पुराना जुमला है, “ नाम में क्या रखा है“। भगवा पार्टी कहेगी“ जनाब बहुत कुछ रखा है“। और अगर नाम, उपनाम इतिहास से जुडे हों और तो बहुत कुछ। इतिहास धर्म या आस्था का फर्क नहीं जानता। जो भी सच और षास्वत है, इतिहास में दर्ज है। भगवा पार्टी के लाख चाहने पर भी इतिहास को बदला नहीं जा सकता। मगर भगवा पार्टी है कि इतिहास को भी अपनी सुविधानुसार बदल रही है । भगवा संगठनों को मुसलमानों से सख्त नफरत है, इसलिए भाजपा बाबरी मसजिद से लेकर, मुगलसराय और इलाहाबाद का नाम मिटाने पर “अटल“ हैं। शिमला का नाम बदल कर श्यामला रखना भगवा पार्टी का ताज प्रकल्प है। पहले शिमला का नाम सिमला हुआ करता था। आजादी के बाद स्वदेशी सरकार ने इसका नाम सिमला की जगह शिमला रख दिया था। अब जयराम ठाकुर सरकार षिमला की जगह “श्यामला “ रखने पर विचार कर रही है हालांकि मुख्यमंत्री ने नामकरण की गेंद जनता के पाले में डाल दी है। इतिहास में अठारहवीं षताब्दी तक शिमला में जाखू के आस-पास थोडी बहुत आबादी हुआ करती थी। बाकी का क्षेत्र वनाच्छादित हुआ करता था। मगर नाम सिमला ही था। यह नामकरण “श्यामला “ देवी पर रखा गया था। श्यामला को “काली“ का अवतार माना जाता है। 1806 में नेपाली शासक भीमसेन थापा ने इस वनाच्छादित क्षेत्र पर हमला बोलकर इसे अपने कब्जे में कर लिया था। 1814-16 के बीच नेपाली शासक और ईस्ट इंडिया कंपनी में युद्ध के फलस्वरुप 2 दिसंबर, 1815 को सुगौली संधि हुई थी। इस संधि के अनुसार नेपाल के अधीन का एक तिहाई हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया गया और इसमें कुमाऊं, गढवाल, तराई क्षेत्र और सिमला भी शामिल था। 1819 में हिल स्टेटस के पॉलिटिक्ल एजेंट लेफटिनेंट रॉस ने शिमला में पहला लकडी का घर बनाया था। तीन साल बाद 1822 में रॉस के उतराधिकारी नौकरशाह चार्ल्स प्रैट कनेडी ने शिमला में पहला पक्का भवन बनाया था। कनैडी हाउस के नाम से यह भवन आज भी हिमाचल विधानसभा भवन के बगल में विराजमान है। 1827 में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम एमहर्स्ट जब पहली बार शिमला आए तो कनेडी हाउस में ही ठहरे थे। उनके लिए शिमला में मौजूदा रिज से जाखू तक तीन मील लंबी सडक का निर्माण भी किया गया और इस पर एक पुल भी बनाया गया था। 1830 में फिरंगियों ने पटियाल और क्योंथल रियासत से काफी बडा हिस्सा ले लिया और शिमला को बसाना शुरु कर दिया। नतीजतन, शिमला की आबादी 1830 में 30 से बढते-बढते 1881 में 1141 तक पहुंच गई थी। फिर शिमला ईस्ट इंडिया कंपनी की ग्रीष्मकालीन राजधानी बन गई। शिमला में बिजली सप्लाई के लिए नॉटी खड्ड पर चाबा में पॉवर प्रोजेक्ट लगाया गया और गुम्मा से पानी लिफ्ट किया गया। 1903 में 806 पुलों का निर्माण कर और 103 सुरंगें खोदकर कालका- शिमला रेलवे लाइन बनाई गई। स्वदेशी सरकार आज तक इस रेल लाइन को बॉड गेज नहीं कर पाई है। फिरंगियों ने शिमला में गोर्तो कैसल, बन्तोय कैसल, वाइसरीगल लॉज जैसी एतिहासिक भवनों का निर्माणकिया है। शिमला का नाम भर बदलने से फिरंगी षासन की कडवी यादें भुलाई नहीं जा सकती। इतिहास से सीखने की जरुरत है। फिरंगियों ने शिमला के लिए जो कुछ किया है, स्वदेशी सरकारें उसकी सानी नहीं कर सकती। नाम बदलने से कुछ नहीं होगा। बदलना है तो “ सडी -गली शासन व्यवस्था को बदलें। सरकार की कार्यशैली बदलें और शासक की बजाए असल में जनसेवक बनें।
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