कश्मीर के होनहार आर्मी अफसर लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की बर्बरतापूर्ण हत्या ने घाटी में व्याप्त असुरक्षा के माहौल को उजागर किया है। छुट्टी पर अपने रिश्तेदार की शादी में शरीक होने आए युवा फौजी अफसर को आतंकियों ने पहले समारोह से अगवा किया, फिर उन्हें तडपा-तडपा कर मार डाला। युवा लेफ्टिनेंट पिछले साल दिसंबर में ही सेना में शामिल हुआ था। 27 साल के अरसे में पहली बार आतंकियों ने घर में घुसकर कश्मीरी अफसर को अगवा करके उसकी बर्बरतापूर्ण हत्या करने का दुस्साहस किया है। कश्मीर में आतंकी और अलगाववादी युवाओं को सेना में भर्ती नहीं होने देने की धमकियां देते रहे हैं। तेईस वर्षीय फैयाज ने आतंकियों की नहीं सुनी, और वे सेना में भर्ती हो गए। इसीलिए आतंकियों ने उन्हें मार डाला। कश्मीरी युवाओं को डराने के लिए ही आतंकियों ने यह कायराना हरकत की है। युवा सैनिक अफसर की जघन्य हत्या से राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल होने वाले युवाओं का हत्तोसाहित होना स्वभाविक है। इस घटना से यह संदेश भी जाता है कि हिंसा की धू-धू करती लपटों से सुरक्षा बल अगर अपने अफसर तक को बचा नहीं पाए, आम आदमी की सुरक्षा तो भगवान भरोसे ही रहेगी। कश्मीरी में लंबे समय से भारी तादाद में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। इसके बावजूद आतंक और हिंसा का ताडंव बदस्तूर जारी है और हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर होते जा रहे है। आम लोगों की मौत, गोलीबारी, प्रदर्शन , बंद और पत्थरबाजी रोजमर्रा की बात हो गई है। एक तरफ सुरक्षा बल गोलियां बरसाते हैं तो दूसरी तरफ नौजवान पत्थरबाजी करते हैं। और इसमें आम आदमी बुरी तरह से पीस रहा है। स्कूल और कालेज साल में आधे समय से भी ज्यादा समय तक बंद रहते है। राज्य आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले शैक्षणिक सत्र में स्कूलों में दसवीं और बाहरवीं कक्षाओं का बमुश्किल पचास फीसदी सिलेबस पूरा हो पाया। पूरे साल घाटी में स्कूल चार माह तक ही भी पढाई नहीं करा पाए। आए रोज के बंद के कारण हस्तशिल्प उधोग, पर्यटन पूरी तरह चौपट हो चुका है। आम आदमी को भुखमरी की नौबत आ चुकी है। जुलाई में आतंकी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों की मुठभेड में मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी आधी साल तक भीषण हिंसा में सुलगती रही। इस दौरान न तो स्कूल-कालेज खुल पाए और न ही आईआईटी, एनआईटी जैसे उच्च षैक्षणिक संस्थान। इस दौरान 90 से अधिक लोग मारे गए और 15, 000 जख्मी हो गए। सुरक्षा बलों के 4000 जवान भी घायल हुए थे । 53 दिन तक कश्मीर घाटी में कर्फ्यू लगा रहा। इसके बावजूद भी हालात सामान्य तो क्या, लेशमात्र भी सुधर नहीं पाए हैं। केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ही कश्मीर की समस्या का कोई फौरी हल तक नहीं ढूंढ पाई है। यहीं नहीं केन्द्र और राज्य सरकार कश्मीर की जमीनी सच्चाई से भी आंख मूंद रही है। सच यह है कि भारत को मुस्लिम बाहुल आबादी वाले राज्य को राष्ट्रीय मुख्यधारा में जोडे रखने के लिए देश को बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। कश्मीर घाटी के लोग अलगाववादी और आतंकियों को भले ही समर्थन न करें मगर वे अपने बच्चों को आतंक और हिंसा की आग मे जलता नही देख सकते। और कश्मीर की सबसे बडी त्रासदी यही है कि आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच जारी संघर्ष की चपेट में स्कूली बच्चे, छात्र और नौजवान भी आ रहे हैं। इससे युवाओं का भडकना स्वभाविक है। कश्मीर में लंबे समय से सेना तैनात है। कश्मीर की अवाम को यह बात जरा भी पसंद नहीं है। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की बढती घटनाएं यही दर्शाती है। लंबे समय तक आंतरिक मामलों में सेना की तैनाती के गंभीर परिणाम हो सकते है। युवा अफसर उमर फैयाज की हत्या से सरकार को अब तो संभल जाना चाहिए।
शुक्रवार, 12 मई 2017
गुरुवार, 11 मई 2017
गडबडी में “गडबडी“
Posted on 8:44 pm by mnfaindia.blogspot.com/
राजधानी दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईएमवी) में छेडछाड प्रमाणित काने के लिए विधानसभा का सहारा लिया है। मंगलवार को सदन की बैठक जीएसटी (गुडस एंड सर्विसिस टैक्स) बिल को अनुमोदित करने के लिए बुलाई गई थी मगर केजरीवाल एंड पार्टी ने सदन में ईएमवी में छेडछाड का लाइव डेमो पेश कर देश के निर्वाचन आयोग और चुनाव प्रकिया में तैनात लाखों कर्मचारियों की निष्पक्षता और विश्सनीयता को खुली चुनौती दी है। आप के सोफ्टवेयर इंजीनियर विधायक सौरभ भारद्धाज ने विधानसभा में नकली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन लाकर यह प्रमाणित करने की कोशिश की कि इसके साथ आसानी से छेडछाड की जा सकती है। सौरभ भारद्धाज ने यह दावा भी किया है कि अगर उन्हें निर्वाचन आयोग असली ईवीएम दे दें तो वे नब्बे सेकेंड (यानी डेढ मिनट) में इसका मदर बोर्ड बदलकर परिणाम हैक करके दिखा सकते हैं। कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए “आप“ ने विधानसभा के भीतर डेमो दिया। बाहर देते तो लपेटे जाते। सदन में लॉमेकर्स कुछ भी कर सकते हैं। किसी की भी छीछालेदारी कर सकते हैं। संवैधानिक बॉडी की विश्वसनीयता को भी तार-तार कर सकते है, जैसा कि मंगलवार को विधानसभा में किया गया। सब कुछ पहले से तय था। ईवीएम से छेडछाड का मुद्दा उछाल कर केजरीवाल ने पार्टी के बर्खास्त मंत्री कपिल मिश्रा द्वारा लगाए गए घूसखोरी के गंभीर आरोपों से देश का ध्यान बंटाने की कोशिश की है। अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार सुबह ही टवीट कर दिया था “ देश में चल रहे एक बडे षडयंत्र का सच आज सदन में सौरभ भारद्धाज देश के सामने रखेंगे। उन्हें जरुर सुनिएगा। सत्यमेव जयते“। आम आदमी पार्टी की सदन में भी केजरीवाल ने मिश्रा के आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया। अगर तोडा बहुत बोले तो सिर्फ ईएवीएम से छेडछाड पर बोले। मौजूदा परिवेश में यह अप्रासंगिक था। मगर जनता बहुत सयानी है। वह सब जानती है। टवीटर पर भी इस डेमो की खिल्ली उडाई जा रह है। एक काबिलेगौर प्रतिक्रिया है “सौरभ भारद्धाज ने साबित कर दिया है कि पार्टी ने दिल्ली में 70 मेंसे 67 सीटें कैसे जीतीं“। वैसे आप की इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि जिस पार्टी को दो साल पहले इन्हीं मशीनों के दम पर प्रचंड जनादेश मिला हो, वही पार्टी अब उस सिस्टम में खोट निकाल रही है। इस समय पूरा देश उस शख्स से दो करोड रु की कथित घूसखोरी का सच जानना चाहती है, जो खुद तीन साल पहले शीर्ष उधोगपतियों और राजनेताओं पर संगीन आरोप लगाकर उनसे तत्काल जवाब मांगा करता था। और अब वही शख्स अपने ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों पर बगले झांक रहा है। आरोप लगाने वाला कोई विपक्षी दल का नेता या राजनीतिक विरोधी नहीं है, बल्कि उनकी पार्टी का वरिष्ठ नेता है। माना, कपिल मिश्रा मंत्री पद से हटाए जाने से क्षुब्ध होकर बदले की भावना से काम कर रहे हैं और विरोधी दल उन्हें उकसा रहे हैं मगर देश को आरोपों का जवाब मिलना चाहिए। बहरहाल, सौरभ भारद्धाज के डेमो को भी सहज में दरकिनार नहीं किया जा सकता है । निर्वाचन आयोग भी इस बात को जानता है और इसी सिलसिले में 12 मई को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है और आम आदमौ पार्टी को इसमें विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया है। बैठक में आम आदमी पार्टी को मशीनों में गडबडी साबित करने का मौका दिया जा सकता है। निर्वाचन आयोग ने साफ-साफ कहा है कि चुनाव में इस्तेमाल की जा रही मशीनों से किसी भी सूरत में छेडछाड नहीं की जा सकती। इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। आप के डेमो ने देश की निष्पक्ष चुनाव प्रकिया की विश्वसनीयता और लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है। इसका हर हाल में माकूल जवाब मिलना चाहिए।
बुधवार, 10 मई 2017
चारे की राजनीतिक जुगाली
Posted on 8:19 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चारा घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले पर हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया है कि एक अपराध के लिए बार-बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। चाईबासा मामले में झारखंड के हाई कोर्ट से पांच साल की सजा पाने के बाद बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री एवं राश्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव अन्य मामलों में राहत पाकर चैन की सांस ले रहे थे मगर देश की शीर्ष अदालत ने उन्हें तगडा झटका दिया है। हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों पर अलग-अलग मामलों में मुकदमा चलाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले में देर से अपील करने के लिए फटकार भी लगाई है। 1990 से 1997 के दरम्यान मुख्यमंत्री रहते हुए बिहार में पशुओं के लिए चारा मुहैया कराने की आड में सरकारी ट्रेजरी से बार-बार भारी रकम निकाली गई थी और इसे डकार लिया गया था। रहस्समयी चारा घोटाले का जाल बेहद जटिल है और इसे तोडते-तोडते जांच एजेंसियों के भी पसीने छूट गए थे। लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्र भी चारा घोटाले में आरोपी हैं। मामले की जांच कर रहे सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास की भी यही राय थी कि सरकारी ट्रैजरी से बार-बार पैसा निकालना अलग-अलग अपराध है और इसके लिए अलग-अलग आपराधिक मामले चलाए जाने चाहिए। बिहार में चारा घोटला 1973 से बदस्तूर चल रहा था। 1985 में बिहार वेटनरी एसोसिएशन ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर पहली बार “ चारा घोटाले“ चलाने वाले माफिया का सार्वजनिक भांडाफोड किया था। 1990 में माफिया ने बिहार वेटनरी एसोसिएशन पर ही कब्जा कर लिया। इससे क्षुब्ध एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारियों ने घोटाले से जुडे दस्तावेज जुटाकर भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी समेत राज्य के टॉप नेताओं क सामने प्रस्तुत किए। इस दौरान मामला मीडिया में उछला और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसकी लपेटे में आ गए। अतंतः उन्हें इस्तीफा देना पडा। चारा घोटाले ने लालू प्रसाद के राजनीतिक कैरियर को खासा बाधित किया है। इसी के कारण उन्हें जेल जाना पडा। पांच साल की सजा भी हुई। इसी वजह उन्हें अपने सबसे बडे प्रतिस्पर्धक नीतिश कुमार से समझौता करने पडा और विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाना पडा। चारा घोटाले ने बिहार की राजनीति को भी खासा प्रभावित किया है। नीतिश कुमार से गठबंधन टूट जाने के बाद भाजपा राज्य में कमजोर हुई है और वह फिर से जनता दल (यू) को “चारा“ डाल रही है। महागठबंधन की सरकार बनने के बावजूद नीतिश कुमार लालू प्रसाद के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है। नोटबंदी पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा और पटना प्रकाशोत्सव समारोह के दौरान मंच पर स्थान नहीं मिलने से लालू प्रसाद नीतिश से क्षुब्ध हैं तो राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन द्वारा नीतिश कुमार को “परिस्थितियों का मुख्यमंत्री“ बताए जाने से दोनों दलों के रिश्ते तल्ख हुए हैंे। भाजपा नीतिष कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को अवसरवादी, विवशता का महागठबंधन बताकर इसे तोडने की हर संभव कोशिश कर रही है। सच यह है कि सता में आने के लिए नीतिश कुमार ने लालू प्रसाद से गठबंधन तो कर लिया है मगर वे आज तक इसको लेकर सहज नहीं हो पाए हैं। मन से वे अभी भी भाजपा के ज्यादा करीब हैं। और उन्हें राजद और भाजपा मेंसे एक को चुनने को कहा जाए, वे भगवा पार्टी को ही चुनेगे। लालू प्रसाद न केवल सजायाफ्ता नेता है, अलबत्ता परिवारवाद को बढाने में सबसे आगे है। नीतिश कुमार परिवारवाद के सख्त विरोधी है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से महागठबंधन पर फिलहाल कोई फर्क न पडे मगर देर-सबेर इसका टूटना तय माना जा रहा है। अवसरवादी राजनीति की जुगाली ज्यादा देर तक नहीं चलती।
मंगलवार, 9 मई 2017
फिर अनाप-शाप
Posted on 6:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश में “ अलग राजनीति“ करने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी (आप) अपने अस्तित्व के मात्र पांच साल से भी कम समय में बिखराव के मुहाने पर खडी है। नेताओं की अति राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मार्ग दर्शन से वंचित “आप“ का बिखराव आश्चर्यजनक नहीं है। पिछली सदी में अस्सी के दशक मेँ भी इसी तरह का “ प्रयोग“ बुरी तरह से विफल रहा था और तब जनता पार्टी के नाम से बनाया गया कांग्रेस का विकल्प अढाई साल में ही धराशायी हो गया था। तब भी नेताओं की सियासी महत्वाकांक्षाएं, वैचारिक मार्ग दर्शन का अभाव और सत्ता लोलुपता जनसेवा पर भारी पडी थी । सत्ता लोलुप नेता लोकनायक जय प्रकाश नारायण का मार्ग दर्शन और जनसेवा का सार्वजनिक संकल्प भी भूल गए थे। बिहार के दो दिग्गज नेता -नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव- जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडे गए जन आंदोलन की ही उपज है। विडबंना देखिए वही लालू प्रसाद यादव सत्ता के लिए उसी “ भ्रष्ट“ कांग्रेस के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रहे है। चारा घोटाले में लालू सजायाफ्ता हैं और छह साल तक चुनाव नहीं लड सकते हैं। बिहार में परिवारवाद फैलाने में लालू की कोई सानी नही है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव पर आपराधिक मामला चलाए जाने के फैसले के बाद लालू प्रसाद की मुश्किलें और बढ गई हैं। जनता पार्टी और तदुपरांत अस्सी के उतरार्ध में विश्व प्रताप सिंह के मोर्चे की सरकार की विफलता के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से कुछ उम्मीदें जगी थी। सबसे बडी उम्मीद थीः सच्ची और ईमानदार राजनीति की मगर यह थोडे ही समय बाद लुप्त हो गई। जनमानस को केजरीवाल से सुशासन और ”अलग सियासत“ की उम्मीद थी मगर आप के विधायक भी औरों की ही तरह निकले और सत्ता के लिए मर-मिटने में मशगूल हैं। मोदी लहर के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की प्रचंड लहर ने भाजपा और कांग्रेस का जिस तरह से सफाया किया था, उससे जनमानस में देश में मोदी को चुनौती देने वाला विकल्प की उम्मीद जगी थी। अब यह भी काफूर हो गई है। आम आदमी पार्टी के इन आरोपों में काफी वजन है कि सत्ताधारी भाजपा हर तरह के जायज-नाजायज और वाजिब-गैर वाजिब हथकंडे अपना कर “आप“ को खत्म करने पर आमादा है। इस बात से “आप“ के नेताओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए था मगर ऐसा करने की बजाए आप नेता एक-दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा है। सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दलों को लंबे समय तक पापड बेलने पडते है। सडकों पर लडते-लडते पांव में छाले पड जाते हैं। लंबी राजनीतिक लडाइयां लडनी पडती हैं। अरविंद केजरीवाल इस मामले में भाग्यशाली रहे हैं। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में शरीक होकर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने इसे राजनीतिक तौर पर खूब भुनाया। आंदोलन में शरीक होने वाले नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हिलोरे मारने लग पडी। दिल्ली विधानसभा चुनाव से थोडे समय पहले पार्टी बना ली। कांग्रेस और भाजपा के कुशासन से त्रस्त दिल्ली की जनता की दुखती नब्ज पकड ली और पहले ही झटके में बहुमत तो नहीं मिला मगर जैसे-तैसे सता हथिया ली। किसी ने सोचा भी नहीं था, आप ऐसा करिश्मा कर पाएगा। भारत तो करिश्माई देश है। यहां लोकतांत्रिक करिश्मे भी होते रहते है। कांग्रेस और भाजपा की रस्साकशी में फंसी आप सरकार की सरकार पचास दिन में चलती बनी। जनता से ताजा जनादेश मांगा और इस बार जनता ने दिल खोलकर जनादेश दिया। जितना प्रचंड जनादेश , उतनी ही बडी जनाकांक्षाएं। केजरीवाल एंड पार्टी इस कसौटी पर जरा भी खरा उतर नहीं पाए है। और अब “आप“ “बदले की गंदी राजनीति“ से पीडित है। बर्खास्त मंत्री कपिल मिश्रा के आरोप इसी गंदी रिवायत का हिस्सा है। बगैर प्रमाण के आरोप लगाना भारतीय सियासत का संस्कार बन गया है। इससे कोई नहीं बच सकता ।
अन-कलीन मानदंड
Posted on 5:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/
केन्द्र सरकार द्वारा वीरवार को जारी स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट की प्रामणिकता पर सवाल खडे किए जा रहे हैं। भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने जनवरी-फरवरी 2017 में देश के 434 शहरों में करवाए गए स्वच्छता सर्वेक्षण में जो मानदंड अपनाए गए हैं, उन्हें न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। इस सर्वेक्षण के अनुसार इस बार मध्य प्रदेश का इंदौर शहर पहले और राज्य की राजधानी भोपाल दूसरे स्थान पर रहा है। हरियाणा के करनाल को देश का स्वच्छतम मेडीकम सिटी और फरीदाबाद को “सबसे तेज मूवर“ बताया गया है। हरियाणा के लिए यह बडी उपलब्धि है। करनाल हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का पैतृक शहर है। पंजाब के लिए सर्वेक्षण बुरी खबर लेकर आया है। इसके 16 मेंसे 7 शहर सबसे गंदे शहरों की श्रेणी में दर्शाए गए हैं। पंजाब का “पवित्र“ शहर मुक्तसर और अबोहर भी सबसे निचले स्थान पर है। जम्मू एवं कश्मीर का लेह देश के लघु शहरों में स्वच्छतम बताया गया है और हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला सबसे स्वच्छ पहाडी शहर है। स्मार्ट सिटीज की दौड में पिछडने के बाद सही शिमला के लिए यह सुखद स्थिति है। देेश का सबसे खूबसूरत शहर चंडीगढ इस बार 11वें स्थान पर है तो कर्नाटक का मैसूर शहर पांचवें स्थान पर । मैसूर पिछले दो सर्वेक्षणों में लगातार पहला स्थान हासिल करता रहा है। चंडीगढ पिछले सर्वेक्षण में दूसरे स्थान पर था। इन दोनों शहरों का काफी नीचे फिसलना यह दर्शाता है कि सर्वेक्षण के मानदंडो में कुछ तो गडबड है। वैसे भी सरकारी मानदंडों को सौ फीसदी विश्वनीय नही माना जा सकता। स्वच्छता सर्वेक्षण की विधि (मैथडॉलॉजी) को सटीक नहीं माना जा सकता। सर्वे में साढे सात लाख लोग शामिल हुए, 12000 स्थानों का सर्वे किया गया और 2600 शौचालय का निरीक्षण किया गया। मंत्रालय ने जनता से छह प्रश्न भी किए थे। इनमें खुले में षौच, सोलिड बेस्ट मैनेजमेंट जैसे सवाल शामिल थे। इसके प्रत्युतर में 37 लाख लोगों ने अपने जवाब भेजे। निर्धारित मानदंडों पर स्वच्छता परखने के लिए कुल किलाकर 2000 अंक रखे गए थे। इन मेंसे 600 अंक जनता की फीडबैक के लिए थे। जाहिर है जिन शहरों के लोगों ने ज्यादा फीडबैक भेजा, वे बाजी मार गए। चंडीगढ इसीलिए पिछड गया क्योंकि इस शहर के लोगों ने बहुत कम फीडबैक भेजा जबकि सोलिड बेस्ट मैनेजेमेंट में शहर को इंदौर और भोपाल से ज्यादा अंक मिले थे। ऑब्जरवेशन के आधार पर भी चंडीगढ, इंदौर और भोपाल से कहीं आगे था मगर नागरिकों के फीडबैक में चंडीगढ, इंदौर और भोपाल से काफी पिछड गया। पिछले दो सर्वेक्षणों में पहले नंबर पर आने वाले मैसृर को भी इसी कारण पिछडना पडा। सर्वेक्षण के इन मानदंडों से साफ है कि अगर सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट और डायरेक्ट ऑब्जरवेशन के दम पर चयन होता तो चंडीगढ इंदौर और भोपाल को पछाड कर पहले नंबर पर आता। इस बात के दृश्टिगत , सरकार की रैकिंग को न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। शहरों की स्वच्छता को परखने के लिए साफ-सफाई वाले मानदंड ही पर्याप्त होने चाहिए। लोगों के फीडबैक इसमें जोड्ने से छोटे षहरों से अन्याय हो सकता है। अमूमन, सर्क्षेक्षण में हर चयनित शहर को हर लिहाज से बराबर होना चाहिए। देश के 434 शहर आबादी और नागरिक फीडबैक के मामले में एक समान नहीं हो सकते। मुंबई, दिल्ली, चैन्नई, इंदौर जैसे महानगरों की चंडीगढ, शिमला और करनाल से तुलना नहीं की जा सकती। ्बहरहाल, देश को स्वच्छ और स्मार्ट बनाने के लिए मोदी सरकार के प्रयास सराहनीय है। मौजूदा परिवेश में यही बहुत बडी बात है कि छोटे-बडे सभी शहर स्वच्छता अभियान में बढ-चढ कर भाग ले रहे हैं। देश को “खुले में शौच करने की गंदी आदत से निजात दिलाने में मोदी सरकार का बडा हाथ है। घर-घर, गली-गली स्वच्छता फैले, देश का हर नागरिक सेहतमंद हो, हर बालक-बालिका को अच्छी शिक्षा मिले और प्रत्येक वयोवृद्ध को सामाजिक सुरक्षा मिले, लोकप्रिय सरकार का यही एजेंडा होता है। मोदी सरकार इस मामल में अच्छा काम कर रही है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






