मंगलवार, 28 अगस्त 2018

तीन तलाक को विपक्ष का “तलाक“

तीन तलाक को लेकर मोदी सरकार जितनी संजीदा रही है, विपक्षी दल इस मुद्दे पर उससे भी ज्यादा अडियल हैं। लोकसभा द्वारा  15 दिसंबर, 2017 को तीन तलाक बिल पारित किए जाने के बावजूद अभी भी यह राज्यसभा में अटका हुआ है। अढाई सौ दिन गुजर जाने के बाद भी हाल ही में सपन्न मानसून सत्र में भी यह बिल राज्यसभा से पारित नहीं हो पाया। इससे मुस्लिम महिलाओं को लग रहा है कि विपक्ष दल बिल को “तलाक“ देने की फिराक में है।  सरकार अब इस बिल को बजट सत्र में पारित करवाने की भरपूर कोशिश  करेगी। तीन तलाक पर कानून बनने के बाद  दोषी  को तीन साल तक की सजा हो सकती है। विपक्ष, खासकर ऑल इंडिया मज्लिस-ए- इतहेदुल मुसलिमीन के अध्यक्ष और सांसद असदुद्यीन ओवैसी को तो पूरा विश्वास  है कि तीन तलाक की आड में भाजपा मुस्लिम समाज को बांटने की कोशिश   कर रही हैं और मुस्लिम महिलाओं की सहानुभूति हासिल कर इसे वोट के लिए भुनाना चाहती है। विपक्ष की मांग पर सरकार ने बिल में दोषी  पति को मस्जिस्ट्रेट से जमानत का प्रावधान जोड दिया है। पहले जमानत का कोई प्रावधान नहीं था। ्कटटरपंथी मुसलमानों को यह बात  गवारा नहीं है कि भगवा पार्टी (दक्षिणपंथी) के  शासन में  मुस्लिम समाज से जुडे संवेदनशील मामले को मुस्लिम पर्सनल लॉ से अलग कर दिया जाए। मुस्लिम समाज  इस पहल को समान आचार संहिता (यूनिफार्म  सिविल कोड) की दिशा  में  मोदी सरकार की साजिश  के रुप में भी देख रहे हैं। कटटरपंथियों को आशंका है कि तीन तलाक की आड में मोदी सरकार मुसलमानों को जेलों में बंद करने की साजिश  कर सकती  है। भाजपा को मुस्लिम विरोधी माना जाता है। तथापि, भारत में  शिक्षित मुस्लिम महिलाएं अरसे से तीन तलाक (तलाक-ए- बिद्दत) जैसी सामंती और महिला-विरोधी प्रथा को समाप्त करने के लिए लडती रही हैं। मुस्लिम समाज में कानूनन पत्नी को  तीन बार तलाक-तलाक कहकर छोड दिया जाता है। बस फोन, मोबाइल, इमेल, पत्र अथवा मैसेज भेजकर तलाक ले लिया जाता है।  मानो विवाह सामाजिक अटूट बंधन न होकर बच्चों का खेल हो। तीन तलाक के नाम पर महिलाओं से कितने जुल्म-ए-सितम ढाए जाते हैं, इसकी कल्पना तक नहीं की जाती। तीन तलाक के तहत  हालांकि तलाकशुद्धा पत्नी को गुजारा भत्ते मांगने का अधिकार है मगर विभिन अध्ययनों का  निष्कर्ष   है कि 79 फीसदी तलाकषुद्धा महिलाओं को गुजारे भत्ते से वंचित कर दिया जाता है। 22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट  ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और  21 का उल्लघंन बताया था।  संविधान के  अनुच्छेद 14 के तहत देश  के हर नागरिक को कानून के तहत बराबर का संरक्षण (एक्वेलिटी बिफोर लॉ) है और  अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक (पुरुष  हो या महिला) को राइट ऑफ फ्रीडम ( प्रोटेक्शन  ऑफ लाइफ एंड पर्सनल लिब्रटी) का हक है। कोई भी कानून अथवा पति इस हक को छीन नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में तीन जज तीन तलाक को खत्म करने के पक्ष में थे मगर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस जेएस केहर ओर जस्टिस अब्दुल्ल नजीर तीन तलाक के पक्ष में थे। तीन तलाक के पैरवी कार इस बात का फायदा उठा रहे हैं। इस रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “मन की बात“ मे तीन तलाक कानून बनाने में हो रहे विलंब का उल्लेख किया और मुस्लिम महिलाओं को भरोसा दिलाया कि सरकार इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। पाकिस्तान समेत दुनिया के  22  इस्लामिक  देशों  में तीन तलाक पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इस बात में दो राय नहीं है कि पिछली सरकारें अब तक तीन तलाक पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहीं थी। मोदी सरकार इस बात के लिए काबिलेतारीफ है कि उसने मुस्लिम महिलाओं के लिए कुछ तो किया।