शनिवार, 5 दिसंबर 2015

Narendera Modi's Fan Barack Obama

                                        मोदी के मुरीद ओबामा

कहते हैं “सम्मान और अपमान किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और न ही किसी के वश  में होता है।  जो स्थिति आज है, वह कल नहीं रहेगी और जो कल था, उसकी आज पुनरावृति नहीं हो सकती। शा स्त्रों और ग्रंथों का यही निचोड है। इसे विडबंना ही कहा जाए कि जिन नरेन्द्र मोदी को अमेरिका समेत पूरा पश्चिम  गुजरात दंगों के चलते “अछूत“ मानता था, उन्हीं की आज वे  दिल खोलकर तारीफ करते नहीं अघा रहे हैं। अमेरिका के  राष्ट्रपति  बराक ओबामा तो नरेन्द्र मोदी के मुरीद हो गए हैं। ओबामा का मानना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्पष्ट  नजरिया है। वे अपनी जीवन की कहानी के नायक हैं।  उनकी तथ्यों पर गजब की पकड है और मोदी अपने देश  तथा उससे  जुड़े  विभिन्न मुद्दों की अच्छी समझ रखते हैं। आर्थिक मामलों में उनके महत्वाकांक्षी विजिन से भारत को तेजी से आगे ले जाने की क्षमता नजर आ रही है। पुरातन और आधुनिकता का मिश्रण करके मोदी भारत को बुलदियों तक ले जा सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्र्पति  के मुताबिक मोदी की “चाय बेचने वाली “पृश्ठभूमि“ का ख्याल करते हुए उनका प्रधानमंत्री बनना भारतीय लोकतंत्र की गतिशीलता और भारत के उदय की क्षमता दर्शाता  है। ओबामा मोदी के कूटनीति कौशल और नेतृत्व क्षमताओं के भी कायल हैं।  भारत में अगर कोई प्रधानमंत्री की तारीफ करे तो इसे हम “ खुशामदगी“ अथवा “श्लग्या “ मान सकते हैं, मगर दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का राष्ट्रपति अगर नरेन्द्र मोदी की तारीफ करता है, तो देशवासियों का सीना  56 इंच का हो जाता है। नरेन्द्र मोदी को अभी प्रधानमंत्री बने बमुश्किल  डेढ साल का समय हुआ है मगर इतने कम समय में उन्होंने विश्व  के अग्रणी नेताओ की पंक्ति में अपनी जगह बना ली है। प्रधानमंत्री की इस छवि से निश्चित  तौर पर भारत की छवि में भी निखार आया है।  डेढ साल पहले तक जिस भारत को “घोटालों से पीडित कमजोर मुल्क“ माना जाता था, वही आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया की बडी ताकत बनकर उभरा है। भारत की इस बढती ताकत से पाकिस्तान भी सहमा हुआ है। चीन भी भारत का लोहा मानने के लिए बाध्य हो रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत ने ग्रोथ के मामले में चीन को भी पछाड दिया है। मोदी सरकार द्वारा तेजी से आर्थिक सुधार लागू करने की राह में बाधाओं  के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई है और गति पकड रही है। यूरोप, जापान और चीन समेत जहां अधिकतर देश  मंदी की चपेट में है, वहीं भारत तेजी से आगे बढ रहा है।  अगले वित्तीय वर्श  में भारत की ग्रोथ 8 फीसदी को पार कर जाएगी। यह चीन की ग्रोथ से ज्यादा है। शेयर और कमोडिटी बाजार भी सुधरे  हैं । भारत का भुगतान संतुलन तीन साल पहले की तुलना में कहीं बेहतर है भले ही यह स्थिति तेल की कीमतें गिरने के कारण बनी है। राजनीतिक स्थिरता (मेक्रो स्टेबिलिटी) के कारण भारत में विदेशी  निवेश  का प्रवाह बडा है। भूमि अधिग्रहण कानून में वांछित संशोंधन नहीं होने और गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के लटके रहने के बावजूद  मोदी सरकार ने निवेशकों का भारत में भरोसा बढाया है। तथापि हाल ही में असहिष्णुता  की घटनाओं ने विदेशों , विशेषतय पश्चिम  में भारत की छवि को फिर दागदार किया है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इससे विदेशों  में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत छवि प्रभावित नहीं हुई है। अमेरिका के  राष्ट्रपति  द्वारा प्रधानमंत्री की तारीफ करना इस बात का प्रमाण है। दरससल, पूरी दुनिया का ध्यान इस समय आतंक और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों  पर केन्द्रित है। पेरिस में आतंकी वारदात के बाद अमेरिका और उसके मित्र देश  भडके हुए हैं और इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का सफाया करने पर आमादा है। जलवायु परिवर्तन को लेकर भी विकासशील देशों से ज्यादा विकसित देश  चिंतित है। बहरहाल, दुनिया अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुरीद है तो इससे अच्छी बात भारत के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। पाकिस्तान के लिए यह मुंहतोड जबाव भी है।


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

Chennai Deluge: A Reminder to Urban Planner

                                          चेन्नई पर प्राकृतिक कहर

तमिल नाडु की राजधानी चेनई में सोमवार से जारी बरसात ने हमें फिर सचेत किया है कि कुदरत के बनाए नियम- कायदों  को तोडने के किस कद्र गंभीर परिणाम हो सकते हैं। चेन्नई में हो रही इस बार की बारिश  ने पिछले सौ साल के रिकार्ड  तोड दिए हैं। पिछले माह भी बरसात ने चेन्नई समेत तमिल नाडु और आंध्र प्रदेश  के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी और जन-जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। अभी चेन्नई इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि मौसम की ताजा मार ने लोगों की पीडा और कष्ट  को और ज्यादा बढा दिया है। राजधानी के अधिकांश  क्षेत्र जलमग्न है। बिजली और पेयजल व्यवस्था चरमर्रा  गई है। खाने-पीने की चीजों  की भारी  किल्लत  है क्योंकि अधिकतर व्यापारिक प्रतिष्ठान , दुकानें और फल-सब्जी विक्रेता बाढ की चपेट में आ चुके है। यातायात व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प है, न बसें, टैक्सियां अथवा ऑटो-रिक्षा चल रहें, न ही  रेलगाडियां। और-तो- और एयरपोर्ट  के बाढग्रस्त हो जाने के कारण हवाई सेवाएं भी बंद है। लोगों को स्मरण नहीं है कि अपने जीवन में उन्होंने चेन्नई में बरसात का इस कद्र कहर झेला हो। सौ साल पहले कभी ऐसी बारिश  हुई होगी मगर ऐसा चेन्नईवासियों ने सिर्फ बुजुर्गों से सुना या किताबों में पढा था। मौसम विभाग का आकलन है कि अगले एक सप्ताह तक बरसात जारी रह सकती है। इस स्थिति में स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि तटवर्ती होने की वजह से राज्य की जमीन पानी कम सोखती है। लगातार बारिश  होने से चेन्नई  में जमीन सुपर-सेचुरेटिड हो गई है और इस कारण  शहर से निकलने वाले नदी-नालों में पानी उल्टा चढने लग पडा है। निकासी की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से पानी दूसरी और तीसरी, फिर चौथी मंजिल तक चढ सकता है। चेन्नई के ताजा हालात ने सितंबर 2014 में बाढग्रसत श्रीनगर, जुलाई 2005 में पानी में डूबी मायानगरी मुंबई  और जून, 2013 में उत्तराखंड की त्रासदी की याद तरोताजा कर दी है। यानी कुदरत का कहर कश्मीर  से कन्याकुमारी और उतर से पश्चिम  तक बराबर जारी है। भारत में मानसूनी बरसात दो बार सक्रिय होती है। एक बार जून से सितंबर और फिर अक्टूबर से नवंबर में। अमूमन, दक्षिण भारत में अक्टूबर-नवंबर में मानसून सक्रिय होती है। अक्टूबर में साउथ-वेस्ट हवाओं का रुख दक्षिण की ओर बहने से तमिल नाडु, आंध्र प्रदेष और पुडुचेरी में भारी पानी बरसता है मगर इतना नहीं जितना इस बार बरस रहा है। मौसम विभाग ने एक माह पहले ही चेता दिया था कि इस बार दक्षिण की बरसात भारी तबाही मचा सकती है मगर सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। देश  की सबसे बडी त्रासदी भी यही है। समकालीन सरकारें जनहित के मामलों  पर केन्द्रित होने की बजाय राजनीतिक तिगडमें भिडाने और वोट की राजनीति को ज्यादा अहमियत देतीे हैं। देश  पर कई बार कुदरत का कहर बरप चुका है। मगर न तो उत्तराखंड से, न ही 2005 की मुंबई बाढ  और न ही कश्मीर  त्रासदी से केन्द्र और राज्यों की सरकार ने कोई सबक सीखा है।  पर्यावरण  शास्त्री भी हमें बराबर चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण मानव को अत्याधिक बारिश  और सूखे की असामान्य स्थिति का सामना करना पड सकता है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी इन दिनों दुनिया भर से 50,000 के करीब विषेज्ञय   जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर माथा-पच्ची कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के अलावा बेेहिसाब बढती आबादी के कारण भारत में शहरों और कस्बों का बेतरतीब फैलाव भी बाढ की समस्या को और जटिल करती है। अधिकांश  महानगरों, शहरों और कस्बों में पानी निकास की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। और अगर कहीं है भी तो रख-रखाव नईं होने से यह समय आने पर चरमर्रा  जाती है। इस स्थिति में असामान्य बरसात पडने पर अधिकांश  शहर बाढग्रस्त हो जाते हैं। माना की मौसम की अति को टालना मानव के वश  में नहीं है, मगर इससे बचने के सुरक्षित उपाय तो किए जा सकते हैं। स्मार्ट  सिटी बनाने की  बडी-बड़ी  बातें म बेमानी लगती  हैं अगर हम घर में ही  सुरक्षित न रह पाए।  

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

Is Kejriwal Govt's Janlokpal Bill Worst Than Uttrakhand?

                                                  केजरीवाल का जनलोकपाल

 दिल्ली में सतारूढ आम आदमी पार्टी सरकार के जनलोकपाल बिल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने ही पुराने साथियों का जबरदस्त विरोध झेलना पड रहा है। भाजपा और कांग्रेस तो “आप“ सरकार के जनलोकपाल बिल को पहले ही  खारिज कर चुकी हैं। अन्ना हजारे के नेतृत्व में लडे गए भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे-से- कंधा मिलाकर चलने वाले प्रशांत भूषण  ने दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल को  “जोकपाल“ बिल बताया है। 2011 में अन्ना हजारे ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संसद में पेश  लोकपाल बिल को “जोकपाल“ करार दिया था।  2011 में जनलोकपाल बिल का प्रारुप तैयार करने में प्रशांत भूषणऔर उनके पिता पूर्व मंत्री शांति भूषण  की अग्रणी भूमिका रही थी। इस बात का ख्याल करते हुए प्रशांत भूषण के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वस्तुतः शांति भूषण  को “लोकपाल बिल“ की परिकल्पना का आर्किटेक्ट माना जा सकता है। 1968 में  शांति भूषण  ने ही पहली बार लोकसभा में लोकपाल बिल पेश  किया था और 1969 में चौथी लोकसभा ने इसे पारित भी किया था। मगर इससे पहले कि बिल को राज्यसभा द्वारा पारित किया जाता, लोकसभा को भंग कर दिया गया और यह बिल लैप्स हो गया। तब से 2013 तक लोकपाल बिल 11 बार संसद में पेश  किया गया मगर अततः 17 दिसंबर 2013 को राज्यसभा और 18 दिसंबर को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। जनवरी 2014 में  बिल को  राष्ट्रपति  स्वीकृति मिलने पर 16 जनवरी 2014 से देश  में लोकपाल अस्तित्व में तो आ गया है मगर इसकी नियुक्ति आज तक नहीं हो पाई है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा विधान सभा में पेश  जनलोकपाल बिल लोकपाल बिल से काफी अलग है। संसद द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त बिल से क्योंकि आम आदमी पार्टी संतुष्ट  नहीं थी, इसलिए अरविंद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में अलग से बिल पेष  किया है। दिल्ली से पहले उतराखंड में भाजपा सरकार जन लोकपाल की तर्ज  पर 2011 मे लोकायुक्त बिल को अमली जामा पहना चुकी है। और इस राज्य में लोकायुक्त काम भी कर रहा है मगर अभी तक  भ्रष्टाचार से संबंधित कोई बडा मामला सामने नहीं आया है। दिल्ली में आप सरकार का जनलोकपाल बिल भी उतराखंड की तर्ज पर बनाया गया है। उतराखंड की भाजपा सरकार के इस बिल की टीम अन्ना ने काफी तारीफ भी की थी मगर दिल्ली सरकार ने इसमें भी कुछ बदलाव किए हैं। प्रशांत भूषण  का कहना है कि दिल्ली का जनलोकपाल बिल तो उतराखंड से भी बदतर है। अरविंद केजरीवाल ने जानबूझकर जनलोकपाल को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा है। दिल्ली के जनलोकपाल  के पास जांच के लिए स्वायत संस्था का भी प्रावधान नहीं है। इससे जनलोकपाल को सरकार की जांच एजेंसी पर निर्भर रहना पडेगा। प्रशांत भूषण के मुताबिक कहने को जनलोकपाल की नियुक्ति में सरकार का कोई दखल नहीं होगा मगर तीनों चयनकर्ता चूंकि सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, इसलिए  दिखावा किया जा रहा है। दरअसल, विवाद इस बात को लेकर है कि दिल्ली जनलोकपाल बिल उतराखंड लोकायुक्त बिल से भी कमजोर है जबकि अरविंद केजरीवाल से इससे भी ज्यादा ताकतवर जनलोकपाल की उम्मीद की जा रही थी। नवंबर 2011 में बतौर टीम अन्ना सदस्य अरविंद केजरीवाल ने उतराखंड में लोकायुक्त बिल पारित किए जाने पर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की यह कहकर चुटकी ली थी कि अगर केन्द्र का लोकपाल बिल राज्य से कमजोर हुआ तो इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। अब यही बात दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल पर भी लागू होती है। केन्द्र सरकार को अगर लगता है कि  दिल्ली में जनलोकपाल उसके लोकपाल से कमतर है तो इसे अस्वीकार भी किया जा सकता है। दिल्ली के जनलोकपाल बिल को उपराज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी। उपराज्यपाल वही करेंगे जो मोदी सरकार कहेगी। बहरहाल, दिल्ली में जनलोकपाल के अस्तित्व में आने से पहले ही विवादाग्रस्त होना  शुभ संकेत नहीं हैं।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

Dirt in Our Minds

                          मन-मस्तिष्क  में कूडा-कचरा  

देश  में व्याप्त असहिष्णुता के माहौल पर संसद के अंदर और बाहर जारी चर्चा देशहित में कम राजनीतिक रंगत में डूबी ज्यादा  लग रही है। सियासी दल असहिष्णुता पर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। बुद्धिजीवी, कलाकार और साहित्यकार असहिष्णुता के विरोध में खडे तो हुए हैं मगर इस मामले में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। वामपंथी खुलकर कुछ ज्यादा ही बोल रहे हैं। दक्षिणपंथी दबी जुबान में भी  असहिष्णुता का मुखर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इस बात में दो राय नहीं हो सकती की   असहिष्णुता  देश  की अखंडता और एकता के लिए सबसे बडी चुनौती है। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत में जब कभी भी  असहिष्णुता व्याप्त रही, देश  की अखंडता पर करारी चोट हुई। इतिहास हमें यह सीख भी देता है कि  असहिष्णुता ने  दुनिया में किसी भी मुल्क को सामाजिक-आर्थिक रुप से फलने-फूलने नहीं दिया।  और दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक मुल्क में तो  असहिष्णुता के लिए कोई जगह नहीं होनी  चाहिए । मोदी सरकार में  वरिष्ठ मंत्री वेंकैया नाडु ने भी सोमवार को  लोकसभा में माना कि देश  में इस समय असहिष्णुता  का माहौल है। भाजपा ने अब जाकर अपने सांसदों को नसीहत  दी है कि वे असहिष्णुता  पर आग उगलने वाली बयानबाजी से बचेॅ। इससे जाहिर है कि सतारूढ दल भी मान रहा है कि देश  में असहिष्णुता  है। बावजूद इसके सियासी दल माहौल को और तल्ख बनाने में लगे हुए  हैं। सोमवार को संसद में असहिष्णुता पर चर्चा  के दौरान मूल मुद्दे को दरकिनार कर सांसदों ने एक-दूसरे पर सिर्फ दोषारोपण किया। माकर्सवादी पार्टी (माकपा-सीपीएम) सांसद मोहम्मद सलीम के सदन में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हवाले से  “800 साल बाद भारत में हिंदू शासक“ संबंधी बयान पर हंगामा तो होना ही था। संसद की अपनी गरिमा होती है और गरिमापूर्ण संसदीय आचरण का तकाजा है कि  देश  के इस पावन मंच को अनर्गल आरोप लगाकर अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए। माकपा सांसद ने  भाजपा पर निशाना साधने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित जिस खबर को आधार बनाया था, वह पहले ही सफाई  दे चुकी थी कि खबर एकदम गलत थी और राजनाथ सिंह ने ऐसा कोई भी बयान नहीं दिया। वैसे भी देश  के गृहमंत्री के हवाले से इतनी महत्वपूर्ण बात का पता दिनभर खबर सूंघने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को न लगे, इस पर सहज में विश्वास  नहीं किया जा सकता। भारत में मीडिया की जबरदस्त पैठ है और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के जमाने में इस तरह की महत्वपूर्ण खबर छूट ही  नहीं सकती। इस बात का ख्याल करते हुए मात्र एक पत्रिका में छपी खबर की विश्वश्नीयता  पर संदेह होता है। इतना ही नहीं, किसी पत्रिका अथवा अखबार या न्यूज चैनल की खबर के आधार पर देश  के गृहमंत्री पर “कीचड“ नहीं उछाला जा सकता। इस प्रकरण से स्पष्ट  होता है कि सियासी दल असहिष्णुता जैसे गंभीर मुद्दे को भी राजनीति हित के लिए भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी के इस कथन से जनमानस पूरी तरह सहमत है कि “गंदगी और कूडा-कचरा देश  की गलियों में नही, बल्कि हमारे मन-मस्तिष्क  में है और जब तक यह पूरी तरह से निकल नहीं जाता; संकीर्णता, भय और अविश्वास  का घुप अंधेरा हमारे अंदर घर करता रहेगा। सर्वप्रथम इस कचरे को  मन-मस्तिष्क  से खदेडने की जरुरत है।  बहरहाल,  असहिष्णुता लिए कौन दोषी  है और कौन पाक दामन, यह संसद में चर्चा  का विषय  नहीं होना चाहिए। अलबत्ता, देश  को  असहिष्णुतासे कैसे मुक्त रखा जाएगा, इसके लिए सभी सियासी दलों को मिलजुल कर काम करना चाहिए। संसद में सर्वसम्मति से  असहिष्णुता फैलाने वालों की भर्त्सना के लिए प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। इससे जनमानस आश्वस्त  हो सकता है़।  

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

Paris Summit. World Eye Deliberations

                                            पेरिस सम्मेलन 

फ्रांस की राजधानी पेरिस में लगभग 190 देश  सोमवार से 11 दिसंबर तक इस बात पर माथा-पच्ची करेंगे कि दुनिया को ग्लोवल वार्मिंग के खतरों से कैसे बचाया जाए। जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इस सम्मेलन में 25,000 अधिकारियों समेत लगभग 50, 000 लोगों का जमावडा जुटा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा समेत 150 देशों  के राज्याध्यक्ष भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। औधोगिक क्रांति के बाद पिछले करीब दो सौ साल के दौरान जहरीली गैसों का उत्सर्जन करके मानव जाति ने पर्यावरण संतुलन को बुरी तरह से बिगाड डाला है। संयुक्त राष्ट्र  संघ मौसम एजेंसी द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट  में बताया गया है कि  2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। 2015 तक पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री फॉरेनहाइट के खतरनाक स्तर से भी ज्यादा बढ चुका है और अब तक तापमान में 1.8 डिग्री फॉरेनहाइट की वृद्धि दर्ज  हो चुकी है।  रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगला साल (2016) और ज्यादा गर्म हो सकता है और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। यानी अगर तापमान का बढना इसी तरह जारी रहा तो अगले सौ साल में तापमान 3.5 फॉरेनहाइट (2 डिग्री सेलसिस) तक बढ सकता है। मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि तामपान  के 2 डिग्री सेलसिस की सीमा पार करते ही इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। 2100 तक वायु में सीओ2 की मात्रा 700 पीपीएम (पाटर्स पर मिलियन) तक बढ सकती है। इस मात्रा में मानव का सांस लेना और जिंदा रहना मुश्किल  हो सकता है। भूमि बंजर हो सकती है और जल स्त्रोत सूख सकते हैं। इस समय वायु में सीओ2 की अधिकतम  मात्रा 350 के आसपास है। प्री-इंडस्ट्रियल युग में यह स्तर 280 से भी कम था। और अगर हम जैसे-तैसे वायु में सीओ2 की  मात्रा को अपेक्षा के अनुरुप 500 पीपीएम तक नियंत्रित कर भी लेते हैं, तो भी अमेरिका का औसत ताममान 5 से 10 डिग्री फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे कई क्षेत्रों में जमीन बंजर हो जाएगी और लोगों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है। और अगर हम जहरीली गैस उत्सर्जन (सीओ2) को रोक नहीं पाते हैं और 2100 तक वायु में पीपीएम का स्तर 1100 को पार कर जाता है, तो अमेरिका का तापमान 15 से 20 फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे इसका 50 फीसदी उपजाऊ क्षेत्र बंजर हो जाएगा। मध्य-पूर्व  एषिया (अरब) अफ्रीकी महाद्धीप जैसे गर्म  क्षत्रों में तो 2050 तक ही 3 डिग्री सेलिसिस  तक बढ सकता है। दुनिया के बडे-छोटे देशों सब की यही चिंता है। ग्लोबल वार्मिंग ने मानव के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि ग्लोबल वार्मिंग को कैसे कम किया जाए। औधोगिकरण और पेट्रोल-डीजल के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहरीली गैसों का बेहिसाब उत्सर्जन हो रहा है। विकासशील देशों का कहना है कि पिछले दो सौ सालों में जहरीली गैस उत्सर्जन में विकसित देशों  का बडा हाथ रहा है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग को घटाने के लिए विश्व  स्तरीय प्रयासों में समृद्ध देशों  को ज्यादा वित्तीय स्त्रोत जुटाने चाहिए। विकसित देश  बराबरी के सहयोग पर जोर दे रहे हैं। अब तक इसी बात पर मगजखपाई  हो रही है की कौन ज्यादा  दोषी है। भारत का भी यही स्टैंड है कि समृद्ध देशों  को विकासशील मुल्कों  की तुलना में ज्यादा वित्तीय संसाधन जुटाने चाहिए। लगभग 183 देशों  ने ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए ऐक्शन  प्लान पेश  की है। पेरिस सम्मलेन में इस पर चर्चा भी हो सकती है। तथापि, यह  प्लान इतनी पुख्ता नहीं है कि इससे तापमान में दो डिग्री सेलसिस की संभावित वृद्धि रोकी जा सके।  यद्यपि पूरी दुनिया का जनमानस इस समय ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए एकजुट हो रहा है, मगर विश्व  नेताओं के मतभेद ठोस कार्रवाई के मार्ग  में आडे आ रहे हैं। विश्व  नेताओं पर दबाव  डालने के लिए रविवार को जगह-जगह  प्रदर्शन  किए गए। पेरिस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं।