और ये लाट साहब
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक बुजुर्ग को लाट साहब (डीसी) से उलझने के लिए चार दिन जेल में काटने पडे। 61 साल के बुजुर्ग को डीसी के आदेश पर पुलिस ने धारा 151 के तहत गिरफ्तार करके चार दिन तक जेल में बंद रखा और इस दौरान उनकी जमानत नहीं होने दी। इस बुजुर्ग का कसूर इतना था कि उसने लाट साहब से ऊंची आवाज मे बात करने की हिमाकत की । डीसी को यह बात गवारा नहीं लगी और उन्होंने बुजुर्ग को गिरफ्तार करवा लिया। मामला मीडिया में उछलने पर अब डीसी महोदय सफाई दे रहे हैं कि बुजुर्ग शराब पीकर आया था और खामख्वाह से उनसे उलझ पडा। शराबी को भी क सारा दिन तक बंद नहीं रखा जाता। आजादी के सात दशक बाद भी देष के नौकरषाह फिरंगी मानसिकता के गुलाम है जबकि देश अब पुलिस स्टेट नहीं रहा है। भारत अब वेल्फेयर स्टेट है जनता की कमाई से तनख्बवाह लेने वाले नोकरशाह जनसेवक है। दुखद स्थिति यह है की मानसिकता अभी भी पुलिस सताते वाली ही है। अपने पद और रुतबे का रौब झाडना और उसका सार्वजनिक नंगा नाच करवाना करवाना नेताओं और नोकरशाहों की फितरत बन चुकी है। नौकरशाह की बात तो दीगर रही, जनप्रतिनिधियों से मिलना अथवा संपर्क साधना भी आसान नहीं है। एक बार चुन लिए गए तो जैसे पंख लग गए और तब तक उडते रहेंगे जब तक जनता इनके पंख न क़तर लें। मुझे अपना एक वाक्या याद है । कुछ साल पहले किसी काम के सिलसिले में मुझे एसडीएम शिमला ग्रामीण से मिलना था। साहब की महिला पीए से मिलने के लिए समय मांगा। पीए ने काफी देर तक मुझे यह कहकर बिठाए रखा कि ”साहब बीजी हैं "। धैर्य टूटने पर मैंने दरवाजा खोला और साहब से मिलने उनके कमरे में चला गया। मुझे यह देखकर बेहद आश्चर्य हुआ कि एसडीएम कुछ राजनीतिक मित्रों के साथ चाय पर गपषप कर रहे थे। नौकरशाह आम आदमी की कहां परवाह करते हैं़? बस सतारूढ दल से चिपके रहते हैं और उनके लाडले बनकर जनसेवक की बजाए :हिज मास्टर वाइस“ बनकर रह जाते हैं। मंत्रियों, विधायकों अथवा अपने सीनियर अफसरों की सुनते हैं। मध्य प्रदेश हो या हिमाचल प्रदेश नौकरषाहों के हर जगह एक ही जैसे नाज-नखरे, रंग-ढंग हैं। आजादी से पहले का वह स्टील फ्रेमवर्क तो रहा नहीं। पूरी व्यवस्था का राजनीतिकरण हो चुका है। हर बात पर राजनीति हॉवी है। और जिस व्यवस्था में हर मामले को राजनीति के चश्मे से देखा-परखा जाए, उसमें गैर-राजनितिक आम आदमी के लिए कोई स्पेस नहीं रह जाता है।
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक बुजुर्ग को लाट साहब (डीसी) से उलझने के लिए चार दिन जेल में काटने पडे। 61 साल के बुजुर्ग को डीसी के आदेश पर पुलिस ने धारा 151 के तहत गिरफ्तार करके चार दिन तक जेल में बंद रखा और इस दौरान उनकी जमानत नहीं होने दी। इस बुजुर्ग का कसूर इतना था कि उसने लाट साहब से ऊंची आवाज मे बात करने की हिमाकत की । डीसी को यह बात गवारा नहीं लगी और उन्होंने बुजुर्ग को गिरफ्तार करवा लिया। मामला मीडिया में उछलने पर अब डीसी महोदय सफाई दे रहे हैं कि बुजुर्ग शराब पीकर आया था और खामख्वाह से उनसे उलझ पडा। शराबी को भी क सारा दिन तक बंद नहीं रखा जाता। आजादी के सात दशक बाद भी देष के नौकरषाह फिरंगी मानसिकता के गुलाम है जबकि देश अब पुलिस स्टेट नहीं रहा है। भारत अब वेल्फेयर स्टेट है जनता की कमाई से तनख्बवाह लेने वाले नोकरशाह जनसेवक है। दुखद स्थिति यह है की मानसिकता अभी भी पुलिस सताते वाली ही है। अपने पद और रुतबे का रौब झाडना और उसका सार्वजनिक नंगा नाच करवाना करवाना नेताओं और नोकरशाहों की फितरत बन चुकी है। नौकरशाह की बात तो दीगर रही, जनप्रतिनिधियों से मिलना अथवा संपर्क साधना भी आसान नहीं है। एक बार चुन लिए गए तो जैसे पंख लग गए और तब तक उडते रहेंगे जब तक जनता इनके पंख न क़तर लें। मुझे अपना एक वाक्या याद है । कुछ साल पहले किसी काम के सिलसिले में मुझे एसडीएम शिमला ग्रामीण से मिलना था। साहब की महिला पीए से मिलने के लिए समय मांगा। पीए ने काफी देर तक मुझे यह कहकर बिठाए रखा कि ”साहब बीजी हैं "। धैर्य टूटने पर मैंने दरवाजा खोला और साहब से मिलने उनके कमरे में चला गया। मुझे यह देखकर बेहद आश्चर्य हुआ कि एसडीएम कुछ राजनीतिक मित्रों के साथ चाय पर गपषप कर रहे थे। नौकरशाह आम आदमी की कहां परवाह करते हैं़? बस सतारूढ दल से चिपके रहते हैं और उनके लाडले बनकर जनसेवक की बजाए :हिज मास्टर वाइस“ बनकर रह जाते हैं। मंत्रियों, विधायकों अथवा अपने सीनियर अफसरों की सुनते हैं। मध्य प्रदेश हो या हिमाचल प्रदेश नौकरषाहों के हर जगह एक ही जैसे नाज-नखरे, रंग-ढंग हैं। आजादी से पहले का वह स्टील फ्रेमवर्क तो रहा नहीं। पूरी व्यवस्था का राजनीतिकरण हो चुका है। हर बात पर राजनीति हॉवी है। और जिस व्यवस्था में हर मामले को राजनीति के चश्मे से देखा-परखा जाए, उसमें गैर-राजनितिक आम आदमी के लिए कोई स्पेस नहीं रह जाता है।






