदम बदल गई। सोमवार को हिलेरी और ट्रंप के बीच हुई बहस में क्लिंटन ने डोनाल्ड को ऐसे पछाडा कि पूरी दुनिया की मार्केट में आशा की एक नई किरण प्रज्वलित हो गई। एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के मुताबिक सोमवार की बहस के बाद 62 फीसदी अमेरिकी जनमानस ने माना कि हिलेरी ने बाजी जीत ली जबकि मात्र 27 फीसदी ट्रंप के पक्ष में थे। बहस के बाद के स्नैप पोल भी हिलेरी के पक्ष में हैं। नतीजतन, मंगलवार को मार्केटस में तेजी छाई रही और शेयरों में भारी उछाल आया। ट्रंप के मुखर विरोधी मेक्सिको की मुद्रा पीसो में डॉलर के मुकाबले 2 फीसदी का उछाल दर्ज हुआ। अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारो में 9 और 19 अक्टूबर को बहस के दो दौर होने बाकी है। आठ नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव से पहले इन दोनों डेबेटस पर भी निवेशकों की पैनी नजर रहेगी। अगर ट्रंप हिलेरी पर भारी पडते हैं, बाजार में फिर अफरा-तफरा फैल सकती है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने पर मार्केट्स को किस भयावह स्थिति का सामना करना पड सकता है ?
मंगलवार, 27 सितंबर 2016
भारत के पास “पानी बम“ !
Posted on 8:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
“जल और लहू एक साथ नहीं बह सकते“, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सिंधु जल संधि पर यह कथन सामयिक और प्रासंगिक है। तथापि, जमीनी सच्चाई यही है कि भारत पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी प्रवाहित करता रहेगा और पाकिस्तान भारत की धरती को लहूलुहान करता रहेगा। इसे सामरिक विवशता कहा जाए या अंतरराष्ट्रीय भाईचारे का पालन, भारत ने सिंधु संधि को निरस्त नहीं करने का फैसला लिया है हालांकि पूरा देश चाहता है कि भारत में लहु की नदियां बहाने वाले पकिस्तान को उसकी भाषा में ही जबाव दिया जाना चाहिए। सिंधु बेसिन नदी करार अंतरराष्ट्रीय संधि है और इसे निरस्त करने से भारत की छवि कलंकित हो सकती है। भारत ने आज तक कभी किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को नहीं तोडा। इस स्थिति के दृष्टिगत सोमवार की बैठक में फैसला लिया गया कि भारत को पाकिस्तान के नियंत्रण वाली तीन नदियों- सिंधु झेलम और चिनाब- के जल का अधिकाधिक दोहण करना चाहिए। सिंधु नदी संधि के तहत तीन नदियों - सतलुज, ब्यास और रावी- पर भारत का नियंत्रण है और बाकी तीन पर पाकिस्तान का। भारत से पाकिस्तान को बहने वाली सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान की सीमा पर सिंधु नदी में समा जाती हैं। 1960 में लगभग दस साल की जद्दोजेहद के बाद विश्व बैंक के दखल से भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी को लेकर संधि हुई थी। पााकिस्तान को शुरु से ही इस बात का भय था कि युद्ध अथवा इस तरह की आपातकालीन स्थिति के समय भारत पाकिस्तान को नदियों का पानी रोक सकता है। संधि में इस बात का प्रावधान रखा गया है कि भारत, पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों पर डैम और जल-विद्युत परियोजनाएं स्थापित तो कर सकता है मगर नदियों के प्रवाह को नहीं रोक सकता। इस संधि के मुताबिक भारत सिंधु नदी समागम का केवल 20 फीसदी जल का ही उपयोग कर सकता है। संधि में इस बात का भी प्रावधान है कि जल बंटवारे पर किसी भी तरह के मनमुटाव अथवा मतभेद की स्थिति में इसका कानून सम्मत निपटान किया जाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी समागम के जल बंटवारे को लेकर आज तक कोई बडा मनमुटाव नहीं हुआ है और पूरी दुनिया में सिंधु बेसिन को बेहद सफल संधि माना जाता है। मगर उडी आतंकी हमले के बाद से भारत में पहली बार इस संधि को निरस्त करने की आवाज उठी है हालांकि ऐसा करना आसान नहीं है। भारत चीन की तरह हठ्ठी और काइंया नहीं बन सकता। चीन ने हाल ही में दक्षिण चीन सागर पर कब्जे को लेकर अंतरराश्ट्रीय पंचाट के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है। चीन के इस फैसले से दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ गया है। भारत सिंधु नदी संधि को तोड सकता है मगर इससे वह अलग-थलग पड जाएगा। जम्मू-कश्मीर कई बार इस संधि को निरस्त करने की मांग कर चुका है। संधि के निरस्त किए जाने से पाकिस्तान में पानी की भीषण किल्लत हो सकती है और अवाम भुखमरी का शिकार हो सकती है। दुनिया का कोई भी देश इस स्थिति में भारत का साथ नहीं देगा। वैसे, इस तरह की स्थिति पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के मन की मुराद पूरी कर सकती है। पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठन भारत के खिलाफ अवाम को भडकाने के लिए इस तरह के ,मौके की फिराक में रहते है। भारत अपने नियंत्रण वाली नदियों के पानी का पहले ही भरपूर दोहण कर चुका है। अब पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों की बारी है। मोदी सरकार का पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों के पानी से जम्मू-कश्मीर में लगभग 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करने का फैसला समय की मांग है। पाकिस्तान को पता चलना चाहिए कि भारत के पास “पानी बम“ भी है और पानी कैसे भीषण तबाही मचा सकता है।
सोमवार, 26 सितंबर 2016
जीएसटी अगले 1 अप्रैल से ?
Posted on 6:44 pm by mnfaindia.blogspot.com/
विलंब से ही सही, शुक्र है अततः वस्तु एवं सेवा कर (गुडस एंड सर्विसिस -जीएसटी) बिल संसद में पारित हो ही गया। और अब तमाम बाधाएं लांघते हुए शुक्र है केद्र और राज्य 1 अप्रैल, 017 से जीएसटी को लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। जीएसटी जितनी जल्दी लागू होगा, यह देश के लिए उतना ही हितकर होगा। विशेषज्ञों का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कम-से-कम डेढ से दो फीसदी का इजाफा हो सकता है। अगर इसे संजीदगी से लागू किया जाए, तो जीडीपी तीन फीसदी तक बढ सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत दुनिया की सबसे तेज बढती अर्थव्यवस्था बन जाएगी। वीरवार को अपनी पहली बैठक में जीएसटी परिषद में कई मुद्दो पर भारी मतभेदों के बावजूद जीएसटी को 1 अप्रैल, 2017 से लागू किए जाने पर पूर्ण सहमति थी। तथापि, कहना आसान है, करना बेहद मुश्किल ( इजीयर सैड देन डन)। जीएसटी परिषद की पहली ही बैठक में तमिल नाडु और उत्तर प्रदेश ने “ वन-स्टेट, वन वोट“ सिद्धांत का मुखर विरोध करते हुए कहा की बडे राज्यों को छोटे राजों के बराबर रखना अन्यायपूर्ण है। यह बात दीगर है कि परिषद ने इस विरोध को खारिज कर दिया। जीएसटी में व्यापारियों की छूट सीमा पर भी कोई सहमति नहीं बन पाई। कुछ राज्य माहवार 10 लाख रु कारोबार करने वालों को छूट देने के पक्ष में थे। अधिकांष राज्य इस सीमा को 25 लाख रु तक के टर्नओवर को जीएसतटी से बाहर रखने के पक्ष में थे। बहरहाल, शु क्रवार को तय किया गया कि 25 लाख रु से कम का सालाना कारोबार करने वालों पर जीएसटी नहीं लगेगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार परिषद ने योजनाबद्ध बिक्री कर (सेल्स टेक्स) के
विवादास्पद मामले को भी सुलझा लिया है और इस पर सहमति बन गई है। शुक्रवार की बैठक में दोहरे नियंत्रण (डुअल कंट्रोल) के मामले को भी सुलझा लिया गया है। टैक्स लाइबिलिटी तय करने के लिए केन्द्र अथवा राज्य स्तर पर एक ही प्राधिकरण होगा, केद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग नहीं। इस मामले में उधोग और व्यापार जगत को इस बात पर निराशा हो सकती है कि एक समन्वित प्राधिकरण का खाका नहीं बन पाया है। जीएसटी रेट और स्लैब पर बैठक में सहमति नही बन पाई और इसे अगले माह अक्टूबर में होने वालौ बैठक के लिए छोड दिया गया। यह मुद्दा काफी संवेदनशील है और इस पर कुछ राज्य और समय चाहते हैं। केन्द्र सरकार टैक्स रेट 18-19 फीसदी के बीच तय करने के पक्ष में है मगर अधिकतर राज्य इसे 22 से 23 फीसदी निर्धारित करने के पक्ष में है। जीएसटी रेट और स्लैब के अलावा एरिया-बेस्ड छूट का मामला भी अभी सुलझ नहीं पाया है। बहरहाल, जीएसटी परिषद में कई विवादास्पद मुद्दों पर सहमति बनना सुखद पहल है और इससे उम्मीद की जा सकती है कि देश इस क्रांतिकारी कर को अगले साल 1 अप्रैल से लागू होने के मार्ग पर प्रशस्त हो रहा है। मगर अभी भी केन्द्र और राज्यों को अप्रैल 2017 से पहले तीन प्रमुख बिल संसद और विधानसभाओं से पारित करवाने हैं। और सबसे अहम कानून जीएसटी रेट और उसके स्लैब से संबंधित है। यह कानून तब तक पारित नहीं हो सकता, जब तक जीएसटी परिषद रेट और इसके स्लैब निर्धारित नहीं कर लेती। जीएसटी परिषद को अगले माह होने वालीे बैठक में रेट तय करना ही पडेगा ताकि केन्द्र सरकार नवंबर में शुरु होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में तीनों बिलों को पारित कर सके। जीएसटी लागू करने के लिए केद्र और राज्यों को युद्ध स्तर पर काम करना होगा।
विवादास्पद मामले को भी सुलझा लिया है और इस पर सहमति बन गई है। शुक्रवार की बैठक में दोहरे नियंत्रण (डुअल कंट्रोल) के मामले को भी सुलझा लिया गया है। टैक्स लाइबिलिटी तय करने के लिए केन्द्र अथवा राज्य स्तर पर एक ही प्राधिकरण होगा, केद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग नहीं। इस मामले में उधोग और व्यापार जगत को इस बात पर निराशा हो सकती है कि एक समन्वित प्राधिकरण का खाका नहीं बन पाया है। जीएसटी रेट और स्लैब पर बैठक में सहमति नही बन पाई और इसे अगले माह अक्टूबर में होने वालौ बैठक के लिए छोड दिया गया। यह मुद्दा काफी संवेदनशील है और इस पर कुछ राज्य और समय चाहते हैं। केन्द्र सरकार टैक्स रेट 18-19 फीसदी के बीच तय करने के पक्ष में है मगर अधिकतर राज्य इसे 22 से 23 फीसदी निर्धारित करने के पक्ष में है। जीएसटी रेट और स्लैब के अलावा एरिया-बेस्ड छूट का मामला भी अभी सुलझ नहीं पाया है। बहरहाल, जीएसटी परिषद में कई विवादास्पद मुद्दों पर सहमति बनना सुखद पहल है और इससे उम्मीद की जा सकती है कि देश इस क्रांतिकारी कर को अगले साल 1 अप्रैल से लागू होने के मार्ग पर प्रशस्त हो रहा है। मगर अभी भी केन्द्र और राज्यों को अप्रैल 2017 से पहले तीन प्रमुख बिल संसद और विधानसभाओं से पारित करवाने हैं। और सबसे अहम कानून जीएसटी रेट और उसके स्लैब से संबंधित है। यह कानून तब तक पारित नहीं हो सकता, जब तक जीएसटी परिषद रेट और इसके स्लैब निर्धारित नहीं कर लेती। जीएसटी परिषद को अगले माह होने वालीे बैठक में रेट तय करना ही पडेगा ताकि केन्द्र सरकार नवंबर में शुरु होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में तीनों बिलों को पारित कर सके। जीएसटी लागू करने के लिए केद्र और राज्यों को युद्ध स्तर पर काम करना होगा।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






