हुल्ल्ड मुरादाबादी की काव्य रचना की एक पंक्ति हैं “ रहने को घर नहीॅ, सारा जहां हमारा“। ये शब्द असम के 40 लाख लोगों की व्यथा को खूब बयां करते हैं। बरसों से असम में बसे लाखों लोगों को नागरिकता से महरुम करना वास्तव मे बेहद दुखद है। सोमवार (30 जुलाई, 2018) को असम में राष्ट्रीय नागरिक्ता रजिस्टर (एनआरसी) का प्रारुप जारी होते ही 40 लाख लोग बेसहारा और बेघर हो गए हैं। असम की कुल 3.29 करोड आबादी मेंसे 2.89 करोड को ही एनआरसी में शामिल किया गया है। यानी 12 फीसदी आबादी को राज्य का नागरिक नहीं माना गया है। असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों का मामला बहुत बडा मुद्दा रहा है। असम में घुसपैठियों को लेकर पूर्वोतर भारत के इस राज्य को अस्सी के दशक में (1979 से 1985) हिंसा के सबसे बुरे दौर से गुजरना पडा था और तब 3,000 से भी अधिक लोगों को अपने प्राणों की आहुति देनी पडी थी। इसी हिंसा के कारण 1983 में विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार भी हुआ था। अततः, केन्द्र सरकार को झुकना पडा और 15 अगस्त, 1985 को केन्द्र और आंदोलनकारियों के बीच घुसपैठियों की नागरिकता को लेकर समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार 1951 से 1961 के दौरान असम आए घुसपैठियों को वोट का अधिकार के साथ-साथ पूर्ण नागरिक्ता दी जानी थी और 1971 के बाद राज्य में आने वाले घुसपैठियों को डिपोर्ट किया जाना था। 1961 से 1971 के दौरान आए घुसपैठियों को “वोट का अधिकार“ नहीं दिया जाएगा मगर उन्हें पूर्ण नागरिकता दी जानी थी। इसी आंदोलन के कारण राज्य में 1985 के विधानसभा चुनाव में छात्रों के संगठन ऑल असम गण परिषद (एएजीएसपी) भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। दुर्भाग्यवश , यह समझौता लागू नहीं हो पाया। राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनने पर इस समझौते को संजीदगी से लागू करने की दिशा में काम आरंभ हुआ और सोमवार को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जारी किया गया। भाजपा भी लंबे समय से असम में घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें डिपोर्ट करने की मांग करती रही है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस सरकार ने अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए घुसपैठियों को राज्य में आने दिया और उन्हें राज्य में बसा कर वोटिंग राइट तक दिए गए। जमीनी सच्चाई भी यही है कि पूरा मामला वोट की राजनीति से जुडा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में कांग्रेस पर यह कहते हुए तंज भी कसा कि कांग्रेस में अपना समझौता लागू करने का भी साहस नहीं था। ”हमने साहस है, इसलिए कांग्रेस सरकार के समय हुए समझौते को लागू किया गया“। देश में असम एकमात्र ऐसा राज्य है जहां नागरिकता की प्रकिया चल रही है। असम की एक तिहाई आबादी मुस्लिम समुदाय की है और जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा मुसलमान भी असम में ही रहते हैं। 1985 के समझौते में इस बात पर भी सहमति हुई थी कि 24 मार्च, 1971 के बाद असम में जो भी व्यक्ति अथवा परिवार बगैर दस्तावेजों के प्रवेश करेगा, उसे विदेशी माना जाएगा। राष्ट्रीय नागरिक्ता रजिस्टर जारी होने पर अब पता चला है कि असम में 40 लाख लोग विदेशी हैं। इतनी बडी संख्या में विदेशियों का असम आना और फिर यहां बसना यही दर्शाता है कि 1985 के समझौते के बावजूद असम में घुसपैठियों का आना रुका नहीं है। 1985 के बाद से विशेष अदालतें अब तक 85,000 से ज्यादा लोगों को विदेशी करार दे चुकी है। बहरहाल, दशकों से असम में रह रहे 40 लाख लोगों की नागरिकता छीना जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बडा मुद्दा बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी दुनिया में शरणार्थियों की समस्या को खत्म करने के पक्ष में है मगर भारत के एक फैसले से 40 लाख और एक करोड स्टेटलैस लोगों में शरीक हो गए हैं। इन लोगों का हश्र म्यांमार के रोहिंग्या जैसा हो सकता है और इससे अराजकता भी बढ सकती है।
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