हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को सत्ता में आए करीब एक साल होने जा रहा है। सरकार की माली हालात बेहद खराब है मगर जयराम सरकार रोजमर्रा का खर्चा चलाने और लोक-लुभावने वायदे पूरे करने के लिए भी उधारी ले रही है। हाल ही में सरकार ने 500 करोड की उधारी लेकर इसमेंसे 200 करोड रु सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों को बतौर दीवाली तोहफा बांट दिए हैं । कर्मचारियों और पेंशनरों को़ उनका देय जारी करना अच्छी बात है मगर दीवाली का तोहफा कमाई से दिया जाना चाहिए, उधारी लेकर नहीं। उधारी के पैसे से दीवाली के तोहफे नहीं बांटे जाते। सरकार कब तक उधारी लेकर जनता को मूर्ख बनाती रहेगी। एक साल से भी कम समय में जयराम सरकार 2000 करोड रु के ऋण ले चुकी है। साल-दर-साल हिमाचल प्रदेश की जनता पर सरकारी कर्ज का बोझ बढता जा रहा है। अब तक सरकार 48,000 करोड रु का कर्जा उठा चुकी है। राज्य सरकार इस वित्तीय साल में 4500 करोड रु का कर्जा ले सकती है। कर्मचारियों और पेंशनरों को महंगाई भता देने के लिए सरकार के पास माकूल वित्तीय साधन नहीं है और इसके लिए उसे बार-बार कर्जा लेने पड रहा है। अपने “चहेतों को रेवडियां बांटने की गर्ज से सरकार घाटे में चल रहे उपक्रमों का बोझ ढोए जा रही है। कर्मचारियों को महंगाई भत्ता देने के लिए भी अगर सरकार को उधार लेना पडा तो साफ है सरकार के पास विकास के लिए वित्तीय संसाधन नहीं है। कुशल वित्तीय प्रबंध का तकाजा है कि सरकार नौकरशाही की छंटनी (डाउनसाइज) करे, घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों को बंद करे। भाजपा जब विपक्ष में थी, यही सुझाव देती थी। मगर ऐसा करने की बजाए जयराम सरकार ने सरकारी उपक्रमों में राजनीतिक नियुक्तियां करके खजाने पर और ज्यादा बोझ डाला है। पिछले कुछ सालों से हर सरकार यही करती रही है। ऐसा वित्तीय प्रबंध ज्यादा देर तक तो चल नहीं सकता और इससे साफ जाहिर है कि जयराम सरकार भी वक्त गुजार रही है।
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