पंजाब के सीमावर्ती जिले पठानकोट ऑपरेशन ने स्पष्ट कर दिया है कि देश पर बार-बार आतंकी हमले के बावजूद पंजाब पुलिस ने कोई सबक नहीं लिया है। यही नहीं पठानकोट ऑपरेशन के दौरान थल सेना, वायु सेना और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) में भारी तालमेल की कमी ने भी देश को निराश किया है। इस ऑपरेशन के दौरान आला अधिकारी आतंकियों से लडने की बजाय आपस में ही लडते रहे और एक-दूसरे की बात काटते रहे। पंजाब पुलिस ने न तो खुद तत्काल कार्रवाई की और न ही सेना को बुलाया और जब सेना आई, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पंजाब पुलिस पहले से ही खासी बदनाम है। आपस में लडने और एक-दूसरे की टांग खींचना पंजाब पुलिस का पुरानी फितरत है। यही कारण है कि दिशा और सामंज्सयहीन पठानकोट ऑपरेशन में छह आतंकी चार दिन तक सेना की एक बटालियन, वायु सेना के 300 जवान और 60 से अधिक एनएसजी कमांडो, और पंजाब पुलिस कर्मियों का मुकाबला करते रहे। देश के लिए यह शर्म की बात है कि छह आतंकी सेना के सात जवानों को मौत के घाट उतार दें और 20 से ज्यादा को जख्मी कर दें। अब सवाल यह है कि सेना के सात जवानों की शहादत और दिशाहीन ऑपरेशन से हुई जगहंसाई के लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले तीन दशक में पठानकोट ऑपरेषन को अब तक का सबसे कमजोर आतंक-निरोधी ऑपरेशन बताया जा रहा है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने मंगलवार को माना कि आतंकियों का पठानकोट के एयरबेस में घुसना भारी सुरक्षा चूक है। रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि देश की सुरक्षा के लिए इस तरह की लापरवाही मंहगी पड सकती है। हैरानी इस बात की है कि पंजाब का सबसे संवेदनषील सीमावर्ती क्षेत्र होते हुए भी न तो पंजाब पुलिस और न ही सेना ने पठानकोट में कडे एहतियातन सुरक्षा उपाय कर रखे थे जबकि इंटेलीजेंस एजेंसियां आतंकी हमले की आशंका व्यक्त कर चुकीं थी। इतना ही नहीं हमले के 24 घंटे पहले आतंकी पंजाब पुलिस के एसपी स्तर के अधिकारी को अगवा कर चुके थे। अपहृत होने के बाद एसपी अपने आला अफसरों से कहते रहे कि आतंकियों ने उन्हें अगवा कर लिया गया है मगर उनकी बात पर विश्वास करने की बजाय वे एक-दूसरे की टांग खींचते रहे। अगले दिन इस अपहरण की खबर अखबारों की सुर्खियों में थी। समाचारों के अनुसार आतंकी हमले करने से काफी पहले 31 दिसंबर को ही एयरफोर्स की दीवार को फांद चुके थे। एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होने के लिए आतंकियों ने पहले तारों को काटा, फिर सफेदे की टहनियों के सहारे दीवार पर चढे और रस्सी से लटक कर एयरफोर्स स्टेशन के अंदर आ गए। इस सारी कार्रवाई को पूरा करने में आतंकियों को खासा समय लगा मगर किसी ने उन्हें देखा तक नहीं। इससे पता चलता है कि पठानकोट एयर स्टेशन की दीवार को फांदना कोई कठिन काम नहीं है और आतंकी जब चाहें, वहां घुसपैठ कर सकते हैं। पठानकोट ऑपरेशन के दौरान पंजाब पुलिस की विफलता फिर उजागर हुई है। पंजाब की पुलिस घूसखोरी के लिए पहले ही बदनाम है मगर आतंकी हमले के दौरान भी वह इतनी निक्कमी साबित होगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। दीनानगर आतंकी हमले के दौरान पंजाब पुलिस ने जो बहादुरी दिखाई थी, इस बार इस पर पानी फिर गया है। यही बात चिंताजनक है। पंजाब ने लंबे समय तक आतंक का दंश झेला है और इस स्थिति के दृष्टिगत पंजाब की पुलिस को और ज्यादा मुस्तैद रहने की जरुरत है। पंजाब का पडोसी जम्मू-कष्मीर पहले ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक में झुलस रहा है। पाकिस्तान बराबर खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और पंजाब को फिर से आतंकवाद की भठ्ठी में झोंकने की फिराक में रहता है। बुधवार को भी पठानकोट एयरफोर्स बेस के गेट से एक संदिग्ध आतंकी को पकडा गया। इन हालात में अगर “निकम्मी“ पंजाब पुलिस के साथ-साथ सेना और देश को आतंकी हमलों से बचाने के लिए खासतौर पर तैयार किए गए नेशनल सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) भी निक्क्मे साबित हों, तो देश को कौन बचाएगा? सुरक्षा में चूक के लिए विपक्ष में रहते हुए भाजपा कांग्रेस को घेरने का कोई मौका नहीं छोडती थी। अब वह किस मुंह से जनमानस का सामना करेगी?
गुरुवार, 7 जनवरी 2016
The Lesson From Pathankot Miscued Operation
Posted on 9:35 am by mnfaindia.blogspot.com/
पंजाब के सीमावर्ती जिले पठानकोट ऑपरेशन ने स्पष्ट कर दिया है कि देश पर बार-बार आतंकी हमले के बावजूद पंजाब पुलिस ने कोई सबक नहीं लिया है। यही नहीं पठानकोट ऑपरेशन के दौरान थल सेना, वायु सेना और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) में भारी तालमेल की कमी ने भी देश को निराश किया है। इस ऑपरेशन के दौरान आला अधिकारी आतंकियों से लडने की बजाय आपस में ही लडते रहे और एक-दूसरे की बात काटते रहे। पंजाब पुलिस ने न तो खुद तत्काल कार्रवाई की और न ही सेना को बुलाया और जब सेना आई, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पंजाब पुलिस पहले से ही खासी बदनाम है। आपस में लडने और एक-दूसरे की टांग खींचना पंजाब पुलिस का पुरानी फितरत है। यही कारण है कि दिशा और सामंज्सयहीन पठानकोट ऑपरेशन में छह आतंकी चार दिन तक सेना की एक बटालियन, वायु सेना के 300 जवान और 60 से अधिक एनएसजी कमांडो, और पंजाब पुलिस कर्मियों का मुकाबला करते रहे। देश के लिए यह शर्म की बात है कि छह आतंकी सेना के सात जवानों को मौत के घाट उतार दें और 20 से ज्यादा को जख्मी कर दें। अब सवाल यह है कि सेना के सात जवानों की शहादत और दिशाहीन ऑपरेशन से हुई जगहंसाई के लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले तीन दशक में पठानकोट ऑपरेषन को अब तक का सबसे कमजोर आतंक-निरोधी ऑपरेशन बताया जा रहा है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने मंगलवार को माना कि आतंकियों का पठानकोट के एयरबेस में घुसना भारी सुरक्षा चूक है। रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि देश की सुरक्षा के लिए इस तरह की लापरवाही मंहगी पड सकती है। हैरानी इस बात की है कि पंजाब का सबसे संवेदनषील सीमावर्ती क्षेत्र होते हुए भी न तो पंजाब पुलिस और न ही सेना ने पठानकोट में कडे एहतियातन सुरक्षा उपाय कर रखे थे जबकि इंटेलीजेंस एजेंसियां आतंकी हमले की आशंका व्यक्त कर चुकीं थी। इतना ही नहीं हमले के 24 घंटे पहले आतंकी पंजाब पुलिस के एसपी स्तर के अधिकारी को अगवा कर चुके थे। अपहृत होने के बाद एसपी अपने आला अफसरों से कहते रहे कि आतंकियों ने उन्हें अगवा कर लिया गया है मगर उनकी बात पर विश्वास करने की बजाय वे एक-दूसरे की टांग खींचते रहे। अगले दिन इस अपहरण की खबर अखबारों की सुर्खियों में थी। समाचारों के अनुसार आतंकी हमले करने से काफी पहले 31 दिसंबर को ही एयरफोर्स की दीवार को फांद चुके थे। एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होने के लिए आतंकियों ने पहले तारों को काटा, फिर सफेदे की टहनियों के सहारे दीवार पर चढे और रस्सी से लटक कर एयरफोर्स स्टेशन के अंदर आ गए। इस सारी कार्रवाई को पूरा करने में आतंकियों को खासा समय लगा मगर किसी ने उन्हें देखा तक नहीं। इससे पता चलता है कि पठानकोट एयर स्टेशन की दीवार को फांदना कोई कठिन काम नहीं है और आतंकी जब चाहें, वहां घुसपैठ कर सकते हैं। पठानकोट ऑपरेशन के दौरान पंजाब पुलिस की विफलता फिर उजागर हुई है। पंजाब की पुलिस घूसखोरी के लिए पहले ही बदनाम है मगर आतंकी हमले के दौरान भी वह इतनी निक्कमी साबित होगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। दीनानगर आतंकी हमले के दौरान पंजाब पुलिस ने जो बहादुरी दिखाई थी, इस बार इस पर पानी फिर गया है। यही बात चिंताजनक है। पंजाब ने लंबे समय तक आतंक का दंश झेला है और इस स्थिति के दृष्टिगत पंजाब की पुलिस को और ज्यादा मुस्तैद रहने की जरुरत है। पंजाब का पडोसी जम्मू-कष्मीर पहले ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक में झुलस रहा है। पाकिस्तान बराबर खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और पंजाब को फिर से आतंकवाद की भठ्ठी में झोंकने की फिराक में रहता है। बुधवार को भी पठानकोट एयरफोर्स बेस के गेट से एक संदिग्ध आतंकी को पकडा गया। इन हालात में अगर “निकम्मी“ पंजाब पुलिस के साथ-साथ सेना और देश को आतंकी हमलों से बचाने के लिए खासतौर पर तैयार किए गए नेशनल सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) भी निक्क्मे साबित हों, तो देश को कौन बचाएगा? सुरक्षा में चूक के लिए विपक्ष में रहते हुए भाजपा कांग्रेस को घेरने का कोई मौका नहीं छोडती थी। अब वह किस मुंह से जनमानस का सामना करेगी?
बुधवार, 6 जनवरी 2016
Will Cricket Become a Gentleman Game?
Posted on 8:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
क्रिकेट फिर बनेगी जेंटलमैन गेम
देश मे अगर किसी समृद्धतम स्पोर्टस संस्था में अविलंब क्रांतिकारी बदलाव की जरुरत है, तो वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है। बीसीसीआई दुनिया की सबसे धनी स्पोर्टस बॉडी है और इसलिए सियासी नेता और रसूखदार हस्तियां इस पर कब्जा जमाने की फिराक में रहती हैं। यहां तक कि जिन लोगों को खुद क्रिकेट का ”कखग” नहीं मालूम, अब तक वे ही दुनिया की इस समृद्धतम संस्था को चलाते रहे हैं। एक जमाना था जब क्रिकेट को जेंटलमैन गेम माना जाता था जिसमें स्लेजिंग, बॉडीलाइन बाउलिंग, एक्सेसिव अपीलिंग के लिए कोई जगह नहीं होती थी, मैच फिक्सिंग तो दीगर रहा। खिलाडी पूरी संजीदगी से नियमों का पालन करते। मगर समय के साथ-साथ पैसा और शोहरत ने इस जेंटलमैन गेम को धन बटोरने का जरिया बना दिया। सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग ने क्रिकेट को सटोरियों की गेम भी बना दिया है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में तो हद ही हो गई। आईपीएल के खिलाडी मैच फिक्सिंग में लिप्त पाए गए, प्रेम में मदहोश कुछ खिलाडियों ने नियमों को तोडने में कोई कसर नहीं छोडी और पूरा आईपीएल विवादों में उलझ कर रहा गया। मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोपों में चैन्नई सुपर किंग और राजस्थान रायल टीमों को आईपीएल से बाहर होना पडा। मई 2013 में दिल्ली पुलिस ने आईपीएल के चार खिलाडियों को मैच फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया । चैन्नई सुपर किंग के सीईओ और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यपन को मई 2013 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। और इस समिति ने आईपीएल तत्कालीन सीईओ सुंदर राजन की भूमिका को ही संदिग्ध पाया था। मुदगल समिति की सिफारिशॉ के बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएषन सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गई और अदालत से बीसीसीआई की कार्यशैली को पारदर्शी एवं और ज्यादा क्रिकेट फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई। बिहार क्रिकेट एसोसिशन की याचिका पर गौर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। सोमवार को समिति ने सर्वोच्च न्यायाल को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने बीसीसीआई को पेशेवर बनाने, सियासी नेताओं को इससे अलग रखने, क्रिकेट को फिर जेंटलमैन गेम बनाने, खिलाडियों के हितों की रक्षा करने और बीसीसीआई को निहित स्वार्थों के टकराव से मुक्त रखने के सुझाव दिए हैं। लोढा समिति की सिफारिषों में सबसे अहम बात आडिट को लेकर है। समिति की सिफारिश है कि बीसीसीआई का ऑडिट सीएजी से करवाया जाए। अभी बीसीसीआई का ऑडिट प्राइवेट आडिटर्स करते है़ं। पूरी दुनिया जानती है कि इस तरह के ऑडिट की उतनी विश्वसनीयता नहीं है जितनी संवैधानिक संस्था सीएजी के ऑडिट की होती है। समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की जो सिफारिश की है, उस पर विवाद हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोढा समिति की सिफारिशॉ पर क्या निर्णय लेता है, यह देखना अभी बाकी है मगर इतना तय है कि बीसीसीआई को इन सिफारिशों पर देर-सबेर अमल करना ही होगा। अगर अगर बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया तो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लोढा समिति की सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए फिर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाएगी। बीसीसीआई के लिए बेहतर यही होगा कि वह स्वेच्छा से अविलंब लोढा समिति की सिफारिशॉ को अक्षरश लागू करे। ऐसा करने से बीसीसीआई की विश्वसनीयता बढेगी। मगर मिलियन डॉलर सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई आसानी से लोढा समिति की सिफारिशे लागू कर पाएगी। इस समय बीसीसीआई में राजनेताओं का दबदबा है और यही हालात विभिन्न राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों का है। राजनेता बदलाव लाने में सबसे पीछे रहते हैं। भारत में क्रिकेट का जनून है और अगर बीसीसीआई अभी भी नहीं सुधरा तो कभी नहीं सुधरेगा। वैसे भारत मे हर छोटे-बडे क्रांतिकारी बदलाव को लाने में न्यायपालिका की अग्रणी भूमिका रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीसीसीआई मे क्रांतिकारी बदलाव लाने भी न्यायपालिका ही पहल करेगी।
देश मे अगर किसी समृद्धतम स्पोर्टस संस्था में अविलंब क्रांतिकारी बदलाव की जरुरत है, तो वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है। बीसीसीआई दुनिया की सबसे धनी स्पोर्टस बॉडी है और इसलिए सियासी नेता और रसूखदार हस्तियां इस पर कब्जा जमाने की फिराक में रहती हैं। यहां तक कि जिन लोगों को खुद क्रिकेट का ”कखग” नहीं मालूम, अब तक वे ही दुनिया की इस समृद्धतम संस्था को चलाते रहे हैं। एक जमाना था जब क्रिकेट को जेंटलमैन गेम माना जाता था जिसमें स्लेजिंग, बॉडीलाइन बाउलिंग, एक्सेसिव अपीलिंग के लिए कोई जगह नहीं होती थी, मैच फिक्सिंग तो दीगर रहा। खिलाडी पूरी संजीदगी से नियमों का पालन करते। मगर समय के साथ-साथ पैसा और शोहरत ने इस जेंटलमैन गेम को धन बटोरने का जरिया बना दिया। सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग ने क्रिकेट को सटोरियों की गेम भी बना दिया है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में तो हद ही हो गई। आईपीएल के खिलाडी मैच फिक्सिंग में लिप्त पाए गए, प्रेम में मदहोश कुछ खिलाडियों ने नियमों को तोडने में कोई कसर नहीं छोडी और पूरा आईपीएल विवादों में उलझ कर रहा गया। मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोपों में चैन्नई सुपर किंग और राजस्थान रायल टीमों को आईपीएल से बाहर होना पडा। मई 2013 में दिल्ली पुलिस ने आईपीएल के चार खिलाडियों को मैच फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया । चैन्नई सुपर किंग के सीईओ और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यपन को मई 2013 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। और इस समिति ने आईपीएल तत्कालीन सीईओ सुंदर राजन की भूमिका को ही संदिग्ध पाया था। मुदगल समिति की सिफारिशॉ के बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएषन सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गई और अदालत से बीसीसीआई की कार्यशैली को पारदर्शी एवं और ज्यादा क्रिकेट फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई। बिहार क्रिकेट एसोसिशन की याचिका पर गौर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। सोमवार को समिति ने सर्वोच्च न्यायाल को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने बीसीसीआई को पेशेवर बनाने, सियासी नेताओं को इससे अलग रखने, क्रिकेट को फिर जेंटलमैन गेम बनाने, खिलाडियों के हितों की रक्षा करने और बीसीसीआई को निहित स्वार्थों के टकराव से मुक्त रखने के सुझाव दिए हैं। लोढा समिति की सिफारिषों में सबसे अहम बात आडिट को लेकर है। समिति की सिफारिश है कि बीसीसीआई का ऑडिट सीएजी से करवाया जाए। अभी बीसीसीआई का ऑडिट प्राइवेट आडिटर्स करते है़ं। पूरी दुनिया जानती है कि इस तरह के ऑडिट की उतनी विश्वसनीयता नहीं है जितनी संवैधानिक संस्था सीएजी के ऑडिट की होती है। समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की जो सिफारिश की है, उस पर विवाद हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोढा समिति की सिफारिशॉ पर क्या निर्णय लेता है, यह देखना अभी बाकी है मगर इतना तय है कि बीसीसीआई को इन सिफारिशों पर देर-सबेर अमल करना ही होगा। अगर अगर बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया तो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लोढा समिति की सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए फिर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाएगी। बीसीसीआई के लिए बेहतर यही होगा कि वह स्वेच्छा से अविलंब लोढा समिति की सिफारिशॉ को अक्षरश लागू करे। ऐसा करने से बीसीसीआई की विश्वसनीयता बढेगी। मगर मिलियन डॉलर सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई आसानी से लोढा समिति की सिफारिशे लागू कर पाएगी। इस समय बीसीसीआई में राजनेताओं का दबदबा है और यही हालात विभिन्न राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों का है। राजनेता बदलाव लाने में सबसे पीछे रहते हैं। भारत में क्रिकेट का जनून है और अगर बीसीसीआई अभी भी नहीं सुधरा तो कभी नहीं सुधरेगा। वैसे भारत मे हर छोटे-बडे क्रांतिकारी बदलाव को लाने में न्यायपालिका की अग्रणी भूमिका रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीसीसीआई मे क्रांतिकारी बदलाव लाने भी न्यायपालिका ही पहल करेगी।
मंगलवार, 5 जनवरी 2016
Let Prime Minster Modi's Lahore Initiative Go Ahead
Posted on 9:29 am by mnfaindia.blogspot.com/
शैतानी पाकिस्तानी फितरत
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की इस बात में काफी वजन है कि “शैतान सुधर सकता है, पाकिस्तान नहीं“। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के मात्र आठ दिन और दीनानगर हमले के पांच महीने बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में फिर हमले की जरुर्रत करके पूरे देश को दहला दिया है। पठानकोट में भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के सूत्र तोडने की जबरदस्त कोशिश है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा के बाद आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। खुफिया एजेंसियां आतंकी हमले को लेकर आगाह भी कर चुकी थी। पिछले चार दशक से पाकिस्तान यही कर रहा है। “मुंह में राम-राम और बगल में छुरी“ की कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान एक ओर भारत से दोस्ती की पींगे बढाएगा, दूसरी ओर भाडे के टटुओं से भारत की अखंडता पर प्रहार कराएगा। शिमला समझौते से लेकर मोदी की लाहौर यात्रा तक पाकिस्तान की “शैतानी फ़ितरत “ का यही सिला रहा है। पाकिस्तान की कायर सेना जब तीन बार भारत को युद्ध में परास्त नहीं कर पाई, तब उसने आतंक का रास्ता पकडा। बेरोजगार और अशिक्षित युवाओं को इस्लाम के नाम पर मर-मिटने की घुटी पिलाई। उन्हें आतंकी बनाकर हिसा फैलाने के लिए भारत भेजा। पाकिस्तान यह बात भली-भांति जानता है कि मुठठी भर आतंकी भारत में घुसकर सिवा निर्दोष लोगों को मारने और खुद मारे जाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तथापि पाकिस्तान का मकसद भारत को अस्थिर करना है। पाकिस्तान भारत को ताकतवर और खुशाहल बनते देख ही नहीं सकता क्योंकि वह भारत का न तो आर्थिक रुप से और न ही युद्ध में मुकाबला कर सकता है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात इस कद्र उलझे हुए हैं कि वह चाहकर भी भारत के साथ दोस्ती नहीं बढा सकता। सेना का देश की सियासत में जबरदस्त दखल रहा है। जब कभी चुनी हुई सरकार सत्ता में आई पाकिस्तानी सेना ने उसे काम ही नहीं करने दिया और जब-तब तख्ता पलट दिया। सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता। सेना की ही तरह उसकी मददगार कुख्यात आईएसआई भारत की कट्टर विरोधी है। इन हालात में पाकिस्तान के गैर-सैनिक शासक जब कभी भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाते है, सेना और आईएसआई उस हाथ को काट देते हैं। इन हालात में भारत को पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। जिस देश की सेना, धार्मिक और सियासी नेताओं को भारत का वजूद फूटी आंख नहीं सुहाता हो, उससे दोस्ती नहीं “मक्कारी“ की ही उम्मीद की जा सकती है। पठानकोट हादसे ने फिर भारत की चौकसी और चाक-चौबंदी पर सवाल खडा कर दिया है। 27 जुलाई, 2015 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के दीनानगर पर आतंकी हमले से सबक लेते हुए हमें पूरी तरह से सतर्क रहने की जरुरत थी मगर बार-बार आतंकी हमलो ंके बावजूद लगता है हमें सब कुछ भला देनी की बीमारी है। और दुश्मन यह बात बखूबी जानता है। यही वजह है कि आतंकी आराम से भारत में घुसपैठ कर लेते हैं। तीन दिन तक आतंकी पठानकोट के आसपास घुमते रहे मगर खुफिया एजेेंसियों को भनक तक नहीं लगी। आतकियों ने स्पुरिटेंडट ऑफ़ पुलिस लेवल के अधिकारी को अगुवा कर लिया , पंजाब पुलिस फिर भी नहीं चेती.। चिंताजनक बात यह है कि आतंकी आराम से पठानकोट स्थित वायु सेना के एयरबेस में भी घुसपैठ कर गए जबकि वहां कडा पहरा रहता है। पहली बार भारतीय वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों ने दस्तक दी है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। इससे तो यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय सेना की सुरक्षा में भी भारी छेद है। पठानकोट आतंकी हमले को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं होना स्वभाविक है। आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान पाकिस्तानी कायरतापूर्ण हरकतों की खातिर शहीद होते रहेंगे? भारत को कभी-न-कभी तो माकूल जवाब देना ही होगा। मगर सच्चाई यह भी है कि पडोसी की फितरत शैतानी ही क्यों न हो, उससे बोले बगैर रहा नहीं जा सकता। इस तरह के प्रयास आपसी कटुता को कम करने में सहायक होते हैं। मोदी की लाहौर यात्रा के सूत्र आगे बढने ही चाहिए।
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की इस बात में काफी वजन है कि “शैतान सुधर सकता है, पाकिस्तान नहीं“। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के मात्र आठ दिन और दीनानगर हमले के पांच महीने बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में फिर हमले की जरुर्रत करके पूरे देश को दहला दिया है। पठानकोट में भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के सूत्र तोडने की जबरदस्त कोशिश है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा के बाद आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। खुफिया एजेंसियां आतंकी हमले को लेकर आगाह भी कर चुकी थी। पिछले चार दशक से पाकिस्तान यही कर रहा है। “मुंह में राम-राम और बगल में छुरी“ की कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान एक ओर भारत से दोस्ती की पींगे बढाएगा, दूसरी ओर भाडे के टटुओं से भारत की अखंडता पर प्रहार कराएगा। शिमला समझौते से लेकर मोदी की लाहौर यात्रा तक पाकिस्तान की “शैतानी फ़ितरत “ का यही सिला रहा है। पाकिस्तान की कायर सेना जब तीन बार भारत को युद्ध में परास्त नहीं कर पाई, तब उसने आतंक का रास्ता पकडा। बेरोजगार और अशिक्षित युवाओं को इस्लाम के नाम पर मर-मिटने की घुटी पिलाई। उन्हें आतंकी बनाकर हिसा फैलाने के लिए भारत भेजा। पाकिस्तान यह बात भली-भांति जानता है कि मुठठी भर आतंकी भारत में घुसकर सिवा निर्दोष लोगों को मारने और खुद मारे जाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तथापि पाकिस्तान का मकसद भारत को अस्थिर करना है। पाकिस्तान भारत को ताकतवर और खुशाहल बनते देख ही नहीं सकता क्योंकि वह भारत का न तो आर्थिक रुप से और न ही युद्ध में मुकाबला कर सकता है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात इस कद्र उलझे हुए हैं कि वह चाहकर भी भारत के साथ दोस्ती नहीं बढा सकता। सेना का देश की सियासत में जबरदस्त दखल रहा है। जब कभी चुनी हुई सरकार सत्ता में आई पाकिस्तानी सेना ने उसे काम ही नहीं करने दिया और जब-तब तख्ता पलट दिया। सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता। सेना की ही तरह उसकी मददगार कुख्यात आईएसआई भारत की कट्टर विरोधी है। इन हालात में पाकिस्तान के गैर-सैनिक शासक जब कभी भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाते है, सेना और आईएसआई उस हाथ को काट देते हैं। इन हालात में भारत को पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। जिस देश की सेना, धार्मिक और सियासी नेताओं को भारत का वजूद फूटी आंख नहीं सुहाता हो, उससे दोस्ती नहीं “मक्कारी“ की ही उम्मीद की जा सकती है। पठानकोट हादसे ने फिर भारत की चौकसी और चाक-चौबंदी पर सवाल खडा कर दिया है। 27 जुलाई, 2015 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के दीनानगर पर आतंकी हमले से सबक लेते हुए हमें पूरी तरह से सतर्क रहने की जरुरत थी मगर बार-बार आतंकी हमलो ंके बावजूद लगता है हमें सब कुछ भला देनी की बीमारी है। और दुश्मन यह बात बखूबी जानता है। यही वजह है कि आतंकी आराम से भारत में घुसपैठ कर लेते हैं। तीन दिन तक आतंकी पठानकोट के आसपास घुमते रहे मगर खुफिया एजेेंसियों को भनक तक नहीं लगी। आतकियों ने स्पुरिटेंडट ऑफ़ पुलिस लेवल के अधिकारी को अगुवा कर लिया , पंजाब पुलिस फिर भी नहीं चेती.। चिंताजनक बात यह है कि आतंकी आराम से पठानकोट स्थित वायु सेना के एयरबेस में भी घुसपैठ कर गए जबकि वहां कडा पहरा रहता है। पहली बार भारतीय वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों ने दस्तक दी है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। इससे तो यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय सेना की सुरक्षा में भी भारी छेद है। पठानकोट आतंकी हमले को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं होना स्वभाविक है। आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान पाकिस्तानी कायरतापूर्ण हरकतों की खातिर शहीद होते रहेंगे? भारत को कभी-न-कभी तो माकूल जवाब देना ही होगा। मगर सच्चाई यह भी है कि पडोसी की फितरत शैतानी ही क्यों न हो, उससे बोले बगैर रहा नहीं जा सकता। इस तरह के प्रयास आपसी कटुता को कम करने में सहायक होते हैं। मोदी की लाहौर यात्रा के सूत्र आगे बढने ही चाहिए।
शनिवार, 2 जनवरी 2016
Modi Govt's New Year Gift To Youth
Posted on 9:14 am by mnfaindia.blogspot.com/
नए साल का तोहफा
केन्द्र सरकार में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी (सी और डी गु्रप) के पदों की भर्ती के लिए इंटरव्यू पद्धति को खत्म करके मोदी सरकार ने देश के लाखों बेरोजगारों को नव वर्ष का उम्दा तोहफा दिया है। सरकारी नौकरी के लिए मारे-मारे फिर रहे युवाओं के लिए नए साल में इससे बढिया तोहफा हो ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वत्रंतता दिवस के अपने संबोधन में केन्द्र सरकार के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने और इसे पहली जनवरी 2016 से लागू करने का ऐलान किया था। आज (पहली जनवरी) से यह व्यवस्था लागू हो गई है। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि दुनिया में ऐसा कोई भी चयनकर्ता नहीं है जो दो मिनट के इंटरव्यू में आवेदक की योग्यता को परख ले। प्रधानमंत्री के इस कथन में खासा वजन है। योग्यता जांचने-परखने के लिए परीक्षा सबसे सटीक तरीका है और मेरिट पर भर्ती एकदम न्यायसंगत व्यवस्था। एक जमाना था जब नौकरी और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग में दाखिले भी विशुद्ध मेरिट पर दिए जाते थे। बाहरवीं की परीक्षा मे जो अव्वल आते, वही मेधावी छात्र मेडिकल और अन्य व्यावसायिक कॉलेजिज में दाखिला पाते। यह पद्धति अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत थी। मगर प्रतिस्पर्धा बढने के साथ इस पद्धति को ज्यादा कारगर नहीं पाया गया। अब बाहरर्वीं की परीक्षा से कहीं ज्यादा आल इंडिया मेडिकल, इंजीनियरिंग एव विभिन्न राज्यों के मेडिकल, इंजीनियरिंग परीक्षाएं महत्वपूर्ण हो गई हैं। इन सब में भी मेरिट के आधार पर ही दाखिले दिए जाते हैं। वैसे सियासी नेताओं ने निजी मेडिकल और इंजीनिंयरिंग कॉलेजिज में मेनेजमेंट कोटा देकर बैकडोर दाखिले का जुगाड कर रखा है। इसी तरह सरकारी नौकरियों में इंटरव्यू के जरिए भर्ती की व्यवस्था भी सिफारिश और भाई-भतीजावाद फैलाने का जरिया है। यह बात जगजाहिर है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में सिफारिश का बोलबाला रहता है और सियासी नेताओं के परिजनों, करीबियों अथवा उनकी सिफारिश पर ही सरकारी नौकरी मिलती है। सरकारी नौकरियों में भर्ती का आलम यह है कि अगर सिफारिश है तो पद भी सृजित किया जाता है और रातोंरात भर्ती और चयन भी। प्रधानमंत्री मोदी ने बेरोजगार युवाओं के दुख- दर्द को समझा है। यह स्थिति वाकई ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि बेरोजगारों को दो-तीन मिनट के इंटरव्यू के लिए दूर-सदूर क्षेत्रों से दिल्ली अथवा राज्यों की राजधानी आना पडे और बाद में पता चले कि चयन किसी सिफारिशी का हुआ है। अब तक यही होता रहा है। हरियाणा के पूर्व म्ुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके पुत्र तो भर्ती में धांधलियों के लिए जेल की सजा काट रहे हैं। केन्द्र सरकार के 36 लाख पदों मेंसे 95 फीसदी पद तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के हैं। हर साल तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के लगभग 50,000 पदों पर भर्ती की जाती है। केद्र के अलावा विभिन्न राज्यों में भी यही स्थिति है। राज्यों में भी 90 फीसदी पद तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के हैं। प्रधानमंत्री ने राज्यों से भी तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने का आहवान किया है। भाजपा शांसित राज्य ऐसा करने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हैं मगर गैर-भाजपा शासित राज्यों को जैसे सांप सूंघ गया हो। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू पद्धति खत्म करने से राज्यों को बचत भी हो सकती है। अधिकतर राज्यों ने तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती के लिए अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड (एसएससबी) का गठन कर रखा है जबकि भर्ती का काम लोक सेवा आयोग भी कर सकता है। तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू खत्म किए जाने से एसएससबी की कोई जरुरत नहीं रहेगी। इससे सरकार का पैसा भी बचेगा। देश में आज भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है। मध्यम एवं कमजोर तबको के लिए सरकारी नौकरी वरदान है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने सालों से जारी अन्यायपूर्ण भर्ती को समाप्त करके पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था को लागू करवाया है।
केन्द्र सरकार में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी (सी और डी गु्रप) के पदों की भर्ती के लिए इंटरव्यू पद्धति को खत्म करके मोदी सरकार ने देश के लाखों बेरोजगारों को नव वर्ष का उम्दा तोहफा दिया है। सरकारी नौकरी के लिए मारे-मारे फिर रहे युवाओं के लिए नए साल में इससे बढिया तोहफा हो ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वत्रंतता दिवस के अपने संबोधन में केन्द्र सरकार के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने और इसे पहली जनवरी 2016 से लागू करने का ऐलान किया था। आज (पहली जनवरी) से यह व्यवस्था लागू हो गई है। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि दुनिया में ऐसा कोई भी चयनकर्ता नहीं है जो दो मिनट के इंटरव्यू में आवेदक की योग्यता को परख ले। प्रधानमंत्री के इस कथन में खासा वजन है। योग्यता जांचने-परखने के लिए परीक्षा सबसे सटीक तरीका है और मेरिट पर भर्ती एकदम न्यायसंगत व्यवस्था। एक जमाना था जब नौकरी और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग में दाखिले भी विशुद्ध मेरिट पर दिए जाते थे। बाहरवीं की परीक्षा मे जो अव्वल आते, वही मेधावी छात्र मेडिकल और अन्य व्यावसायिक कॉलेजिज में दाखिला पाते। यह पद्धति अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत थी। मगर प्रतिस्पर्धा बढने के साथ इस पद्धति को ज्यादा कारगर नहीं पाया गया। अब बाहरर्वीं की परीक्षा से कहीं ज्यादा आल इंडिया मेडिकल, इंजीनियरिंग एव विभिन्न राज्यों के मेडिकल, इंजीनियरिंग परीक्षाएं महत्वपूर्ण हो गई हैं। इन सब में भी मेरिट के आधार पर ही दाखिले दिए जाते हैं। वैसे सियासी नेताओं ने निजी मेडिकल और इंजीनिंयरिंग कॉलेजिज में मेनेजमेंट कोटा देकर बैकडोर दाखिले का जुगाड कर रखा है। इसी तरह सरकारी नौकरियों में इंटरव्यू के जरिए भर्ती की व्यवस्था भी सिफारिश और भाई-भतीजावाद फैलाने का जरिया है। यह बात जगजाहिर है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में सिफारिश का बोलबाला रहता है और सियासी नेताओं के परिजनों, करीबियों अथवा उनकी सिफारिश पर ही सरकारी नौकरी मिलती है। सरकारी नौकरियों में भर्ती का आलम यह है कि अगर सिफारिश है तो पद भी सृजित किया जाता है और रातोंरात भर्ती और चयन भी। प्रधानमंत्री मोदी ने बेरोजगार युवाओं के दुख- दर्द को समझा है। यह स्थिति वाकई ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि बेरोजगारों को दो-तीन मिनट के इंटरव्यू के लिए दूर-सदूर क्षेत्रों से दिल्ली अथवा राज्यों की राजधानी आना पडे और बाद में पता चले कि चयन किसी सिफारिशी का हुआ है। अब तक यही होता रहा है। हरियाणा के पूर्व म्ुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके पुत्र तो भर्ती में धांधलियों के लिए जेल की सजा काट रहे हैं। केन्द्र सरकार के 36 लाख पदों मेंसे 95 फीसदी पद तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के हैं। हर साल तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के लगभग 50,000 पदों पर भर्ती की जाती है। केद्र के अलावा विभिन्न राज्यों में भी यही स्थिति है। राज्यों में भी 90 फीसदी पद तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के हैं। प्रधानमंत्री ने राज्यों से भी तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने का आहवान किया है। भाजपा शांसित राज्य ऐसा करने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हैं मगर गैर-भाजपा शासित राज्यों को जैसे सांप सूंघ गया हो। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू पद्धति खत्म करने से राज्यों को बचत भी हो सकती है। अधिकतर राज्यों ने तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती के लिए अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड (एसएससबी) का गठन कर रखा है जबकि भर्ती का काम लोक सेवा आयोग भी कर सकता है। तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू खत्म किए जाने से एसएससबी की कोई जरुरत नहीं रहेगी। इससे सरकार का पैसा भी बचेगा। देश में आज भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है। मध्यम एवं कमजोर तबको के लिए सरकारी नौकरी वरदान है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने सालों से जारी अन्यायपूर्ण भर्ती को समाप्त करके पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था को लागू करवाया है।
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
The Challenges Before Us in New Year
Posted on 9:31 am by mnfaindia.blogspot.com/
सुस्वागतम 2016
2015 को अलविदा और नव वर्ष 2016 का लख-लख सुस्वागतम। गुजरे साल की खट्टी-मीठी यादों को संजोए, नव वर्ष 2016 को अधिकाधिक खुशगवार बनाने के लिए हमें नए संकल्प लेने हैं और नए प्रकल्पों को संजीदगी से लागू करना है। 2016 में गुजरे साल की अपेक्षा और ज्यादा चुनौतियां हैं। पूरी दुनिया इस समय तबाही की कगार पर है। हर मुल्क को न्यूक्लियर पॉवर बनने की सनक सवार है। इससे समूचा विश्व न्यूक्लियर युद्ध के मुहाने पर खडा है। किसी सनकी शासक के हाथ अगर न्यूक्लियर पॉवर आ गई तो पलक झपते ही तबाही का मंजर बिछ सकता है। अल कायदा, तालिबान, लश्कर जैसे खूंखार आतंकी संगठनों को पीछे छोडते हुए अब सीरिया और इराक के बडे क्षेत्र पर कब्जा जमाए आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) ने पूरी दुनिया में दहशत फैला रखी है। आईएसआईएस की दहशत का आलम यह है कि बेल्जियम की राजधानी बु्रसेल्स में स्थानीय प्रशासन ने आतंकी हमले के डर से नए साल का जश्न तक रद्द कर दिया। पेरिस के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का कडा पहरा है। इस बार फ्रांस की राजधानी में नए साल के आगमन पर पटाखे नहीं फोडे गए । पेरिस अभी भी 13 नवंबर के आतंकी हमलों से सहमा हुआ है। इन श्रृंखलाबद्ध हमलों में 130 लोग मारे गए थे। रुस की राजधानी मास्को के रेड स्कॉवयर को इस बार नए साल के जश्न के लिए बंद रखा गया । जर्मनी की राजधानी बर्लिन में क्रिसमस के दिन से ब्रांडेनबर्ग गेट बंद है और नए साल के आयोजन के लिए भी बंद थे । ऐसा पहली बार हुआ है। यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी नए साल के आगमन पर तगडे सुरक्षा बंदोबस्त किए गए । आतंकी हमले की आशंका के माहौल में नए साल के जश्न में इस बार वह जोश नहीं था जो अक्सर हुआ करता था। जब नए साल का आगाज ही भय और आतंक के माहौल से हो रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है वर्ष 2016 कैसा होगा। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि दुनिया को अपनी सैन्य, आर्थिक और बौद्धिक ताकत की धोंस जमाने वाले अमेरिका और उसके मित्र यूरोपियन देश इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा से डरे और सहमे हुए है। न्यूक्लियर पॉवर होते हुए भी यूरोप और अमेरिका आईएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूद नहीं कर पाए हैं। 2015 में आतंकी घटनाएं जिस तरह पूरी दुनिया को दहलाती रहीं, 2016 में आतंक का चेहरा और ज्यादा वीभत्स हो सकता है। अगर आतंक 2016 में दुनिया के लिए सबसे बडा खतरा है तो जलवायु परिवर्तन इससे भी बडा है। आतंक से निपटा जा सकता है और इसका तोड भी है मगर प्राकृतिक कहर का कोई तोड नहीं है। इग्लैंड के कई क्षेत्र इन दिनों बाढग्रस्त हैं। यॉर्क शहर बाढ के पानी में पूरी तरह डूब चुका है। मिडिल-वेस्ट अमेरिका में मूसलाधार पानी बरस रहा है। 24 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई क्षेत्र जलमग्न हो चुके हैं। दक्षिण अमेरिका में भी तूफान और बारिश ने तबाही मचा रखी है। पिछले सप्ताह दक्षिण अमेरिकी देश उरूग्वे, पराग्वे, ब्राजील और अर्जेटीना में भारी बारिश से एक लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पडा। इसी माह तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई में प्रलंयंकारी बारिश ने भारी तबाही मचाई और दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक सरकार भी बाढग्रस्त हो गई। वर्ष 2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा और मौसम विज्ञानियों का आकलन है 2016 उससे भी अधिक गर्म रहेगा। आतंक और जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरों के अलावा आंतरिक खतरें भी कम नहीं हैं । भारत दुनिया का तेजी से उभरता विकासशील देश है और इस साल ग्रोथ में वह चीन को भी पीछे छोड देंगे। तथापि असहिष्णुता और सांप्रयिकता दो ऐसे जहर हैं जो देश की अखंडता पर प्रहार कर रहें है। नए साल को खुशगवार बनाने के लिए हमें “जियो और जीने दो“ पर चलना होगा। प्रकृति के साथ मिल जुलकर आगे बढना समय की मांग है ।
2015 को अलविदा और नव वर्ष 2016 का लख-लख सुस्वागतम। गुजरे साल की खट्टी-मीठी यादों को संजोए, नव वर्ष 2016 को अधिकाधिक खुशगवार बनाने के लिए हमें नए संकल्प लेने हैं और नए प्रकल्पों को संजीदगी से लागू करना है। 2016 में गुजरे साल की अपेक्षा और ज्यादा चुनौतियां हैं। पूरी दुनिया इस समय तबाही की कगार पर है। हर मुल्क को न्यूक्लियर पॉवर बनने की सनक सवार है। इससे समूचा विश्व न्यूक्लियर युद्ध के मुहाने पर खडा है। किसी सनकी शासक के हाथ अगर न्यूक्लियर पॉवर आ गई तो पलक झपते ही तबाही का मंजर बिछ सकता है। अल कायदा, तालिबान, लश्कर जैसे खूंखार आतंकी संगठनों को पीछे छोडते हुए अब सीरिया और इराक के बडे क्षेत्र पर कब्जा जमाए आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) ने पूरी दुनिया में दहशत फैला रखी है। आईएसआईएस की दहशत का आलम यह है कि बेल्जियम की राजधानी बु्रसेल्स में स्थानीय प्रशासन ने आतंकी हमले के डर से नए साल का जश्न तक रद्द कर दिया। पेरिस के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का कडा पहरा है। इस बार फ्रांस की राजधानी में नए साल के आगमन पर पटाखे नहीं फोडे गए । पेरिस अभी भी 13 नवंबर के आतंकी हमलों से सहमा हुआ है। इन श्रृंखलाबद्ध हमलों में 130 लोग मारे गए थे। रुस की राजधानी मास्को के रेड स्कॉवयर को इस बार नए साल के जश्न के लिए बंद रखा गया । जर्मनी की राजधानी बर्लिन में क्रिसमस के दिन से ब्रांडेनबर्ग गेट बंद है और नए साल के आयोजन के लिए भी बंद थे । ऐसा पहली बार हुआ है। यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी नए साल के आगमन पर तगडे सुरक्षा बंदोबस्त किए गए । आतंकी हमले की आशंका के माहौल में नए साल के जश्न में इस बार वह जोश नहीं था जो अक्सर हुआ करता था। जब नए साल का आगाज ही भय और आतंक के माहौल से हो रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है वर्ष 2016 कैसा होगा। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि दुनिया को अपनी सैन्य, आर्थिक और बौद्धिक ताकत की धोंस जमाने वाले अमेरिका और उसके मित्र यूरोपियन देश इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा से डरे और सहमे हुए है। न्यूक्लियर पॉवर होते हुए भी यूरोप और अमेरिका आईएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूद नहीं कर पाए हैं। 2015 में आतंकी घटनाएं जिस तरह पूरी दुनिया को दहलाती रहीं, 2016 में आतंक का चेहरा और ज्यादा वीभत्स हो सकता है। अगर आतंक 2016 में दुनिया के लिए सबसे बडा खतरा है तो जलवायु परिवर्तन इससे भी बडा है। आतंक से निपटा जा सकता है और इसका तोड भी है मगर प्राकृतिक कहर का कोई तोड नहीं है। इग्लैंड के कई क्षेत्र इन दिनों बाढग्रस्त हैं। यॉर्क शहर बाढ के पानी में पूरी तरह डूब चुका है। मिडिल-वेस्ट अमेरिका में मूसलाधार पानी बरस रहा है। 24 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई क्षेत्र जलमग्न हो चुके हैं। दक्षिण अमेरिका में भी तूफान और बारिश ने तबाही मचा रखी है। पिछले सप्ताह दक्षिण अमेरिकी देश उरूग्वे, पराग्वे, ब्राजील और अर्जेटीना में भारी बारिश से एक लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पडा। इसी माह तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई में प्रलंयंकारी बारिश ने भारी तबाही मचाई और दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक सरकार भी बाढग्रस्त हो गई। वर्ष 2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा और मौसम विज्ञानियों का आकलन है 2016 उससे भी अधिक गर्म रहेगा। आतंक और जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरों के अलावा आंतरिक खतरें भी कम नहीं हैं । भारत दुनिया का तेजी से उभरता विकासशील देश है और इस साल ग्रोथ में वह चीन को भी पीछे छोड देंगे। तथापि असहिष्णुता और सांप्रयिकता दो ऐसे जहर हैं जो देश की अखंडता पर प्रहार कर रहें है। नए साल को खुशगवार बनाने के लिए हमें “जियो और जीने दो“ पर चलना होगा। प्रकृति के साथ मिल जुलकर आगे बढना समय की मांग है ।
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