मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

नोटबंदी से जनता खुश : एक खबर

                    
1, नोटबंदी के बाद देष में 100 से ज्यादा लोगों की मौत मगर टीवी पर जनता कह रही मोदी ने अच्छा काम किया है।

2, नोटबंदी से लोगों को अपनी गाढी कमाई नहीं मिलने से बेटियों की शादियां टलने पर हताश  मता-पिता ने खुदकुशी  की। पर जनता टीवी चैनल्स पर कह रही है, मोदी ने अच्छा काम किया।

3, नोटबंदी से बैक के बाहर कतार में खडी-खडी महिला ने बच्चे को जन्म दिया, जनता कह रही मोदी ने बहुत अच्छा काम किया।

4, नोटबंदी के एक महीने बाद भी बैंकों और एटीएम पर लंबी कतार में खडे-खडे जनता बेहाल। फिर भी जनता कह रही है मोदी ने बहुत अच्छा काम किया।

निष्कर्ष :  धन्य है भारत की जनता और टीवी चैनल्स। अब समझ में आया अपराधी, गुंडे और मव्वाली कैसे चुनाव जीतते हैं। 

प्रधानमंत्री पर यह कैसा भरोसा !

नोटबंदी के कारण भारी   कष्ट  सहने के बावजूद देश  के जनमानस को प्रधानमंत्री की बात पर पूरा भरोसा है। देशवासियों  के इस धैर्य और  कुर्बानी  भाजपा खूब इतरा  रही है। प्रधानमंत्री ने लोगों से नोटबंदी से उपजे संकट से निपटने के लिए 50 दिन का समय मांगा है और इस माह के अंत में यह अवधि खत्म होने जा रही है। नोटबंदी  फैसले के  एक माह बाद अभी भी देश  नगदी के संकट से उभर नहीं पाया है। तथापि लोगों को पूरी उम्मीद है कि दिसंबर होते-होते नव वर्ष  में लोगों को नगदी के संकट से जूझना नहीं पडेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को उत्तर प्रदेश  में जनसभा को संबोधित करते हुए फिर कहा कि नोटबंदी पर उन्हें अपना “50 दिन“ का वायदा अच्छी तरह से याद है और वे हर हाल में इसे पूरा करेंगे। प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह संसद में उन्हें बोलने नहीं दे रहा है, इसलिए वे जनता से मुखातिब होकर नोटबंदी पर अपना पक्ष रख रहे हैं। निसंदेह, नोटबंदी के बाद नवंबर माह की अपेक्षा दिसंबर में स्थिति में मामूली सुधार आया है मगर सामान्य स्थिति लौटने में काफी समय लग सकता है।  व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं, और इसके लिए देश  की  भ्रष्ट “ नौकरषाही और बैकिंग व्यवस्था जिम्मेदार है। लोग-बाग ही नहीं सरकार खुद इस बात पर हैरान है कि उपलब्ध नगदी का  नियंत्रित करने के लिए बैंकों और एटीएम से नगदी निकालने की सीमा तय किए जाने के बावजूद काला धन जमा करने वालों को करोडों के नए नोट कहां से मिल रहे हैं? नोटों की छपाई सेना के कडे पहरे में की जा रही है और देश  के विभिन्न शहरों में नोटों की खेप कडी सुरक्षा में पहुंचाई जा रही है। जाहिर है नए नोटों को काला धन जमा करने वालों को “बेचने“ का धंधा बेंकों के माध्यम से चल रहा है। यहीं नही देश  के निजी क्षेत्र के कई बैंक बुला-बुला कर पुराने नोट जमा करने का न्यौता दे रहे हैं। ताजा सूचना के अनुसार प्रधानमंत्री को बैंकों में दलाल, पुलिस और काला धंधा करने  वालों के बीच जबरदस्त सांठगांठ के पुख्ता सबूत मिले हैं। बैकों की 500  शाखाओं में करवाए गए स्टिंग से सामने आया है कि किस तरह “भ्रष्ट" बैंककर्मी” पुलिस और दलाल से मिलकर प्रधानमंत्री की काला धन बाहर निकालने की मुहिम को पलीता लगा रहे हैं।  देश  को कुल मिलाकर 14.5 लाख करोड रु के नए नोट की जरुरत है। 8 नवंबर के बाद इतनी करंसी सिस्टम से सोखी जा चुकी है। आंकडों के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की नोट छापने वाले यूनिट दिन-रात काम कर रहे हैं और प्रतिदिन 15 से 20 मिलियन के नए नोट छाप रहे हैं। आरबीआई के अनुसार अब तक लगभग  तीन  लाख करोड के नए नोट सिस्टम में डाले जा चुके हैं। मगर इसमें 2000 और 500 रु के नोट शामिल नहीं हैं। अनुमान है कि आरबीआई ने 2000 रु के लगभग दो बिलियन के नए छापे हैं। 500 रु के नोट अभी ज्यादा संख्या में सिस्टम में आए नहीं है। कुल मिलाकर,  अभी तक सिस्टम में 5 लाख करोड रु ही डाले गए हैं जबकि  14.5 लाख करोड रु (14,500 बिलियन) की जरुरत है। मोटे तौर पर, एक महीने में आरबीआई अगर पांच लाख करोड रु के नए नोट छाप पाया है,  तो  अगले बीस दिन में साढे नौ लाख करोड रु की छपाई कतई मुमकिन नही है। आरबीआई प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा 20 मिलियन नए नोट छाप सकता है। यानी एक बिलियन नए नोट छापने में ही 50 दिन लगते हैं। इस गति से आरबीआई को बकाया साढे नौ लाख करोड मूल्य के नए नोट छापने में कई महीने लग सकते हैं । प्रधानमंत्री ने फिर कहा है कि उन्होंने हिसाब लगाया है कि नोटबंदी से उत्पन्न स्थिति को सामान्य होने में 50 दिन लग सकते हैं। देश  के जनमानस की दिली इच्छा है कि प्रधानमंत्री का गणित सही हो और नए साल में लोगों को अपना पैसा निकालने के लिए बैंकों के धक्के न खाने पडे। मगर जमीनी सच्चाई इस बात की  पुष्टि  नहीं करती है।  

रविवार, 11 दिसंबर 2016

“संसद को चलने दें“

नोटबंदी पर संसद के षीतकालीन सत्र की कार्यवाही को निरंतर बाधित करने से चितिंत देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति ) को सांसदों को नसीहत देनी पडी है। संसद के मौजूदा  शीतकालीन सत्र की अब तक 17 बैठकों मेंसे बमुश्किल  10 घंटे का कामकाज हुआ है। और कामकाज का निपटान भी ज्ल्दबाजी में किया गया। 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही अगर पांच घंटे चली तो लोकसभा मात्र 10 मिनट की कार्यवाही के बाद विपक्ष के हंगामे में स्थगित कर दी गई। 24 नवंबर को लोकसभा 15 मिनट चली। पूरे नवंबर में यही स्थिति रही। दिसंबर में अब तक  लगभग यही स्थिति रही है । राज्य सभा की स्थिति भी ज्यादा बेहतर नहीं है। 16 नवंबर को छोडकर राज्यसभा में विपक्ष के शोर -शराबे के बीच कार्यवाही  हर दिन बार-बार बाधित होती रही। अभी तक केवल 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही पांच घंटे चल पाई । इसके बाद बाकी दिन राज्यसभा और लोकसभा की कार्यवाही ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे ही चली। 8 दिसंबर को लोकसभा में प्राइवेट मेंबर्स डे था और इस दौरान कुछ महत्वपूर्ण कामकाज निपटाया जाना था मगर सदन की कार्यवाही आध घंटे में ही  स्थगित करनी पडी। नियमानुसार संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही कम-से-कम 6 घंटे तो चलनी ही चाहिए। यानी 17 दिन में 102 घंटे का कामकाज तो होना ही चाहिए था। देश के सांसद इस सच्चाई को भली-भांति जानते हैं कि संसद की एक मिनट की कार्यवाही की मौजूदा लागत 3 लाख है। अर्थात संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर 1 करोड 80 लाख रु खर्च होते हैं। इस हिसाब से (102-10)  82 घंटे की कार्यवाही जाया करने के लिए विपक्ष ने जनता की कमाई का 165 करोड महज नोटबंदी पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए बर्बाद किए हैं। इसके बावजूद भी जनता को कोई राहत नहीं मिली है। जनमानस से पूछा जाए तो वह कहेगा कि इस नुकसान की भरपाई उन सांसदों के वेतन से की जाए, जो इसके लिए जिम्मेदार है। इसी बात से चिंतित   राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए  विपक्ष को खरी-खोटी सुनाई है। वीरवार को  राष्ट्रपति ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि संसद की कार्यवाही को बाधित करने का जैसे चलन हो गया है। पूरा देश राष्ट्रपति  की इस बात से सहमत होगा कि सांसदों को संसदीय कामकाज निपटाने और जनता की समस्याओं का हल ढूंढने के लिए चुना जाता है, संसद को बाधित करने के लिए नहीं। देश के प्रथम नागरिक को अगर सांसदोॅ को उनके संसदीय जिम्मेदारी का अहसास कराना पडे, तो इससे पता चलता है कि देश की राजनीति का किस हद तक पतन हो चुका है।  बहरहाल, संसद की कार्यवाही बाधित करने से हो रहे नुकसान पर विपक्ष का तर्क है कि जनता ने उन्हें संसद में जन समस्याओं को उठाने के लिए चुना है और नोटबंदी से जनता जिस तरह से हलकान हो रही है, उसके दृष्टिगत  इस मामले को उठाना बनता है। तथापि, सच्चाई यह है कि देश के लगभग सभी सियासी दलों का दोहरा आचरण है। विपक्ष में रहते हुए सब जायज मगर सत्ता में आते ही विपक्ष का सारा विरोध नाजायज। विपक्ष पहले प्रधानंत्री की लोकसभा में उपस्थिति पर अडा रहा और जब प्रधानमंत्री सदन में आए, विपक्ष चर्चा  पर अड गया।  राष्ट्र को अच्छी तरह से याद है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी 2जी स्कैम और कोयला घोटाले (कोलगेट) पर कई दिनो तक संसद नहीं चलने दी थी। बहरहाल, नोटबंदी पर संसद को नहीं चलने देना समस्या का हल नहीं है। मौजूदा  शीतकालीन सत्र की मात्र चार बैठकें बची  हैं और अभी काफी सारा कामकाज निपटाना बाकी है। कई अहम विधेयक अभी सदन में प्रस्तुत तक नहीं हो पाए हैं। इनमें कर्ज  माफी के लिए नई स्कीम का विधेयक, व्हिसल ब्लोअर्स और विटनेस प्रोटेक्शन  जैसे अहम बिल षामिल हैं। इन विधेयकों के पारित नहीं होने से जनता का ही नुकसान होगा।    

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

नोटबंदी से क्या मिला़़?

नोटबंदी के एक माह बाद भी देश  में व्याप्त वित्तीय अव्यवस्था में कोई संतोषजनक सुधार नहीं हो पाया है। दो लाख मेंसे अधिकांश  ऑटोमेटिड  टैलर मशी नें (एटीएम) खाली पडी हैं।  पूरे देश में मात्रा 44,000  एटीएम काम कर रहे हैं।  बैक एक दिन में अधिकतम 6 हजार से ज्यादा नगदी नहीं दे रहे हैं। नोटबंदी से अब तक देश में 85 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। काले धन को समाप्त करने के लिए सरकार विमुद्रीकरण करे, इस पर लोग-बाग सरकार के साथ है पर इसके लिए आम आदमी को अपनी जान देनी पडे, पूरी दुनिया में ऐसी मिसाल नहीं मिलती है। गर्भवती  महिला ने अपना ही पैसा लेने के लिए कतार में खडे-खडे बच्चे को जन्म दिया हो, ऐसी मिसाल भी दुनिया में नहीं मिलती है। अपना ही कमाया पैसा नहीं मिलने से कई  शादियां टूट चुकीं हैं। उन मां-बाप पर क्या गुजर रही है, जो ताउम्र पाई-पाई जमा करने के बावजूद जमा पैसा नहीं निकाल पाने के कारण अपनी बेटियों का ब्याह तक नहीं कर पा रहे हैं। नगदी की कमी के कारण कई लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाया है। गरीबों के उपचार के लिए दान देने वालों ने भी अपना हाथ खींच लिया है। पूरे देश  में आम आदमी एक महीने से हाल-बेहाल है। इतना सब होने के बाद भी सरकार काले धन को बाहर निकालने के लिए उठाए गए नोटबंदी कदम पर खूब इतरा रही है। नोटबंदी से कितना काला धन बाहर निकला है, इसका अभी पुख्ता आकलन नही हुआ है। तथापि, अनुमान है कि देश  में 75 लाख करोड की सकल घरेलू आय (जीडीपी) का लगभग 8 फीसदी अथवा 6 लाख करोड नगदी काले धन के रुप में छिपाया गया है। अर्थशास्त्रियों का भी यही आकलन है कि लगभग साढे लाख करोड की नगदी काला धन है। 31 मार्च, 2016 को देश  में 500 और 1000 रु की 14.5 लाख करोड रु की नगदी बाजार में थी और नोटबंदी के दिन भी इतनी ही मुद्रा थी। इस हिसाब से इस नोटबंदी के दिन 6 लाख करोड की नगदी काले धन के रुप में थी और 8.5 लाख करोड व्हाइट मनी। सरकार का दावा है कि 9 नवंबर से 7 दिसंबर तक देश  के विभिन्न बैंकों में 11.5 लाख करोड के पुराने नोट बैंकों में जमा किए जा चुके हैं। पर सबसे बडे सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का आकलन है कि इस  11.5 लाख करोड रु मेंसे लगभग 10 से 15 फीसदी की गिनती दो बार हुई है। यानी लगभग 10 लाख करोड के  500 और 1000 रु के नोट जमा हुए हैं और इसमें से अधिकतर 8.5 लाख करोड व्हाइट मनी है। इमानदार आदमी अपने पुराने नोट बदलने के लिए दौडा-दौडा बैंक पहुंचा और कई दिनों तक कतार में लगा रहा मगर काला धन छिपाने वाले कहीं भी कतार में नजर नहीं आए। यानी 14.5 लाख करोड रु की नगदी मेंसे 6 लाख करोड का अधिकतर काला धन अभी भी बाहर आना बाकी है। काला धन ज्यादातर सोना, गहने और मकान जैसी अचल संपति में छिपाया जाता है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट  में माना है कि 5 करोड रु की नगदी बाहर नहीं आएगी। वीरवार को चेन्नई में मारे गए छापों में 100 किलो सोना और 80 करोड के नए नोट की करंसी का जब्त किया जाना भी यही  दर्शाता  है कि नोटबंदी से काला धन वालों पर पूरी तरह से नकेल नहीं डल पाई है। इसके यही अभिप्राय है कि नोटबंदी से 6 लाख करोड रु मेंसे 5 लाख करोड रु की समानांतर अर्थव्यवस्था जारी रहेगी  और मिल मिलाकर एक लाख करोड रु ही बाहर आया है। सेंटर फॉर मॉनिटिरिंग दी इंडियन इकॉनॉमी का आकलन है कि  31 दिसंबर, 2016 तक विमुद्रीकरण की सरकारी लागत 1.29 लाख करोड रु तक पहुंच जाएगी। इन आंकडों से यही  निष्कर्ष  निकलता है कि नोटबंदी से काला धन तो बाहर नहीं निकला मगर देश  में वित्तीय अफरा-तफरी जरुर फैली है।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

कंगाली में आटा गीला

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए गवर्नर और ब्याज दरें तय करने के लिए गठित छह-सदस्यीय समिति ने ब्याज न घटाकर  लोगों को “कंगाली में आटा गीला“ की सौगात दी है। एक माह पहले आठ नवंबर को 500 एवं 1000 रु के नोट बंद किए जाने के बाद से देश का लगभग हर आर्थिक और वित्तीय  विशेषज्ञ  नोटबंदी के बाद उपजी “नगदी के संकट“ की स्थिति के  दृष्टिगत  ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहा था। विभिन्न एजेंसियों द्वारा अर्थशास्त्रियों एवं वित्तीय विशेषज्ञों की राय पर करवाए गए हर  सर्वेक्षण में भी ब्याज कटौती की उम्मीद जताई गई थी।  मगर आरबीआई के गर्वनर और समिति ने ब्याज दरों को यथावत रख कर सभी को चौंकाया दिया है और महंगे कर्ज  और नगदी के संकट से त्रस्त  लोगों को राहत देना मुनासिब नहीं समझा है। उन्हें मुद्रा-स्फीति की ज्यादा चिंता है। नोटबंदी के बाद से देश  की अर्थव्यवस्था में ग्रोथ की रफ्तार काफी धीमी पड गई है। आरबीआई ने खुद माना है कि नोटबंदी से ग्रोथ पर प्रतिकूल असर पडा है। इसीलिए आरबीआई ने चालू वित्तीय के लिए सकल वैल्यू एडिड ग्रोथ आउटलुक को  7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। एक माह से भी कम समय में अगर आरबीआई को ग्रोथ आउटलुक 0.5 फीसदी घटाना पडा है, जाहिर है अगले कुछ महीनों में वैल्यू एडिड ग्रोथ की रफ्तार और भी धीमी पड सकती है। बुधवार को ही एक सर्वेक्षण में बताया गया कि नोटबंदी से स्टॉक मार्केट  को भी खासा नुकसान हुआ है और  अगले साल  सेंसेक्स के रिकार्ड  हाई छूने की जो उम्मीद है, उस पर पानी फिर गया। बुधवार को आरबीआई की मौद्रिक नीति घोषित होते ही  सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही लुढक गए। नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित ख्यातिप्राप्त अमर्त्य सेन समेत देश  के लगभग सभी अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत है कि नगदी पर फल-फूल रही भारतीय अर्थव्यवस्था से एकाएक  केश की आक्सीजन बंद  कर देने से ग्रोथ पर बहुत बुरा असर पड सकता है। पांच सौ और एक हजार रु के नोट बंद किए जाने से 86 फीसदी नगदी अर्थव्यवस्था से गायब हो गई है। नोटबंदी को एक माह का समय हो गया है, मगर इसकी जगह अभी बमुश्किल  27  फीसदी कैश  भी मार्केट में आ पाया है।  कालेधन को समाप्त करने के  मोदी सरकार के दावे भी खोखले साबित हो रहे है़। आम आदमी को मामूली सी नगदी के लिए भी तरसना पड रहा है, मगर  भ्रष्ट और टैक्स चोर आराम से दो हजार के करोडों के नए नोट जमा कर रहे हैं। बगंलुरु के दो इजीनियरों के घर से 4.5 करोड रु के नए नोट मिलना यही साबित करता है कि सरकार द्धारा  जारी नए नोट आम आदमी को भले ही न मिले पर  भ्रष्ट और काले कमाई करने वालों को आसानी से मिल रहे हैं। आए दिन लाखों के नए नोट जब्त किए जाने के मामले भी यही कह रहे हैं। आरबीआई को लगता है कि तेल की अंतरराश्ट्रीय कीमतों में आ रहे उछाल से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। भारत अपनी तेल खपत का 80 फीसदी आयात करता है। इस स्थिति में तेल आयात से मुद्रा-स्फीति के आयात का खतरा भी बना रहता है। आरबीआई ने ब्याज दरें यथावत रखने के लिए यह तर्क  भी दिया है कि मुद्रा-स्फीति का खतरा अभी पूरी तरह से टला नहीं है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुुराम राजन भी ब्याज दरें नहीं बढाने के लिए यही तर्क दिया करते थे। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपाई राजन की मुद्रा-स्फीति नियंत्रण की इस नीति के मुखर आलोचक हुआ करते थे। अब उम्मीद की जा सकती है कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और समिति के सदस्य एक फरवरी को पेश  होने जा रहे बजट के बाद फरवरी को जारी होने वाली मौद्रिक नीति में ब्याज दरे में कुछ कटौती दें। तब तक नोटबंदी के परिणाम भी सामने आ जाएंगें और बजट में मुद्रा-स्फीति को रोकने के लिए सरकार क्या कदम उठाने जा रही है, इसका  भी पता चल जाएगा। अब लोगों को फरवरी तक इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं है।