शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

असहिष्णुता का एक और मंजर

महाराष्ट्र  पुलिस द्वारा बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं  की गिरफ्तारी ने देश में सहिष्णुता बनाम  असहिष्णुता बहस को फिर जीवंत कर दिया है। मंगलवार को महाराष्ट्र  पुलिस ने वामपंथी विचारधारा से जुडे पांच लोगों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कथित  हत्या की साजिश   के लिए गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए पांचों बुद्धिजीवी मानवाधिकार और अन्य मुद्दों पर   मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं। मंगलवार को पुणे की पुलिस ने चार राज्यों में छापे डालकर क्रांतिकारी लेखक पी वलवर राव को हैदराबाद , वकील एवं मनावाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा को थाणे , लेखक और मानवाधिकार एक्टीविस्ट वरनॉन गोंजाल्विस को मुंबई , वकील और  एक्टीविस्ट सुधा भारद्धाज को फरीदाबाद एवं पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को दिल्ली से गिरफ्तार किया ।  इन पांचों पर भारतीय दंड संहिता 153ए के तहत विद्धेष  फैलाने, सामाजिक दुर्भावना बढाने और नक्सलियों की वित्तीय मदद करने के आरोप लगाए गए हैं। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ताओं को बडी राहत देते हुए इन्हें घर में नजरबंद रखने के आदेश  दिए। इन गिरफ्तारियों पर  सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी काबिलेगौर है।  गिरफ्तारी पर सरकार और पुलिस को फटकार लगते हुए  शीर्ष  अदालत ने कहा कि“ असहमति जताना लोकतंत्र के लिए  सेफटी  वाल्व की तरह है और अगर आप इस  सेफटी  वाल्व  को नहीं रहने देंगे तो प्रैशर कुकर फट जाएगा“। इन लोगों की गिरफ्तारी के खिलाफ नामी इतिहासकार रोमिला थापर और कुछ अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। पुलिस इन  बुद्धिजीवियों का संबंध भीमा कोरेगांव हिंसा से जोड रही है। दिसंबर, 2017 में महाराष्ट्र  में पुणे के निकट भीमा कोरेगांव में दलितों और मराठाओं के बीच हिंसक झडपें हुई थी। इसी मामले में पुलिस कबीर कला मंच और एल्गार परिषद पर भी छापे मार चुकी है। इस साल जून में पुलिस ने भीमा कोरेगांव में आयोजित एल्गार परिषद रैली में “माओवादी फितरत“ फैलाने के अरोप मे  नागपुर से पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया  था। 31 दिसंबर, 2017 को  भीमा कोरेगांव में एल्गार परिषद आयोजित करने  के लिए लगभग 220 संगठन एक मंच पर इक्ठठे हुए थे। पुलिस का दावा है कि जून में गिरफ्तार लोगो से पूछताछ के बाद मंगलवार को पांचों सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। पूरे घटनाक्रम पर गौर करने से पता चलता है कि पुलिस ने भीमा कोरेगांव हिंसा की कडी में ही  मंगलवार को पांच अग्रणी सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की मगर इससे न तो सुप्रीम कोर्ट  संतुष्ट  हैं और न  ही राष्ट्रीय  मानवाधिकार आयोग। आयोग ने ताजा गिरफ्तारियों का संज्ञान लेकर केन्द्र और महाराष्ट्र   को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। महाराष्ट्रसरकार ने बगैर ठोस सबूत के गिरफ्तारियों के लिए  जिस तरह जल्दबाजी  दिखाई है, उससे उसकी नीयत पर संदेह होना स्वभाविक है। 77  वर्षीय   क्रांतिकारी लेखक पी वलवर राव 2001 और 2004 में आंध्र प्रदेश  की सरकार से वार्ता के लिए माओवादियों (सीपीआई-एमएल) के मध्यस्थ भी थे।  वलवर राव  जैसे नामचीन लेखक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कथित हत्या की साजिश  में  शामिल हों, इस पर  विश्वास  नहीं किया जा सकता। लेखक कभी हथियार नहीं उठाता। लेखनी ही उसका सबसे बडा हथियार होती है। गिरफ्तार किए गए पांचों सामाजिक कार्यकर्ता  और लेखक-पत्रकार गरीबों और  शोषित  तबकों के हक और मानवाधिकार अधिकारों के लिए लडते  हैं ।  गरीबों के हक के लेखन और  संघर्ष को “नक्सलवाद“ कहना और मानना का असहिष्णुता द्योतक है। बगैर ठोस साक्ष्य की गिरफ्तारी एक तरह से स्टेट टेररिज्म जैसा है।  असहिष्णुता हर हाल में लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। असहमति, आलोचना और अधिकारों की आजादी लोकतंत्र के अभिन्न अंग है। इन्हें पोषित  करने की जरुरत है,  नष्ट  करने की नहीं।