कांगडा जिले के जयसिंहपुर में मेरे करीबी परिचित राम स्वरुप दीक्षित इस बात से बेहद परेशान है कि दशहरा उत्सव मनाने के लिए स्थानीय प्रशासन उनसे जबरी चंदा वसूली कर रहा है। लगभग चार दशक से वे जयसिंहपुर में निजी स्कूल चला रहे हैं मगर आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एसडीएम स्तर का अधिकारी चंदा वसूलने के लिए धमकी पर उतर आए। स्कूल चलाना है तो चंदा देना ही पडेगा। आज तक चंदा देते रहे हैं। सत्तर के दशक में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ से एम एससी करने के बाद चाहते तो किस कॉलेज अथवा स्कूल में नौकरी कर सुकून की जिंदगी बसर कर लेते। मगर दीक्षित जी पर अपने क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने का जनून सवार था। उस समय क्षेत्र में स्कूलों का अभाव था। इसीलिए उन्होंने छोटे स्तर पर स्कूल खोला। और चार दशक बाद भी वहीं के वहीं है। अब बडी उमर में जाकर उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि समय बदल चुका है और गला काट प्रतिस्पर्धा के जमाने में आदर्श और मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। शिक्षा का पूरी तरह से व्यापारीकरण (व्यवसायीकरण से कन्फ्यूज मत करें) हो चुका है और स्कूल , कॉलेजिज और यूनिवर्सिटीज अब केवलमात्र मुनाफा कमाने के लिए चलाए जाते हैं। भद्र पुरुषों के लिए इस फार्मेट में कोई जगह नहीं है। इन सब के बावजूद दीक्षित जी डटे हुए हैं और अपने उसूल और मकसद को छोडने को तैयार नहीं है। जयसिंहपुर में दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है और चंगर क्षेत्र के लिए इसका खासा मह्त्व भी है। हर स्थानीय निवासी इसकी सफलता के लिए अपनी क्षमता से योगदान देता रहा है। दीक्षित जी भी हर साल दशहरे के लिए चंदा देते रहे हैं मगर अपनी क्षमता से। चंदा अपनी क्षमता के अनुसार ही दिया जाता है। प्रशासन को जबरी चंदा वसूलने का कोई अधिकारी नहीं है। वसूली गुंडे-मवाली करते हैं। दीक्षित जी ही नहीं, हर आत्म-सम्मानी व्यक्ति को चंदे की जबरन वसूली पर गुस्सा आएगा। सरकारी अफसर जनसेवक होता है और उसे इसी मानसिकता से काम करना चाहिए। दुख इस बात का है कि आजादी के सात दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद नौकरशाही फिरंगियों जैसी मानसिकता पाले हुए है़। जनता को अपने ओहदे और पॉवर से चकाचौंध करना और अक्सर डराना-धमकाना आज भी बदस्तूर जारी है। जयसिंहपुर का यह वाक्या भी इसी मानसिकता की उपज है। जयराम ठाकुर जी आपकी सरकार को कुछ तो बडा सोचना चाहिए।
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