बुलगारिया की खोजी महिला पत्रकार विक्टोरिया मिनिरोवा की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या और सऊदी अरब के नामी मत्रकार जमाल खाशोज्जी का दूतावास से लापता हो जाने की घटनाएं जितनी दुखद हैं, उससे कहीं ज्यादा निदनीय हैं। जमाल खाशोज्जी दो अक्टूबर से तुर्की से लापता हैं। वे तुर्की स्थित अपने मुल्क सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास से कुछ अहम दस्तावेज लेने गए थे मगर वापस नहीं लौटे। उनकी मंगेतर हदीजे जेनगीज दूतावास के बाहर घंटों जमाल का इंतजार कर्ती ही रह गई । तुर्की सरकार का आरोप है कि दूतावास के भीतर ही जमाल का कत्ल कर दिया गया। सऊदी सरकार कह रही है कि जमाल अपना काम खत्म करके लौट गए थे। आखिर जमाल कहा चले गए़ उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया? उनकी मंगेतर यह सवाल कर रही है। तमाम परिस्थितियांपरक साक्ष्य यही साबित कर रहे हैं कि जमाल खाशोज्जी को दूतावास के अंदर ही निपटा दिया गया है। वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने अंतिम लेख में जमाली ने यमन में सऊदी अरब के दखल की मुखर आलोचना की थी। जमाल जब तक सऊदी अरब के शाही परिवार (शासक) के समर्थक थे, आराम से गुजर-बसर कर रहे थे। मगर जैसे ही उन्होंने शाही परिवार के खिलाफ लिखना शुरु किया, उन्हें तरह-तरह से प्रताडित किया गया । 2003 में जमाली एक अखबार के संपादक बने मगर उन्हें शाही परिवार के खिलाफ लिखने के लिए दो माह में नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद उनका देश छोडना और फिर लौटना बदस्तूर जारी रहा। 2012 में जमाली को अरब न्यूज चैनल का प्रमुख बनाया गया, इस चैनल को अल जजीरा का प्रतिद्धंद्धी माना गया । बहरीन स्थित इस चैनल के शुरु होने के पहले ही दिन एक प्रमुख विपक्षी नेता को आमंत्रित किए जाने पर इसे चौबीस घंटे में बंद कर दिया गया। 2017 में जमाल सऊदी अरब छोडकर अमेरिका चले गए और उन्होंने वहां वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखना शुरु कर दिया, उनके हर लेख में सऊदी अरब के शाही परिवार, खासकर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों की मुखर आलोचना हुआ करती। इन सब परिस्थियों से साफ जाहिर है कि जमाल को निर्भीक पत्रकारिता की कीमत चुकानी पडी है। विक्टोरिया मिनिरोवा को खोजी पत्रकार बनने की सजा मिली है। विक्टोरिया यूरोपियन यूनियन फंड में हो रहे गोलमाल का लगातार भांडा फोड रही थी। संक्षेप में उदारवादी यूरोप हो या कटटरपंथी मध्य-पूर्व या भारत समेत एशिया, खोजी पत्रकारों का जीवन हमेशा खतरे में रहा है। 2018 में अब तक 43 पत्रकार मारे जा चुके हैं। 155 पत्रकारों को जेल में ठूंस दिया गया। खोजी पत्रकारिता से क्षुब्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो पत्रकारों को समाज का सबसे बडा "दुश्मन" मानते हैं । निष्कर्ष यह है कि खोजी अथवा निर्भीक पत्रकार बनोगे तो होंगे बर्बाद, सरकारी पत्रकार बनोगो तो होंगे आबाद।
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