Today we are celebrating the "festival of lights"-Deepavali. It is celebrated with gusto more in North India. But, I am not as enthusiastic for celebrating the festival as I used to be during my childhood. May because of my age but I find, over the years, youngster have also developed cold feet to the festival. They find internet and whats-app more entertaining than bursting firecrackers. Not surprising that the locality where I live, there were less noise of firecrackers' bursting.The reports in local media suggests even the sale of sweets has come down considerably. the commercialization of this most important Hindu festival has undermined the very spirit of Diwali. Our fair and festivals have rich cultural and social ethos engrossed in their festivity. By converting the festivity into trade and commerce activities, its cultural and social significance is bound to collapse. The new generation hasn't been groomed by our rich cultural ethos. As such, they have no affiliation to the spirit of festivity. It was quite different during my childhood days. The festival enthusiasm used to be at its peak. There were no shopping frenzies , and exchange of costly gifts to promote the business. On the contrary, it was a simple and down-to-the- earth affair. My mother would start the preparations right from the Dussehra- the day effigy of the Ravan is burnt. The entire house would be white-washed and painted fresh. Mother would make Rangoli to welcome Laxmi (Its different matter, she never visited our house). New clothes would be made ready for wearing on Diwali and sweets prepared at home. On Diwali, mother would cook special dishes for us. We used to wait for this festival all over the years. Ours was a traditional hilly village nestled amidst the rocky terrain in inner Himalaya. As the maize crop was just harvested, boys were assigned the duty of removing stubble and collect these for firewood on Diwali. We would religiously do the work. In fact, there used to be a sort of competition among youngster for making the firewood as large. The festival spirit would continue till Baiya-dooj, another occasion for getting sweets. Diwali is the most important festival celebrated in north India, celebrated by all sections of the society. It begins with "Dhanteras" and concludes on "Bhaiya Dooj- the day brother and sister. People buy gold-silver and utensils on "Dhanteras" to lay the foundation of prosperous life. The "Dhanteras" is considered as auspicious for buying. The next day is Chhoti (small) Diwali) or the day of Narak Chatudarshi" meant for worshiping for long life.And On Diwali, the Laxshmi ( Godess of Prosperity) and Ganesh (God of Commerce) are worshiped. Next to Diwali is the "Gowardhan Day" when traders start fresh and farmers and skilled workers worship their skill. And last day of the festival is the day for brother and sister to cement their sibling ties. The five-day celebrations mean a lot of things- from social and economic festivity. all woven in a way of spirituality. The crass commercialization has no space in this traditional festivity. It was this spirituality. of Diwali that US was attracted towards the festival of lights. In 2003, the Diwali was for the first time celebrated in "White House" and in 2007, the festival was officially recognized. In 2009, Barack Obama was the first US president to celebrate Diwali personally. Apart from Hindus, Sikh celebrate the festival as "Bandi Chhod Diwas" and Jain community as "Nirvana" of Mahavir. The bursting of firecrackers is another aspect of Diwali that has gone wrong. It is estimated that every year firecrackers of more than Rs 350 crore are burst in India on Diwali and around 10 percent of people are hurt by burning and firecrackers' bursting related incidences. On an average, 20 people are killed every year in factories of Shivakashi- the country leading firecrackers maker in Tamil Nadu. Over the years the celebrations of Diwali has turned into commercial fiestas. Diwali is a celebration of life, its enjoyment and goodness. If we want to celebrate Diwali in its true spirit, we need to learn the message the festival delivers to us. The festival teaches us the way the dark night of Kartik Month is illuminated with lights, we need to illuminate our society, our people and the country.And all of us know how to illuminate the country.
बुधवार, 11 नवंबर 2015
Happy Diwali: lluminate Light of Knowledge And Love
Posted on 10:29 am by mnfaindia.blogspot.com/
ज्ञान और प्रेम के दीप जलाएं
देश में आज (बुधवार को) दीपावली का पर्व धूमधाम एवं हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। भारत में यह सबसे बडा त्यौहार होता है और पूरे पांच दिन चलता है। अंधकार पर रोशनी की विजय के लिए इस त्योहार को मनाया जाता है। देश में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दीपावली का सामाजिक और आर्थिक विशेष महत्व है। दीपावली स्वच्छता और प्रकाश का पर्व है। उपनिषद् में दीपावली को लेकर कहा गया है “ तमसो मा ज्योतिर्गमय“, अर्थात अंधेरे से प्रकाश की ओर जाएं“। इसी के दृश्टिगत सदियों से अखंड भारत में दीपावली को घर की साफ-सफाई की जाती है, दीए जलाए जाते हैं, रिश्तेदारो -मित्रों और पडोसियों को तोहफे दिए जाते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। कार्तिक मास की सघन अमावस्या की रात दीपावली पूरा देश जब रोशनी में जगमगा उठता है, यह आलोकिक छठा देखने लायक होती है । दीपावली के आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए 2003 में अमेरिका के राष्ट्र्पति निवास “व्हाइट हाउस“ में इसे धूमधाम से मनाया गया था। 2007 में अमेरिका में दीपावली को अधिकृत दर्जा दिया गया और 2009 में व्हाइट हाउस में व्यक्तिगत रुप से दीपावली मनाने वाले बराक ओबामा पहले अमेरिकी राष्टृपति बने। नेपाल में भी भारत की तरह दीपावली धूमधाम से मनाई जाती है इसी दिन नेपाली संवत वर्ष भी शुरु होता है। फिजी और मारिशस में दीपावली पर बाकायदा सार्वजनिक अवकाश रहता है। भारत में दीपावली पर्वों का समूह है। दशहरे के तुरंत बाद से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घरों-दुकानों में रंग-रोगन किया जाता है। घरों में रंगोलियां बनाई जाती हैं। धनतेरस से शुरु होकर भैया दूज को इस त्योहार का समापन होता है। हर दिन मनाए जाने वाले त्योहार का अपना महत्व है। धनतेरस को सोना-चांदी और बर्तनों की खरीदारी कर हम समृद्धि की नींव रखते हैं। इस दिन की खरीदारी को शुभ माना जाता है। धनतेरस के अगले दिन नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दीपावली होती है और इस दिन दीर्घायु के लिए यम की पूजा की जाती है। बडी दीपावली को लक्ष्मी और गणेेश की अराधना की जाती है। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन व्यापारी और व्यवसायी अपने बही-खाते बदलकर नई शुरुआत करते हैं। किसान और कामगार अपने औजारों, खेत-खलिहानों और मषीनरी की पूजा करते हैं। और दीपावली त्योहार के अंतिम दिन भाई-बहन का पर्व मनाया जाता है। देश का हर नागरिक दीपावली के महत्व से बखूबी परिचित है। इस त्योहार की विशेषता को रेखांकित करने का मकसद यह है कि हम सदियों की परिपाटी को बस आंख मूंद कर यूं ही निभा रहे हैं। हम हर दीपावली को अरबों रु की आतिशबाजी करते हैं, पटाखे फोडते हैं। इससे जनमानस को शारीरिक रुप से तो नुकसान होता ही है, साल-दर-साल प्रदूषण बढता जा रहा है और पर्यावरण को खासी क्षति पहुंच रही है। भारत में हर साल 350 करोड रु से भी अधिक के पटाखे फूंके जाते हैं। देश में पटाखे बनाने वाली सबसे बडी नगरी तमिल नाडु स्थित शिवकाशी में ही 275 करोड रु के पटाखे बनाए जाते हैं। इनसे 70,000 लोगों को रोजगार तो मिल रहा है मगर हर साल फैक्ट्रियों में आग लगने के कारण औसतन 20 लोग बेमौत मारे जाते हैं। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि दीपावली के अगले कुछ दिनों तक प्रदूषण का स्तर कहीं ज्यादा बढ जाता है और इससे लोगों, विशेषतय बच्चों और वृद्धों की सेहत पर बुरा असर पड रहा है। ऐसी दीवाली का क्या मतलब जिससे प्रदूषण फैले, लोगों का जीन हराम हो जाए , उनकी जानें जाएं और शारिरिक चोट पहुंचे? क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि दीपावली हमें असल में क्या सिखाती है। अज्ञानता, अहंकार, बैमनस्य, अंधविश्वास और बुराइयों के घनघोर अंधकार को मिटा कर ही हम अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं। अपने जीवन में ज्ञान, विनम्रता, भाईचारे, और अच्छाइयों के दीए जलाएं। दीर्घायु के लिए गंदी आदतों से बचें और जीवन में परोपकार के दीए जलाएं। अपने कौशल और सृजनात्मक शक्ति को व्यर्थ के प्रयोजनों में न गंवाएं, अलबत्ता समाज और राष्ट्र सेवा के दीप जलाएं। और सबसे बढ्कर पर्यावरण फ्रेंडली पटाखे फोडें और ग्रीन दीपावली मनाएं। दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।
मंगलवार, 10 नवंबर 2015
Bihar Results: A warning To Modi-led NDA
Posted on 8:59 am by mnfaindia.blogspot.com/
शानदार जीत, जबरदस्त डिफ्टि....
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।
रविवार, 8 नवंबर 2015
Why Exit And Opinion Polls Prove Wrong Every Time?
Posted on 2:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
It was a confusing live coverage of Bihar results. While the national channel were, initially, showing clear lead to BJP-led NDA alliance , the regional channels were flashing Nitish-Lalu led grand alliance's lead. The fact that initial trends are, more often, illusive have been proved many times,. Despite this, panelists and anchors on national channels were congratulating BJP and berating grand alliance. But, it was different on regional channels. By the 10 AM, as more and more trends started trickling in, it was quite clear that grand alliance of Nitish-Lalu was surging ahead. And national channels changed the tone and tenor. Panelists and anchors were full of appreciation for Nitish-Lalu grand alliance. The final results, like Delhi were drastically different from initial trends. It was quite amusing to many of the watchers. How come, two distinct trends showing opposite results emerged. So much so that some anchors moderating various live coverage of news channels were also amused. It could be the initially trends were in favour of BJP led alliance as counting are region and area focused. It happens, more often than not, that a voting pattern of one area is quite different from others. As such, initial trends could favour one party but final results are different. Such trends more conspicuous in local issues driven assembly elections. It had happened in January 2012 Punjab assembly elections, The initial trends favoured Congress but final results were in favour SAD-BJP alliance. However, in such a situation, both national and regional channels had shown the same results. In Bihar case on Saturday, the scenario was different. The counting can't show two different trends. May be that TRP crazy news channels out to outperform each-other were just sensationalizing the results or were just fudging the trends. Unfortunately, media is often influenced by the personal prejudices. The bias is quite discernible not only in electronic media but also in print media. Once again, the coverage of Bihar elections have proved this. The exit polls and opinion polls are wide of the mark. Neither print nor Electronic media could perceive that there was a Lalu-Nitish wave.. Lalu Prasad Yadav's RJD has emerged the largest single party even overtaking Nitish Kumur JD(U). BJP has just finished third while initial trends had placed BJP on top. The verdict in Bhiar is not surprising. Indian voters have given decisive verdict om many occasions, especially when it comes to their pride. This time pride of Biharis was in danger. Lalu and Nitish are the pride of Biharis. Prime Minister Narendra Modi by belittling Lalu and Nitish had hurt the pride. The same thing had happened in Delhi. BJP had hurt the Delhites' pride by belittling the Arvind Kejriwal. And neither ruling party BJP and the pollsters could not even gauge the psyche of the people. No exit poll gave Nitish-Lalu alliance more than 130 sets except News X and Times Now. On the contrary, News24 channel had given BJP led alliance 155 seats. The science of measuring voters' behavior has yet not fully developed in India. Human physiology is one of the toughest science and it requires true representative samples and accurate primary data. Conclusions about caste and community vote patterns in elections are all based on erroneous data. At best, we can only make qualitative assessments. From the last day of polling to the day results are announced, analysis are based on data which are almost never close to being correct. This is understandable. The diversity of India extends to every village, so it is almost impossible to ensure that any sample size is completely representative. And even when through some measure of luck a pollster arrives at a reasonable estimate of vote share, converting this into actual seats is perilous. Thus, the only time exit polls get it right is when they reflect an obvious change in popular mood, or when they are right only because they are wrong. Indian media need to learn from its mistakes.
शनिवार, 7 नवंबर 2015
Can Govt's Gold Schemes Bring Out Hidden Treasures?
Posted on 9:35 am by mnfaindia.blogspot.com/
सोने की चमक-दमक
गोल्ड का आयात रोकने और घरों-मंदिरों में रखे सोने को उपयोगी बनाने के लिए मोदी सरकार ने वीरवार को तीन योजनाएं शुरु कीं जिनसे सोने को नगदी में बदला जा सकता है। घर में पडा-पडा सोना अनुपयोगी होता है। वैसे भी देश में त्योहारों और शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर गहने पहनने का रिवाज है। आगे-पीछे सोने के आभूषणों का कोई उपयोग नहीं होता है और गहनों को संभालने की चिंता अलग से रहती है। बैंक लॉकर्स में आभूषण रखने के लिए किराया देना पडता है। लोगों के पास घर में रखे सोने के गहनों से आमदन लेने का चूंकि कोई विकल्प ही नहीं था, लिहाजा मोदी सरकार ने लोगों को सोने से कमाई करने का अवसर दिया है। अनुमान है देश में करीब 52 लाख करोड रु मूल्य का 20 हजार टन से ज्यादा सोना घरों-मंदिरों में सहेज कर रखा गया है। सरकार इस सोने को बाहर निकालना चाहती है। इससे सोना का आयात भी कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा बोझ भी घट जाएगा। दुनिया में सोना आयात करने वाला भारत सबसे बडा देश है। 2013 में सोने का आयात बढने से देश के चालू खाते का घाटा 190 अरब डॉलर (12350 करोड रु) तक पहुंच गया था और सरकार को सोने के आयात पर 10 फीसदी शुल्क लगाना पडा था। अधिकृत आंकडे बताते हैं कि व्यापार घाटे में 30 फीसदी सोने के आयात का हाथ रहता है। वीरवार को ”गोल्ड मॉनेटाइजेशन, गोल्ड कॉइन और गोल्ड सोवरेन बॉड स्कीमें लांच करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोल्ड बॉड की खूबियां गिनाईं। गोल्ड बांड ऐसी स्कीम है जो आदमी के हर आपात स्थिति में काम आ सकती है। सोना आधी रात को नहीं बिकता मगर गोल्ड बांड बेचा जा सकता है। इलाज के लिए अगर आधी रात को पैसे की जरुरत है तो डाक्टर अथवा अस्पताल इसे हाथों -हाथ ले लेगा। चोर इसे कागज का टुकडा समझ कर नहीं ले जाएगा। गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम के तहत हर साल 2.5 फीसदी तक ब्याज मिल सकता है। कम-से-कम एक साल के लिए न्यूनतम 30 ग्राम सोना ही जमा कराया जा सकता है। गोल्ड सोवरेन बांड पर 2.75 फीसदी ब्याज मिलेगा. इसके लिए 20 नवंबर तक आवेदन किया जा सकता है। 26 नवंबर से आठ साल के लिए बांड जारी किए जाएंगें। शुरुआती कीमत 2,684 रु प्रति ग्राम रखी गई है। कम-से-कम दो ग्राम और साल में अधिकतम 500 ग्राम (आधा किलो) सोने पर निवेश किया जा सकता है। गोल्ड कॉइन स्कीम के तहत शुरु में 5 से 10 ग्राम के सिक्के और 20 ग्राम का गोल्ड बार जारी किए जाएंगें। शुद्धता की गारंटी होने पर यह स्कीम ज्यादा लोकप्रिय हो सकती है। इन तीनों योजनाएं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आम आदमी इन योजनाओं को कैसे लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्कींमों पर कोई बहुत ज्यादा रिटर्न नहीं है। इससे कहीं ज्यादा ब्याज बैंक फिक्सड डिपॉजिट पर दे रहे हैं। अगर सोने के आभूषणों को बेचने से कमाई ही करनी है, तो इन्हें बेचकर फिक्सड डिपॉजिट अथवा अन्य आकर्षक विक्लपों में निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा न्यूनतम 30 ग्राम की शर्त लगाकर सरकार ने निचले तबकों को बाहर कर दिया है। यही वह तबका है जिसे हर स्त्रोत से आय की सबसे ज्यादा जरुरत रहती है। सोने में काला धन लगाने वालों को आयकर विभाग का भय सता सकता है। सरकार की स्वेच्छा से काला धन घोषित करने वाली नीति को भी बहुत ज्यादा रिसपांस नहीं मिला था। इन स्कीमों से सरकार और बैंको को ही ज्यादा फायदा होगा। स्कीम के तहत गहनों को गलाने का खर्चा आवेदक को खुद उठाना पडेगा। जाहिर है , इस स्थिति में गहनों की मात्रा 20 से 30 फीसदी घट सकती है। इससे योजना का लाभ काफी कम हो जाएगा। अधिकतम ब्याज 2.75 फीसदी ही मिलेगा भले ही स्कीम की मैच्युरिटी के समय सोना कितना भी महंगा क्यों न हो। बहरहाल, सरकार का मकसद अगर अनुपयोगी सोने को बाहर निकलना है और आयात को कम करना है, तो लोगों को आकर्षक स्कींमें देनी होंगी जिनसे वास्तव में आम आदमी को ज्यादा से ज्यादा कमाई हो। ग्रामीण क्षेत्रों के घरों और घरों -मदिरों से सोना बाहर तभी निकल सकता है, जब सोने की चमक से ज्यादा ब्याज की दमक हो।
गोल्ड का आयात रोकने और घरों-मंदिरों में रखे सोने को उपयोगी बनाने के लिए मोदी सरकार ने वीरवार को तीन योजनाएं शुरु कीं जिनसे सोने को नगदी में बदला जा सकता है। घर में पडा-पडा सोना अनुपयोगी होता है। वैसे भी देश में त्योहारों और शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर गहने पहनने का रिवाज है। आगे-पीछे सोने के आभूषणों का कोई उपयोग नहीं होता है और गहनों को संभालने की चिंता अलग से रहती है। बैंक लॉकर्स में आभूषण रखने के लिए किराया देना पडता है। लोगों के पास घर में रखे सोने के गहनों से आमदन लेने का चूंकि कोई विकल्प ही नहीं था, लिहाजा मोदी सरकार ने लोगों को सोने से कमाई करने का अवसर दिया है। अनुमान है देश में करीब 52 लाख करोड रु मूल्य का 20 हजार टन से ज्यादा सोना घरों-मंदिरों में सहेज कर रखा गया है। सरकार इस सोने को बाहर निकालना चाहती है। इससे सोना का आयात भी कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा बोझ भी घट जाएगा। दुनिया में सोना आयात करने वाला भारत सबसे बडा देश है। 2013 में सोने का आयात बढने से देश के चालू खाते का घाटा 190 अरब डॉलर (12350 करोड रु) तक पहुंच गया था और सरकार को सोने के आयात पर 10 फीसदी शुल्क लगाना पडा था। अधिकृत आंकडे बताते हैं कि व्यापार घाटे में 30 फीसदी सोने के आयात का हाथ रहता है। वीरवार को ”गोल्ड मॉनेटाइजेशन, गोल्ड कॉइन और गोल्ड सोवरेन बॉड स्कीमें लांच करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोल्ड बॉड की खूबियां गिनाईं। गोल्ड बांड ऐसी स्कीम है जो आदमी के हर आपात स्थिति में काम आ सकती है। सोना आधी रात को नहीं बिकता मगर गोल्ड बांड बेचा जा सकता है। इलाज के लिए अगर आधी रात को पैसे की जरुरत है तो डाक्टर अथवा अस्पताल इसे हाथों -हाथ ले लेगा। चोर इसे कागज का टुकडा समझ कर नहीं ले जाएगा। गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम के तहत हर साल 2.5 फीसदी तक ब्याज मिल सकता है। कम-से-कम एक साल के लिए न्यूनतम 30 ग्राम सोना ही जमा कराया जा सकता है। गोल्ड सोवरेन बांड पर 2.75 फीसदी ब्याज मिलेगा. इसके लिए 20 नवंबर तक आवेदन किया जा सकता है। 26 नवंबर से आठ साल के लिए बांड जारी किए जाएंगें। शुरुआती कीमत 2,684 रु प्रति ग्राम रखी गई है। कम-से-कम दो ग्राम और साल में अधिकतम 500 ग्राम (आधा किलो) सोने पर निवेश किया जा सकता है। गोल्ड कॉइन स्कीम के तहत शुरु में 5 से 10 ग्राम के सिक्के और 20 ग्राम का गोल्ड बार जारी किए जाएंगें। शुद्धता की गारंटी होने पर यह स्कीम ज्यादा लोकप्रिय हो सकती है। इन तीनों योजनाएं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आम आदमी इन योजनाओं को कैसे लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्कींमों पर कोई बहुत ज्यादा रिटर्न नहीं है। इससे कहीं ज्यादा ब्याज बैंक फिक्सड डिपॉजिट पर दे रहे हैं। अगर सोने के आभूषणों को बेचने से कमाई ही करनी है, तो इन्हें बेचकर फिक्सड डिपॉजिट अथवा अन्य आकर्षक विक्लपों में निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा न्यूनतम 30 ग्राम की शर्त लगाकर सरकार ने निचले तबकों को बाहर कर दिया है। यही वह तबका है जिसे हर स्त्रोत से आय की सबसे ज्यादा जरुरत रहती है। सोने में काला धन लगाने वालों को आयकर विभाग का भय सता सकता है। सरकार की स्वेच्छा से काला धन घोषित करने वाली नीति को भी बहुत ज्यादा रिसपांस नहीं मिला था। इन स्कीमों से सरकार और बैंको को ही ज्यादा फायदा होगा। स्कीम के तहत गहनों को गलाने का खर्चा आवेदक को खुद उठाना पडेगा। जाहिर है , इस स्थिति में गहनों की मात्रा 20 से 30 फीसदी घट सकती है। इससे योजना का लाभ काफी कम हो जाएगा। अधिकतम ब्याज 2.75 फीसदी ही मिलेगा भले ही स्कीम की मैच्युरिटी के समय सोना कितना भी महंगा क्यों न हो। बहरहाल, सरकार का मकसद अगर अनुपयोगी सोने को बाहर निकलना है और आयात को कम करना है, तो लोगों को आकर्षक स्कींमें देनी होंगी जिनसे वास्तव में आम आदमी को ज्यादा से ज्यादा कमाई हो। ग्रामीण क्षेत्रों के घरों और घरों -मदिरों से सोना बाहर तभी निकल सकता है, जब सोने की चमक से ज्यादा ब्याज की दमक हो।
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