ठीक दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक नोटबंदी का ऐलान करके वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी सकते में डाल दिया था। नोटबंदी का मूल मकसद काले धन को बाहर निकालना था मगर प्रधानमंत्री का यह कदम अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसके विपरीत नोटबंदी से सौ से अधिक लोगों को अपना पैसा लेने के लिए भी प्राण गंवाने पडे। देश और जनमानस भले ही भूल जाए मगर नोटबंदी के दौरान मारे गए लोगों के परिजन इस त्रासदी को भूल नहीं सकते हैं। पूरी दुनिया मे पहली बार भारत में नोटबंदी जैसे आर्थिक कदम के कारण आम आदमी को अपने प्राण गंवाने पडे। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार रुक गई। और अब दो साल बाद मोदी सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के बीच भी ठन गई है। मोदी सरकार मौद्रिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार केन्द्रीय बैंक की स्वायतता को ध्वस्त करने पर आमादा है। सरकार अब आरबीआई से 3.61 लाख करोड रु मांग रही है। आरबीआई के पास जरुरत से कहीं ज्यादा पैसा है और सरकार चाहती है कि बैंक इस सरप्लस धन को उसके हवाले करे ताकि इसका सदुपयोग किया जा सके। आरबीआई को मुद्रा स्फीति की चिंता है, इसलिए इस सरप्लस नगदी को सरकार को लौटाने में आनाकानी कर रही है। अततः बैंक को झुकना पडेगा और यह सरप्लस पैसा सरकार के सुपुर्द करना ही पडेगा। बहरहाल, इस तनातनी से एक बात तो साफ हो गई है कि मोदी सरकार को पूरी उम्मीद थी नोटबंदी से ज्यादा नहीं तो तीन-चार लाख करोड का काला धन आरबीआई के मार्फत सरकार के खजाने में आ जाएगा। मगर ऐसा हो नहीं और अब सरकार अपनी विफलता का ठीकरा आरबीआई के सर फोड रही है। सरकार और आरबीआई की ताजा तनातनी से यह बात भी साफ है कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के समय आरबीआई को भी विश्वास में नहीं लिया था। वैसे प्रधानमंत्री की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि सरकार के टॉप फैसले को गोपनीय रखा गया। हवा तक को सुंघने वाले पत्रकारों को भी कानोंकान भनक नहीं लगी। अमूमन, सरकार के अधिकतर फैसले लीक हो जाया करते हैं । नोटबंदी से अर्थव्यवस्था और देश को कोई फायदा हुआ हो, इसके भी कोई संकेत नहीं है। नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री ने अवाम को इस कदम से लाभान्वति कराने के लिए देश चासियों से 50 दिन का समय मांगा था। अब दो साल गुजर गए हैं। देश प्रधानमंत्री से यह उम्मीद रखता है कि वे जनता को नोटबंदी से लोगों को क्या मिला, इसका हिसाब दे।
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