शनिवार, 10 नवंबर 2018

लानत है ऐसी राजनीति पर ?

लानत है ऐसी सियासत पर कि तथाकथित धर्म  निरपेक्ष राजनीतिक दल को गौमाता के नाम पर वोट मांगने पडे।  राम मंदिर और गोमाता की राजनीति पर भाजपा को  “सांप्रदायिक“  बताने वाली  कांग्रेस को भी अब मतदाताओं को लुभाने के लिए  गोमाता का सहारा लेना पडा है। षनिवार को मध्य प्रदेश  विधानसभा चुनाव के लिए जारी चुनावी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने सत्ता में आने पर प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम-से-कम एक गौशाला  बनाने का “वचन“ दिया है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र को “वचन पत्र“ का  नाम दिया है। जाहिर है चुनावी घोषणाओं पर मतदाताओं को अब भरोसा नहीं रहा है । इसलिए “चुनावी वचन“ का झांसा देकर मतदाताओं को  पटाने की कोशिश  की गई है। भाजपा भी इस मामले में पीछे नहीं है। तेलंगाना में भगवा पार्टी ने हर साल लोगों को एक लाख गौमाता बांटने  का  वायदा किया है। अब तक भाजपा समेत राजनीतिक दल मोबाइल, लेपटॉप, साइकल बांटा करती थीं। पहली बार भाजपा ने गौमाता देने का वायदा किया है। हार्ड हिन्दुत्व के दमखम पर चुनावी में प्रचंड बहुमत हासिल कर भाजपा ने  कांग्रेस की “धर्म  निरपेक्ष“ राजनीति को करारा झटका दिया है। मजबूरन, कांग्रेस को भी “सॉफ्ट हिंदुत्त्व“ का सहारा लेना पडा है। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष  नर्मदा नदी की आरती उतार कर “नर्मदा भक्त“ होने का आडंबर भी  किया था। बहरहाल,  गौमाता का मुद्दा ्कांग्रेस की चुनावी वैतरणी पार करने में सहायक होती है या नहीं, इसका पता चुनाव परिणाम आने पर ही चलेगा मगर इतना तय है कि राजनीतिक दलों के पास चुनावी “झांसे“ का स्टॉक खत्म होता  जा  रहा है। यह राजनीतिक “दिवालियापन दर्शाता  है। पिछले सात दशक में सियासी दलों ने देश  को हाल-बेहाल तो किया ही है, राजतीतिक सुचिता को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर डाला है। आजादी के बाद से पिछले सात दशक के सफर का लेखा-जोखा किया जाए तो किसान-जवान, कामगार-कर्मचारी, खिलाडी, उधोगपति और व्यवसायी, समाज के हर वर्ग ने देश  को बुलंदियों पर पहुंचाया है मगर नेताओं ने क्या किया? मतदाताओं को  चुनाव मे इसका हिसाब मांगना चाहिए।