बुधवार, 7 दिसंबर 2016

जयाः अम्मु से अम्मा तक का सफर

आजाद भारत के कर्नाटक राज्य (तब मैसूृर) में जन्मी-पली और कन्नड सिनेमा से  तमिल फिल्मों में पर्दापण कर नायिका से  सियासी क्वीन बनी जयराम जयललिता के निधन से एक युग का अंत हो गया है। वे आम औरत की तरह कतई नहीं थी। उन्होंने कई परंपराएं तोडीं और नई परंपराएं कायम की।  मीडिया के लिए जयललिता एक एग्निमा थीं, विरोधियों के लिए तीखी मिर्च, समर्थकों के लिए “अम्मा“।  भारत में महिला को बुलंदियां  छूने के लिए जितना संघर्ष  करना पडता है, जयललिता ने उससे कहीं ज्यादा स्ट्रगल किया। और संघर्ष  इतना किया कि  अम्मु की  शख्सियत आसमान को छूने लग पडी। तमिल नाडु  में अपने जमाने में कल्ट माने जाने वाले एमजीआर (एम जी रामचन्द्रन) की राजनीतिक विरासत को पाना और निभाना आसान नहीं था। पर जयललिता ने यह भी संभव कर दिखाया। उन्होंने एमजीआर को भी पीछे छोड दिया। वे इरादों की  पक्की थीं और जिस बात की ठान लेती, उसे पूरा करके ही हटतीं । तमिल नाडु विधानसभा में एक बार द्रमुक सदस्य ने उनका पल्लू खींच लिया था। इससे गुस्साई जयललिता ने तब सदन में ही द्रमुक सरकार को गिराने का संकल्प लिया और इसे 1991 में मुख्यमंत्री बनकर  पूरा करके छोडा। राजनीति सूझबूझ में जया की सानी नहीं थी। 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें  लागू किए जाने पर तमिल नाडु में विकट  स्थिति  खडी हो गई थी। ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाना था मगर सुप्रीम कोर्ट  की व्यवस्था के अनुसार आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नही दिया जा सकता था। ओबीसी को आरक्षण दिए जाने से तमिल नाडु में आरक्षण की सीमा 69 फीसदी को पार कर रही थी। यह सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था की अवहेलना होती। तब जयललिता ने विधानसभा में 69 फीसदी आरक्षण सीमा का विधेयक पारित करवाकर केन्द्र को भी विवश  कर दिया क़ि इसे संविधान की नौंवी अनुसूची में डालकर आरक्षण को न्यायिक समीक्षा से ही बाहर किया जाए। इसी वजह बाद में संविधान में 76वां संशोधन हुआ। जयललिता अडियल इतनी कि 2001 में राज्य के दो लाख कर्मचारी जब अचानक हडताल पर चले गए, तब पंगु प्रशासन से क्षुब्ध मुख्यमंत्री जयललिता ने सभी हडताली कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया। किसानों को दी जा रही मुफ्त बिजली बंद कर दी और लॉटरी को भी समाप्त   कर दिया।  2004 में  कांचीपुरम में एक मंदिर के मैनेजर की हत्या में कांची पीठ के  शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का नाम आया, तब जयललिता उन्हें गिरफ्तार करवाने से भी पीछे नहीं हटी। अक्कडपन, प्रतिशोध और रुखापन  उनके स्वभाव का अहम हिस्सा थे।  द्रमुक की सरकार बनने पर जब मुख्यमंत्री करुणानिधि ने उनके गहने जब्त किए गए, जया ने 14 साल तक गहने नहीं पहने। बाद में मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने करुणानिधि को आधी रात गिरफ्तार करवाया था। दो साल की थी, पिता चल बसे। पिता की कमी उन्हें ताउम्र खलती रही। संभवतय, इसी वजह पुरुषो के प्रति उनका पूर्वाग्रह बना रहा। इसी वजह समकालीन राजनीतिक नेताओं को उन्होंने मर्दानगी दिखाने का कोई अवसर नहीं दिया । जयललिता अविवाहिता रहीं। पुरुषों  को या तो दिल में जगह दी या चरणों में।  बचपन में अम्मु नाम रखा गया और राजनीति में आने पर जयललिता गरीबों, कमजोर तबकों और महिलाओं की अम्मा बन गईं। तमिल नाडु में  बाहृमण विरोधी मानसिकता  द्रविड आंदोलन की नींव बनीं थी। तमिल नाडु में पिछडों का बाहुल्य है और  मगर  विडम्बना देखिए कि जयललिता ब्राहृण होते हुए भी पिछडों के दिलों पर राज करती रही और उन्ही के समर्थन से लगातार पांच बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। गरीबों के लिए जयललिता ने अम्मा नमक, अम्मा सीमेंट, अम्मा फार्मेसी, अम्मा कंटीन और अम्मा पीने का पानी जैसी स्कीमें  शुरू  की। गरीब और कमजोर तबके जयललिता की आंखों में अपने सपनों को देखते। उनके निधन से तमिल नाडु की सियासत में जो शुन्य आया है, उसे लंबे समय तक भरा नहीं जा सकता ।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन

गुरु नगरी अमृतसर में रविवार को सपन्न दो दिवसीय हार्ट ऑफ एशिया  (मिनिस्टीरियल कांफ्रेंस ऑन हार्ट ऑफ एशिया- इस्तांबुल प्रोसेस ऑफ अफगानिस्तान) सम्मेलन में भारत ने अफगानिस्तान के साथ मिलकर पाकिस्तान को घेरने की कोशिश  की है।  भारत को कम-से-कम इस बात का सकून है कि जो काम गोवा में नहीं हो पाया, अमृतसर में वह पूरा कर लिया गया।  अक्टूबर में गोवा में सपन्न “ब्रिक्स“  शिखर सम्मलेन डिक्लेरेशन में भारत अल-कायदा, जैश -ए-मोहम्मद और लश्कर -ए-तैयबा जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनों का उल्लेख करवाने में विफल रहा था। हार्ट ऑफ एशिया सम्मलेन के समापन पर जारी अमृतसर डिक्लेरेशन  में लश्कर  और जैश  को क्षेत्र में  शांति  के लिए सबसे बडा खतरा बताया गया है। अफगानिस्तान  ओर अन्य देशों  द्धारा इस रेसोलुशन का अनुमोदन किए जाने से इस  डिक्लेरेशन  की  विश्सनीयता को पाकिस्तान भी चुनौती नहीं दे सकता। सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को अफगानिस्तान के  राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान प्रधानमंत्री के विदेशी  मामलों के सलाहकर (वास्तव में विदेश  मंत्री) सरताज अजिज  की उपस्थिति में इस्लामाबाद को खरी-खोटी सुनाई।  अफगानिस्तान के विकास के लिए  पाकिस्तान की 500-मिलियन  डॉलर मदद की पेशकश  की  गनी ने जमकर खिल्ली उडाते हुए इस बात पर जोर दिया कि  आतंक का खात्मा करना काबुल के लिए कहीं ज्यादा अपरिहार्य है। अफगानिस्तान तालिबानी आतंक से लडते-लडते बेहाल हो चुका है और अगर इस देश  को वास्तव में आगे बढना है, तो आतंक को परास्त करना होगा। अफगानिस्तान तालिबान को पाकिस्तान का खुला समर्थन है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार को हार्ट ऑफ  एशिया  सम्मेलन में साफ शब्दों में कहा कि अगर पाकिस्तान तालिबान की मदद करना छोड दे, तो अफगानी सेना एक माह में उसका सफाया कर सकती है। पाकिस्तान जिस तरह जैश  और लश्कर को  भारत में विध्वसंक गतिविधियों के लिए हर तरह से मदद दे रहा है, उसी तरह इस्लामाबाद तालिबानी आतंकियों की मदद कर रहा है। भारत से कहीं ज्यादा  अफगानिस्तान ने पाकिस्तान प्रायोजित  विध्वसंक गतिविधियां झेली है। यानी दोनों देशों  का  दर्द  एक जैसा है। अमृतसर सम्मेलन ने अपना पूरा ध्यान तीन ज्वलंत मुद्दों पर केन्द्रित रखाः अफगानिस्तान में अमन-चैन स्थापित करने के लिए आतंक को मिलकर परास्त करना, विकास को तेज करने के लिए कनेक्टिविटी मुहैया कराना और आर्थिक खुशाहली सुनिश्चित करना।  अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के रहते न तो विकास संभव है और न ही अमन-चैन। वस्तुतः, अमन-चैन के बगैर किसी भी देश  में आर्थिक विकास संभव नहीं है। आतंक के बावजूद 2002 के बाद से अफगानिस्तान उदार अंतरराष्ट्रीय मदद और विदेशों  में कार्यरत अफगानियों से मिलने वाली मुद्रा से  तेजी से आगे बढा है। मगर पाकिस्तान भारत की तरक्की की तरह अफगानिस्तान की आर्थिक उन्नति को भी पचा नहीं पा रहा है। इसीलिए, आतंकियों की मदद करके भारत और पाकिस्तान को अस्थिर करने की हरचंद कोषिष कर रहा है। अमृतसर डिक्लेरेशन में साफ-साफ कहा गया है कि आतंक हार्ट  ऑफ एशिया की  शांति  और स्थायित्व के लिए सबसे बडा खतरा है।  डिक्लेरेशन में आतंकियों की मदद करने वालों को चेताया गया है कि वे आतंक को पालना-पोसना बंद कर दे। बगैर नाम लिए इशारा पाकिस्तान की ओर है हालांकि पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में  शिरकत करके क्षेत्र में अलग-थलग पडने से बचने की कोशिश  की है। तथापि सम्मेलन में अफगानिस्तान द्धारा  खरी-खोटी सुनाई जाने पर  पाकिस्तान को अपमान का घूंट पीना पडा है। पाकिस्तान प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजिज की भारत के नेताओं से बातचीत नहीं होने से भी इस्लामाबाद को फजीहत होना पडा है। अमृतसर  डिक्लेरेशन में और भी कईं बातें हैं जो पाकिस्तान के कान खींचने के लिए पर्याप्त है मगर इस्लामबाद बडा डीढ है। पाकिस्तान को इन सब बातों से कोई फर्क  नहीं पडता है। दरअसल, पाकिस्तान के सियासी नेता पूरी तरह से सेना के प्रभाव में है और पाकी सेना  भारत और अफगानिस्तान को अस्थिर करने में लगी हुई है। इन हालात में पाकिस्तान को अगर नकेल डालनी है , तो चीन को भी साथ लेना होगा।  

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

पाकिस्तान की कुटिल हरकत

 अमेरिका के नव-निर्वाचित  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच  टेलिफोन पर हुई बातचीत की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। पाकिस्तान ने छल-कपट करके जिस तरह से इस बातचीत को बढ-चढ कर अपने पक्ष में पेश  किया है, उससे इस्लामाबाद फिर पूरी दुनिया के सामने नंगा हो गया है। पाकिस्तान प्रैस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ने बाकायदा प्रैस विज्ञप्ति जारी करके दावा किया है कि नव-निर्वाचित  राष्ट्रपति  ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा है कि “ आप  (शरीफ)  बहुत अच्छा काम कर रहा है जो हर तरफ साफ नजर आ रहा है“। पाकिस्तान का यह भी दावा है कि ट्रंप ने पाकिस्तान को गजब का देश  बताते हुए कहा है कि उसके लोग बहुत समझदार हैं“। मुमकिन है नए राश्ट्रपति ने नवाज शरीफ के बधाई संदेश  के जवाब में ऐसा कहा हो। अमूमन, जब भी दो देशों  के राज्याध्यक्ष  अथवा बड़े नेता एक-दूसरे से बात करते हैं, तो कटुता की बजाए  शालीनता और प्यार-मोहब्बत से औपचारिक बातें करते हैं मगर इसका यह कतई मतलब नहीं होता है कि इससे रातों-रात द्धिपक्षीय संबंध सुधर जाएंगे। अमेरिका के लिए पाकिस्तान आज भी “आतंक“ को पालने-पोसने वाला देश  है और नव-निर्वाचित  राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान कई बार यह बात कह चुके हैं। पाकिस्तान के इस महिमामंडन पर टीम ट्रंप ने स्पष्टीकरण भी दिया है कि नवाज शरीफ ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बधाई देने के लिए फोन किया था और इस दौरान दोनों नेताओं में “सकारात्मक“ बातचीत हुई। पाकिस्तान ने इस बातचीत को मसालेदार बनाकर अपने फायदे के लिए भुनाने की कोशिश की है। टीम ट्रंप के अनुसार पाकिस्तान सरकार का बयान मूल बातचीत से एकदम बेमेल है। इसे खूब बढा-चढा कर महिममंडित किया गया है। किसी देश  द्धारा   दो बडे नेताओं के बीच बातचीत को बढा-चढा कर पेश  करने का  यह अनोखा मामला है। पाकिस्तान की इस हरकत से कूटनीति  शर्मसार हुई है। अमेरिकी मीडिया ने भी पाकिस्तान  की इस बेजा हरकत पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि यह प्रोटोकोल के गंभीर उल्लघनं का मामला है। अब दुनिया को पता चला है कि पाकिस्तान कितना झूठ  बोलता है। कोई भी समझदार नेता नवाज  शरीफ की तरह “अपने मुंह, मियां मिठ्ठू“ नहीं करेगा। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति ने अभी शपथ भी ग्रहण नहीं की है। अभी वे अपनी टीम के गठन की प्रकिया में है। पाकिस्तान के प्रति ट्रंप की नीति क्या होगी, इसका खुलासा उनके व्हाइट हाउस पहुंचने के बाद ही होगा। मगर इतना तय है कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच मौजूदा तल्ख संबंध जल्द सुधरने वाले नहीं है। ट्रंप ही नहीं, निवृतमान राष्ट्रपति  बराक ओबामा भी पाकिस्तान को “आंतक“ मददगार देश  बता दे चुके हैं और कई बार उसे आतंकियों पर नकेल डालने की सलाह दे चुके हैं। सच यह है कि पाकिस्तान का वजूद ही आतंक पर टिका है। वहां की सरकार के लाख चाहने के बावजूद पाकिस्तान आतंकियों की पीठ थपथपाने से अपने हाथ नहीं खींच सकता । मगर अमेरिका अथवा दुनिया का कोई भी सभ्य देश  उसकी इस विवशता को सहने से रहा। ट्रंप ने अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जब-जब भी पाकिस्तान का उल्लेख किया, छाती ठोंक कर पाकिस्तान को सबक सिखाने की कसमें खाईं। सोशल मीडिया पर ट्रंप ने साफ-साफ लिखा था“ इसे सीधा समझ लें, पाकिस्तान हमारा दोस्त नही है। हमने उसे अरबों डॉलर की मदद दी पर हमें क्या मिला। विश्वासघात , अपमान और उससे भी बुरा। अब समय आ गया है कि उससे सख्ती से निपटा जाए। भारत के साथ मिलकर उसे सबक सिखाउंगा“। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति व्हाइट हाउस पहुंचकर यह सब भूल जाएंगे, पाकिस्तान को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए। बहरहाल, छल-कपट से किसी भी देश  की विदेश  नीति की दिश नहीं बदली जा सकती। विश्वासघात , झूठ-फरेब, छल-कपट पाकिस्तान की फितरत है। पाकिस्तान की ताजा हरकत ने भी यही साबित किया है। कहते हैं “कुते की पूंछ  को 12 साल भी तेल में रखा जाए, वह सीधी नहीं होगी। पाकिस्तान पर यह कहावत सौ फीसदी मौजूं होती है।        

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

नोटबंदी और ग्रोथ

देश  के लिए यह राहत की बात है कि बीते तिमाही (जुलाई-सितंबर) में  सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) ग्रोथ रेट में पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की तुलना में 0.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज  हुई है। पहली तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.1 फीसदी थी और दूसरी तिमाही में यह 7.3 फीसदी । एक साल पहले इसी अवधि में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.6 फीसदी थी। अक्टूबर में   उधोग  की   धडकन माने जाने वाले आठ उधोगों के कोर उत्पादन में भी एक फीसदी की वृद्धि दर्ज  हुई है। तथापि यह राहत जल्द ही काफूर हो सकती है। एक साल बाद जीडीपी ग्रोथ रेट में 0.4 फीसदी की गिरावट चिंता का विषय है। ताजा आंकडों से लग रहा है कि सरकार का पिछले साल के ग्रोथ रेट को पार करने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। पिछले साल जीडीपी विकास दर   7.6 फीसदी रही थी। ताजा स्थिति में इस साल (2016-17)  7.6 फीसदी ग्रोथ हासिल करना भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। 8 नवंबर को प्रधानमंत्री द्धारा 500 और 1000 रु के नोट बंद किए जाने से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पडा है और नोटबंदी के बाद से सकल घरेलू उत्पादन में  शिथिलता देखी गई है। बाजार में नगदी के संकट से फॉस्ट ग्रोथ के लिए आवश्यक   तत्व अचानक गायब हो गए हैं। समय पर बुआई नहीं होने और नगदी संकट से समय पर खाद और बीज नहीं मिलने के कारण रबी की फसल का उत्पादन लक्ष्य हासिल करना मुमकिन नहीं लग रहा है। दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट में मामूली वृद्धि कृषि  में 3.3 फीसदी ग्रोथ के कारण मुमकिन हुई है। पहली तिमाही में कृषि  में अपेक्षाकृत ग्रोथ नहीं होने से जीडीपी में वृद्धि दर  7.1 फीसदी दर्ज हो पाई थी । रबी सीजन में कृषि  की विकास दर  3.3 फीसदी रहेगी, इसकी क्षीण संभावनाएं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज ग्रोथ का सबसे बडा कारण हैः लोगों का संस्थागत गवर्नेंस पर अटूट भरोसा। ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियां तो इसी भरोसे पर चलती है। देश  में पहली बार नोटबंदी ने जनमानस के इस भरोसे को तोडा है। विख्यात अर्थषास्त्री नोबेल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन का आकलन है कि नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की जड पर हमला किया है। पिछले बीस साल से भारतीय अर्थव्यवस्था में व्याप्त तेजी की प्रमुख वजह भी भरोसा ही है। लोग-बाग सरकार द्धारा जारी नोटों पर भरोसा करते है और अगर सरकार खुद नोटबंदी से इस भरोसे को तोड दे, तो लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा उठना तय है। लोग अपने ही खातों से पैसा नहीं निकाल पाएं, तो वे बैंकों में अपना धन जमा क्यों करेंगे? देश  में हर छोटा-बडा यही कह रहा है कि नोटबंदी का मकसद तो अच्छा है मगर इसका कार्यवन्यन एकदम “निरंकुश “ है। नोटबंदी को लगभग एक महीना होने जा रहा है, मगर लोगों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही है। नगदी की आपाधापी में लोगों को काफी कुछ खोना पडा है। दुनिया में पहली बार नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के कारण  लोगों को अपनी जान तक गंवानी पडी है। सियासी नेताओं समेत बडे लोगों को कोई परेशानी नहीं है। पुराने नोट बदलने  के लिए न तो उन्हें कतार में खडा होना पडता है , और न ही  उन्हें नगदी की समस्या झेलनी पडी है। नोटबंदी से टैक्स चोरी करके छिपाया गया धन सरकारी खजाने में आने से जितना फायदा होगा, उससे कही ज्यादा नुकसान अर्थव्यवस्था की सतत ग्रोथ के रुक जाने से होगा। सरकार ने खुद माना है कि हालात सामान्य होने में चार माह लग सकते है। निष्कर्ष   यह है कि नोटबंदी से जनता हलकान है। उत्पादन और कारोबार पर प्रतिकूल असर पड रहा है।  उत्पादन रुक जाने से रोजगार के अवसर भी कम हो गए है। रोजगार नहीं है तो आय भी नहीं है। और इंकम नहीं होने से मांग भी नहीं है। इस तरह सारी की सारी आर्थिक गतिविधियां  शिथिल पड गई हैं। नोटबंदी दीर्घकालीन में असरदार होती है या नहीं, मगर अल्पकाल में इसका प्रतिकूल असर पड रहा है।  

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

पहले पठानकोट, फिर उडी, अब नगरोटा;

पाकिस्तान प्रयोजित आतंक ने एक बार फिर अपना भयावह चेहरा दिखा दिया है और भारत की सैन्य ताकत को चुनौती दी है।  उडी हमले के 72 दिन बाद आतंकियों ने सेना पर फिर हमले करके दो सैन्य अधिकारियों समेत सात जवानों की जानें ले लीं। आतंकी पुलिस की वर्दी में थे। मंगलवार को ही जनरल कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तान सेना के अध्यक्ष का पदभार संभाला था। एक ओर नए सेनाध्यक्ष नियंत्रण रेखा पर तनाव को कम करने की बातें कर रहे थे, तो दूसरी ओर पाकिस्तान के पिठ्ठू आतंकी भारतीय सेना पर हमले कर रहे थे। पाकिस्तान तनाव कम करने के लिए बातचीत की पेशकेश  कर रहा है, तो आतंकियों को ढाल बनाकर भारत पर हमले कर रहा है। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान किस तरह दोगली बातें करता है।  मंगलवार को जम्मू-कश्मीर  में एक साथ दो हमले हुए। पहला हमला जम्मू के नगरोटा में सेना कैंप पर किया गया। इसमें 2 मेजर समेत 7 सैनिक  शहीद हो गए। हमले के दौरान  आतंकियों ने महिलाओं और बच्चों को भी बंधक बनाया, जिन्हें सुरक्षित छुडा लिया गया। दूसरा हमला नगरोटा से 70 किमी दूर चमलियाल में हुआ। मुठभेड मे 3 आतंकी मारे गए मगर बाद में सर्च ऑपरेशन के दौरान हुए विस्फोट में सीमा सुरक्षा दल के डीआईजी समेत 5 जवान घायल हो गए। बहरहाल, उडी हमले के बाद से अब तक पाकिस्तान से आए आतंकियों ने सैन्य ठिकानों पर चार बडे हमले किए हैं। भारतीय सेना ने तीन को तो विफल कर दिया मगर वह राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर स्थित नगरोटा हमले को विफल नहीं कर पाई। खुफिया रिपोर्ट  के अनुसार सात आतंकी चमलियाल के रास्ते भारतीय सीमा में घुस आए । हमेशा  की तरह पाकिस्तान रेंजर्स  ने उन्हें कवर किया। तीन आतंकी तो सीमा सुरक्षा बलों ने चमलियाल में ही मार गिराए मगर चार आतंकी सुरंग के रास्ते 70  मिलोमोटर की दूरी पर स्थित नगरोटा सैन्य कैंप पहुंच  गए। मुख्य गेट पर सुरक्षा गार्ड को ग्रेनेड से  मार गिराया और सेना के 16 कोर के कैंप में घुस आए। महिलाओं समेत सैनिकों के परिजनं को बंधक बना लिया। इसके बाद आतंकियों से मुठ्भेड में दो मेजर समेत 7 सैनिक मारे गए। हमले में दो मेजर की शहादत से साफ  है कि आतंकी बडे सैनिक अधिकारियों को निशाना बनाना चाहते थे। नगरोट हमले ने एक बार फिर सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खडा कर दिया है। सितंबर में उडी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर  स्थित सभी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चाक-चौबंद(?) किया गया था । मगर ताजा हमले से लगता  है कि देश  ने उडी हमले से भी कोई सबक नहीं सीखा है। पहले पठानकोट, फिर उडी और अब नगरोटा। और हर बार वही सुरक्षा में भरी चूक और आतंकी इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। सैन्य  ठिकानों पर साल में तीन-तीन आतंकी हमले। आतंकी सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने और देश  की सैन्य शक्ति को चुनौती देने के मकसद से जानबूझकर सैन्य  ठिकानों पर हमले कर रहे है। मुठ्ठी भर आतंकियों द्वारा अभेध  भारी सुरक्षा सपन्न सैन्य ठिकानों में घुसकर सैनिकों की हत्या करना इस बात के संकेत हैं कि सुरक्षा बल आतंकियों को रोके नहीं रोक पा रहे हैं। नगरोटा हमले में किसी स्थानीय सूत्र का हाथ है, इस बात से कहीं ज्यादा अहम यह है कि खुफिया एजेंसियों की चेतावनी के बावजूद एतिहाती सुरक्षा  उपाय क्यों नहीं किए गए ? खुफिया एजेंसियां सतर्क  नहीं भी करती, तो भी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को हर हाल में चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था। हाफिज सइद समेत पाकिस्तानी  आतंकी संगठनों के सरगना आए दिन भारत को सबक सिखाने की धमकियां देते रहते हैं। इस साल अब तक आतंकी नौ बडे हमले कर चुके हैं और इनमें सुरक्षा बलों के 76 जवान मारे जा चुके है। आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा।   निश्चित  तौर पर, एक और बडे सर्जिकल स्ट्राइक की जरुरत है।