शुक्रवार, 5 मई 2017

आधार पर बेआधार तर्क

भारतवासियों को इस महान देश  में रहते हुए  अगर अपने शरीर पर भी मुकम्म्मल अधिकार न हो तो यह बेहद चिंता की बात है। लोगों को इस बात पर गुस्सा आना अथवा चितिंत होना स्वभाविक है क्योंकि यह उनकी निजता (प्राईवेसी) और नागरिक अधिकारों से जुडा मामला है । और अगर इस तरह की बात भारत सरकार के अटार्नी जरनल सुप्रीम कोर्ट में कहें तो मामला और भी ज्यादा गंभीर बन जाता है। बुधवार को  अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट  में आाधार को अनिवार्य बनाए जाने की सरकार की पहल पर  जिरह करते हुए कहा कि देश  में किसी भी व्यक्ति को  अपने शरीर पर मुकम्मल अधिकार नहीं है। सरकार आपको अपने किसी अंग को बेचने से रोक सकती है। यानी सरकार आपके शरीर पर नियंत्रण करने की कोशिश  कर सकती है। देश  के अटार्नी जरनल की इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता।  बायोमेट्रिक डाटाबेस के लिए एकत्रित की जा रही जानकारी को लेकर कुछ लोग इन्हीं मुददों पर बेहद चिंतित है। आधार को पैन के लिए अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान एक वकील का कहना था कि “मेरी अंगुलियों और आंखों की पुतलियों पर किसी और का कोई अधिकार नहीं हो सकता है। सरकार इन्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती “। आधार कार्ड  बनाते समय आवेदक की आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के प्रिंट लिए जाते हैं। वकील के इसी कथन पर ही अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सरकार का यह पक्ष पेश  किया था। देश  में इस समय आधार को लेकर जबरदस्त बहस छिडी हुई है। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। सरकार ने हाल ही में आधार कार्ड को पैन (परमानेंट अकाउंट नंबर) से जोडा है। आलोचक कह रहे हैं कि पैन कार्ड  का आधार कार्ड  से जोडना गलत है क्योंकि आधार अनिवार्य  नहीं है मगर पैन कार्ड  टैक्स रिटर्न करने के लिए अनिवार्य  है। आधार के मूल एक्ट (यूनिक आईडेंटिफिकेशन  ऑथारिटी ऑफ इंडिया -यूआईडीएआई) के तहत भी  स्पष्ट कहा  गया है कि  आधार कार्ड  स्वैच्छिक होगा, अनिवार्य  नहीं। भारत के सिवा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक मुल्क में आधार जैसी कोई सिस्टम लागू नहीं किया गया है। अमेरिका, इंग्लैंड़  और यूरोप के किसी भी देश  में आधार जैसा कोई सिस्टम नहीं है जबकि अमेरिका और यूरोप बहु-नस्लीय (मल्टी-रेसियल) देश  हैं। भारत का बायोमेट्रिक डाटाबेस दुनिया का सबसे बडा डेटा संग्रह है। अभी तक भारत सरकार एक अरब (सौ करोड) से ज्यादा नागरिकों की  आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के निशान आधार कार्ड  के लिए जुटा चुकी है। सवा करोड आबादी वाले जिस देश  में मात्र साढे छह करोड लोगों के पास पासपोर्ट  और 20 करोड के पास ही ड्राइविंग लाइसेंस हों, वहां आधार कार्ड लोगों की पहचान का पुख्ता साधन बन सकता है। इससे लोगों को काफी सुविधाएं स्वतः मिल सकती हैं। इस बाते के  मद्देनजऱ   आधार को लेकर व्यक्त की जा रही आषंकाएं निर्मूल नहीं हैं। भारत का भ्रष्ट  तंत्र और लोगों में रातोंरात पैसा कमाने की तेज भूख के चलते  इतने विशाल  डेटाबेस को देखकर किसी के भी मुंह में पानी आ सकता है। इस बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। इस स्थिति में यह डाटाबेस नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार कर सकता है। दुनिया की गोपनीय से गोपनीय जानकारी को भी हैक करके उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह को हैक नहीं किया जा सकता। समकालीन व्यवस्था  की  विश्वसनीयता  पर कई बार  प्रश्नचिन्ह  लगता रहा है। वैसे भी इंटरनेट के आने के बाद दुनिया में कोई भी जानकारी गोपनीय नहीं रह गई है। आधार कार्ड पैन के लिए अनिवार्य होना चाहिए या नहीं, इसका फैसला देश  की  शीर्ष   अदालत करेगी। फिलहाल, सरकार को आम आदमी की आशंकाएं दूर करनी चाहिए।

गुरुवार, 4 मई 2017

ट्रंप का देसी विजन

इंटरनेट, विज्ञान एवं उन्नत प्रौद्योगिकी ने भले ही पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज बना दिया हो मगर “ खालिस  देसी जज्बा“ आज भी दुनिया में सर चढ कर बोल रहा है। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मेक इन इंडिया“ का जोर है तो अमेरिका में  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप का “बी अमेरिका, हायर अमेरिकन“ के विजन का दबदबा है। ट्रंप ने  राष्ट्रपति  चुनाव भी इसी वायदे पर जीता था। और अपने वायदे को अमली जामा देने के लिए  उन्होंने  सबसे पहले अमेरिकन और विदेशी  कंपनियों के लिए “ बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन” को अनिवार्य किया। ट्रंप की इसी नीति का परिणाम है कि भारत की अग्रणी आईटी कंपनी इंफोसिस ने मंगलवार को ऐलान किया कि वह अपने अमेरिकन कारोबार के लिए अगले दो साल 10,000 अमेरिकन को हायर करेगी। इंफोसिस दुनिया की अग्रणी आउटसोर्सिंग कंपनियों मेंसे एक है और इसके बाद भारत की अन्य  आउटसोर्सिंग कारोबारी भी यही नीति अपनाने के लिए बाध्य हों सकती हैं । भारतीय आउटसोर्सिंस कंपनियों का 60 फीसदी से ज्यादा का राजस्व अमेरिका से अर्जित किया जाता है। अमेरिका में  इंफोसिस के प्रतिष्ठित  आईबीएम, टैक-30 और लॉकहीड मार्टीन जैसे क्लाइंट है। जाहिर है  ट्रंप की नीतियों के कारण ही विदेशी  कंपनियों को अमेरिकन को हायर करना पडा रहा है हालांकि अब तक अमेरिका के उद्यमी, उधोगपति, कारोबारी और व्यवसायी स्वदेशी -बाहरी जेसे दकियानूसी सोच को दरकिनार कर केवल प्रतिभा को ही तरजीह दिया करते थे। अमेरिका ने इंफोसिस के इस पहल का स्वागत करते हुए इसे  राष्ट्रपति  ट्रंप की जीत करार दिया है। इंफोसिस के विदेशों  में लगभग 24,000 कर्मचारी है और इन मेंसे 15,000 अमेरिका में एच-1 बी वीजा पर काम कर रहे हैं। जनवरी में  राष्ट्रपति पदभार संभालते ही  ट्रंप ने पहली अप्रैल सेे एच-1बी के तहत प्रीमियम प्रोसिंसग आवेदन लेने बंद कर दिए । इसके तहत अमेरिकन कंपनियां किसी भी विदेशी को 1225 डॉलर की फीस चुका कर 15 दिन में अपने यहां बुला सकती है। अन्यथा रुटीन प्रकिया में कम-से-कम छह माह और इससे ज्यादा का समय लग जाता है। मगर ट्रंप प्रशासन ने इस सुविधा को बंद कर दिया है। इस साल लगभग 85,000 विदेशियों को इसी सुविधा के तहत अमेरिका लाया जाना था। ताजा स्थिति में यह मुमकिन नहीं है। कोई भी कंपनी इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती और इस स्थिति में उसके पास स्थानीय को रोजगार देने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता है। यही ट्रंप भी चाहते हैं। ट्रंप अमेरिकी कंपनियों पर एच-1बी सुविधा का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिकन कंपनियां  गैर-अमेरिकी विदेशियों  को इसलिए हायर करती है क्योंकि वे सस्ते में मिल जाते हैं। इससे स्थानीय लोगों से अन्याय हो रहा था। और अब अमेरिका की देखा-देखी आस्ट्रेलिया ने भी अपने वीजा कानून कडे कर दिए हैं और हाल ही में 200 के करीब व्यवसाय तुरंत प्रभाव से स्कील्ड लिस्ट से निकाल दिए  हैं । आस्ट्रेलिया के इस कदम से विदेशियों, खासकर भारतीयों को अब वहां जाना मुश्किल  हो जाएगा। हाल ही के कुछ सालों में आस्ट्रेलिया भारतीयों का पसंदीदा देश  बन चुका था। इग्लैंड ने हालांकि अभी वीजा नियम ज्यादा कडे नहीं किए हैं मगर यूरोपियन यूनियन से बाहर आने पर अलग-थलग पडी ब्रितानवी सरकार फिलहाल  प्रतिभा को रोककर अपना नुकसान नहीं करना चाहेगी। बहरहाल, ट्रंप की “बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन“ की नीति से  प्रतिभा से कहीं ज्यादा नुकसान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को होने जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का ही आकलन है कि अमेरिका को विज्ञान और प्रौद्योगिकी, तकनीक, अर्थ और यापार में सर्वोच्च बनाने में प्रतिभा के सम्मान वाली नीति का बहुत बडा हाथ है। प्रतिभा किसी देश  तक सीमित होकर नहीं रह सकती, अब तक अमेरिका इस नीति को अपनाता रहा है। ट्रंप अगर अमेरिका को महान (ग्रेट) बनाने चाहते हैं तो उन्हें भी प्रतिभा की कद्र करनी होगी।  

बुधवार, 3 मई 2017

अमानवीयता की इंतहा

पाकिस्तानी  सेना द्वारा  भारतीय सैनिकों के शवों को क्षत-विक्षत किए जाने के कृत्य पर पूरे देश  में जबरदस्त गुस्सा है। यह तो अमानवीयता की इंतहा है और केवल जंगली जानवरों ही इस तरह का कृत्य करते हैं। पाकिस्तान के इस कृत्य ने सभ्यता के सारे मानदंड लांघ दिए हैं। पाकिस्तान सेना ने भारत की सीमा में 200 मीटर अंदर घुसकर यह कृत्य किया। यह भारत के लिए और भी  शर्मनाक बात है कि पाकिस्तानी सेना भारत की सीमा में घुसकर उसके जवानों को मारकर  शवों को क्षत-विक्षत कर जाए और सेना देखती रह जाए। क्या यह  पाकिस्तान की सर्जिक्ल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई नही है?  पहली बार भारत ने पाकिस्तान की बार्डर एक्शन   फोर्स  का नाम लिया है। इससे साफ है कि भारत के खिलाफ  पाकिस्तान की यह सुनियोजित साजिश  थी। ताजा सूचना यह भी है कि सेना ने  आतंकी संगठन  लश्कर  के साथ यह कृत्य किया है। देश  को सबसे ज्यादा इसी बात का गुस्सा है। पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई के लिए देश  भर में जगह-जगह प्रदर्शन  किए जा रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी पाकिस्तान ऐसा अमानवीय कृत्य कर चुका है। 2013 में पाकिस्तान ने भारत के सैनिक लायंस नाइक हेम राज के  शव के साथ बर्बरता की थी और उसका सिर धड से अलग कर दिया था। पिछले साल नवंबर में पाकिस्तान ने भारत के तीन सैनिकों को मार डाला था और एक सैनिक के  शव को भी क्षत-विक्षत कर डाला था। कारगिल युद्ध के दौरान भी सैनिकों के शवों से भारी छेडछाड की गई थी। अंतरराष्ट्रीय  कानून के अनुसार  शवों से किसी भी तरह की छेडखानी नहीं की जा सकती। इस बारे में  स्पष्ट  दिशा -निर्देश  जारी किए गए हैं। जेनेवा कन्वेंशन  से लेकर ऑक्सफोर्ड मैनुअल तक में साफ-साफ कहा गया है कि सैनिकों के शवों  से किसी भी तरह की बदसलूकी नहीं की जा सकती है। सैनिकों के  शवों  के साथ किसी भी तरह की छेडखानी नहीं हो, इसके लिए काफी पहले 1907 में हेग कनवेन्शन  अपना लिया गया था। बाद में इसे जेनेवा  कनवेन्शन   में  शामिल  कर  लिया  गया। जेनेवा   कनवेन्शन में साफ हिदायत दी गई है कि सैनिक अथवा किसी भी मानव शव से छेडछाड नहीं की जा सकती। युद्ध के दौरान सैनिकों का मारा जाना स्वभाविक है और एक-दूसरे को पराजित करने के लिए हर तरह की रणनीति भी अपनाई जाती है मगर मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर जानवरों जैसा सलूक करने की कतई अनुमति नहीं होती है। इस्लाम में भी  शवों से छेडछाड जैसे कृत्य को  नापाक माना गया है। बहरहाल, पाकिस्तान की सेना को न तो मानवीय मूल्यों से सरोकार है और न ही ध्रर्म-ईमान से। पाकिस्तान को इस तरह का कृत्य करके नाक कटने के अपमान की भी परवाह नहीं है।  पूरा देश  अब इस सवाल का जवाब चाहता है कि सरकार कब तक पाकिस्तान की अमानवीय कृत्यों को सहन करती रहेगी? 2013 में जब सैनिक हेमराज का शव  क्षत-विक्षत किया गया था, तब भी यही कहा गया था कि पाकिस्तान को इस कृत्य का माकूल जवाब दिय जाएगा और चार साल बाद  अब वही कहा जा रहा है। आखिर यह माकूल जवाब दिया कब जाएगा? जनमानस पाकिस्तान और भारत के बीच इस कृत्य को लेकर डीजीएमओ स्तर की वार्ता से  जनता को संतुष्ट  नहीं  किया जा सकता । पाकिस्तान सफेद झूठ बोल रहा है कि उसकी सेना ने ऐसा कोई कृत्य नहीं किया है। वह पहले भी यही कह चुका है। पाकिस्तान के ताजा कृत्य से डीजीएमओ तो क्या किसी भी स्तर की वार्ता के कोई औचित्य नहीं है। सैनिक भी यही चाहते हैं कि बार-बार बेमौत मरने की बजाए, देष के लिए एक बार शहादत पाना कहीं ज्यादा बेहतर है। भारतीय सेना को पाकिस्तान से निपटने के लिए खुली छूट मिलनी चाहिए। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब इस बात को पुरजोर उठाया करती थी। मोदी सरकार को अब इसे पूरा करना चाहिए।

मंगलवार, 2 मई 2017

रेरा कितना प्रभावी

पहली मई से देश  में रीयल एस्टेट एक्ट ( रीयल एस्टेट रेगुलेशन एंड डवलपमेंट एक्ट-रेरा) के लागू होते ही “सपनों” का घर खरीदने वालों को  राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है। लिखा-पढी के बावजूद बिल्डरों की मनमानी पर अब तक कोई अंकुश  नहीं लग पाया है।  गृह निर्माण में अनावश्यक  बिलंब और तय समय पर घर का कब्जा नहीं देने की  शिकायतें आम हैं। कई बार बिल्डर पूरा पैसा लेकर भी तय समय पर घर को तैयार नहीं करते हैं। घर खरीदने वालों को इससे दोहरी मार पडती है। घर खरीदने के लिए उपभोक्ता बैंक से लोन लेता है और अगर उसे समय पर कब्जा नहीं मिले तो उसे दोहरा वित्तीय बोझ उठाना पडता है। बैक ऋण की  किश्त  भी देनी पडती है और साथ में किराए के घर में रहने के लिए रेंट भी देना पडता है। इसे दोहरे वित्तीय बोझ से अक्सर उपभोक्ता टूट जाता है। देश  की कानून प्रकिया बेहद खर्चीली, लंबी और “अंधी“ होती है और इसमें आम आदमी को तुरंत न्याय नहीं मिल पाता है। बिल्डर इसी स्थिति का फायदा उठाते हैं। रीयल एस्टेट एक्ट  के लागू होने से पहली बार घर खरीदने वालों को कानूनी ताकत मिली है।  लेकिन अभी भी इस एक्ट की राह में कई अवरोधक है। रीयल एस्टेट एक्ट एक तरह से मॉडल एक्ट है और केन्द्र द्वारा पारित एक्ट को लागू करना है या न करना , इसका पूरा दारोमदार राज्यों पर है। इसकी सबसे प्रमुख वजह यह है कि भूमि (लैंड) राज्य के अधिकार क्षेत्र (स्टेट सब्जेक्ट) में है और इसको लेकर किसी भी कानून के लिए राज्य की स्वीकृति अथवा सहमति अनिवार्य है। अब तक केवल सात राज्य- उत्तर प्रदेश , ओडीशा , गुजरात, बिहार, आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र  और मध्य प्रदेश - ही इस एक्ट को अधिसूचित कर पाएं हैं। केन्द्र चंडीगढ समेत पांच केन्द्र  शासित और  राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए एक्ट को अधिसूचित कर चुका है। इस स्थिति के  दृष्टिगत  जाहिर है जिन राज्यों (22) ने अभी तक इस एक्ट को अधिसूचित नहीं किया है, वहां के उपभोक्ताओं को इस कानून का कोई लाभ नहीं मिल पाएगा। इतना ही नहीं कुछ राज्यों ने बिल्डरों की मदद करने की गर्ज से इस एक्ट के कुछ प्रावधानों को ही नरम कर दिया है। इस तरह अगर रीयल स्टेट एक्ट को सम्रग रुप में लागू नहीं किया जाता है ,तो इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी। एक्ट के तहत घर के खरीदार, बिल्डर और एस्टेट एजेंट के लिए  स्पष्ट  नियम बनाए गए हैं। प्रत्येक बिल्डर और प्रापॅटी एजेंट को राज्य रेगुलेटरी ऑथारिटी के पास 30 जुलाई तक पंजीकरण करवाना अनिवार्य  है। बिल्डर को  खरीदार से ली गई रकम का 70 फीसदी एक अलग खाते में जमा कराना होगा और इस पैसे को केवल निर्माण के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा। एक्ट के तहत सबसे बडी राहत वाला प्रावधान यह है कि बिल्डर को प्रोजेक्ट में किसी भी तरह का बदलाव (यूनिट बढाने-घटाने) करने के लिए 70 फीसदी खरीदारों की सहमति जरुरी होगी। एक्ट के तहत  दोषी  बिल्डर को 3 साल की कैद और जुर्माना की सजा हो सकती है। घर खरीदने के बाद पांच साल में किसी भी तरह की स्ट्रक्चरल खामी को दुरुस्त करना भी कानूनन अनिवार्य है। एक्ट के लागू होने के बाद बिल्डर को कारपेट एरिया के हिसाब से ही खरीदार को बेच पाएंगें। बहरहाल, एक्ट की सीरत और नीयत निसंदेह नेक है मगर अभी तक यह  स्पष्ट  नहीं है कि जिन बिल्डरों ने पहले से ही लोगों को चूना लगा रखा है, उनका क्या होगा। एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा अगर को बिल्डर बीच में ही प्रोजेक्ट को छोड देता है या भाग जाता है, पीडितों को कौन राहत देगा और उन्हें किस तरह से कंपन्सेट किया जाएगा? खरीदार की तुलना में बिल्डर ज्यादा ताकतवर होता है। कानून में खरीदार के हितों के लिए रेगुलेटरी कदम का न होना इस एक्ट को अप्रभावी (दंतहीन) बना सकता है।

सोमवार, 1 मई 2017

कश्मीर में बद-से-बदतर हालात

कश्मीर   की पर्वत श्रृंखलाओं पर से बर्फ पिघलते ही घाटी में हिंसा का तांडव  शुरु हो गया है। हालात बद-से-बदतर हो रहे हैं। वीरवार को कुपवाडा जिले में नियंत्रण रेखा के समीप भारतीय सैन्य कैंप पर फियादीन हमला केन्द्र सरकार के लिए गंभीर चिंता का सबब होना चाहिए। 1999 में सैनिकों पर हमले  शुरु होने के बाद  यह सैन्य ठिकाने पर फियादीन का पहला आत्मघाती हमला है। और सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि पहली बार स्थानीय लोगों ने फियादीनों के शवों को पाने के लिए सैन्य कैंप का घेराव तक किया। इसके  अर्थ हैं कि कश्मीर  की अवाम भी अब चरमपंथियों के साथ हो ली है। कश्मीर  के अवाम का चरमपंथियों के संग लडाकू रोल में शरीक होना आगे चलकर सरकार और सुरक्षाकर्मियों को गंभीर चुनौती पेश  कर सकती है। वीरवार को फियादीन के शवों के लिए सैन्य कैंप का घेराव इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि स्थानीय लोग फियादीनों की पहचान को छिपाना  और सैन्य  शिविर पर हमले की जांच को बाधित करना चाहते थे।  पाकिस्तान की संलिप्तता साबित करने के लिए सेना आतंकियों के डीएनए टेस्ट कराती रही है।  अब तक लोग-बाग सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाजी करके अथवा सुरक्षाकर्मियों को बाधित करके आतंकियों को भगाने में मदद किया करते थे। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था।  आतंकियों के  शवों को पाने के लिए  सैन्य कैंप का घेराव पहली बार किया गया। यह सुरक्षाकर्मियों के लिए नई मुसीबत खडी कर सकता है। पत्थरबाजी की बढती घटनाओं ने इस भ्रम को भी तोड डाला है कि नोटबंदी ने इन पर रोक लगा दी थी। मोदी सरकार अब तक इस मुगालते में थी कि नोटबंदी के कारण नवंबर के बाद से घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं लगभग बंद हो चुकी थीं जबकि असलियत यह है कि सर्दियों में बर्फबारी के कारण अक्सर पत्थरबाजी की घटनाएं कम हो जाया करती हैं। महिलाओं, खासकर छात्रों  की पत्थरबाजी में बढती भागीदार से सरकार का यह भ्रम भी टूट जाना चाहिए कि कश्मीर  की अवाम केवल पैसों के लालच में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकती है। कश्मीर  में 9 अप्रैल को श्रीनगर लोकसभाई सीट के लिए कराए गए उपचुनाव के बाद से भडकी हिंसा और तल्ख हो गई है। पत्थरबाजी की घटनाएं बढती जा रही हैं और अब महिलाएं भी भारी संख्या  में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकने में आगे आ रही हैं। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। केन्द्र द्वारा 80,000 करोड़  रु का  विशेष आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद भी अगर अवाम राष्ट्रीय  मुख्यधारा से नहीं जुड पा रहा है, तो हालात अत्याधिक गंभीर है और मोदी सरकार को स्थिति पर काबू पाने के लिए अविलंब ठोस कदम उठाने की जरुरत है। सेना को भी फियादीन हमलों के प्रति अपनी सुरक्षा व्यवस्था और चाक-चौबंद करनी पडेगी। सुरक्षाकर्मियों पर लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद आतंकी हमले जारी हैं। यह बात भी चिंता का विषय  है कि एक ओर हम पाकिस्तान को सबक सिखाने का दम भरते हैं मगर दुनिया की पांचवे सबसे बडी सैन्य हथियार खरीद करने वाली भारतीय सेना आतंकी हमलों से सैनिकों को सुरक्षित रखने के लिए नए सुरक्षा कवच तक खरीद नहीं पाई है। अगर अमेरिका और चीन की सेना के पास अत्याधुनिक सुरक्षा कवच हो सकते हैं, भारतीय सेना के पास क्यों नहीं? कष्मीर को लेकर मोदी सरकार की  अभी भी कोई कारगर नीति नहीं है। यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है कि आार्थिक पैकेज देकर  कश्मीर की जनता को लुभाया नहीं जा सकता है। आजादी के बाद से आज तक केन्द्र  कश्मीर  को जितना कुछ दे चुकी है, उतना अन्य किसी भी राज्य को नहीं दिया गया है। जमीनी सच्चाई यह है कि कोई भी पैकेज आम आदमी तक पहुंचता ही नहीं है। अधिकतर मदद  बिचौलिए, भ्रष्ट  नौकरशाही और सियासी तंत्र हडप जाते हैं। इससे कश्मीर  की अवाम के घाव और गहरे होते रहे हैं। इन पर अब मरहम-पट्टी करने की जरुरत है।