ऐतिहासिक गलतियों से अगर सबक नही लिया जाए, तो उनकी पुनरावृति होना निश्चित है। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में फैले सिख विरोधी दंगों का “अभिशाप“ कांग्रेस को आज भी साल रहा है। और कांग्रेस बार-बार यही रट लगाए हुए हैं कि दंगों के लिए पार्टी दोषी नहीं है। कहते हैं समय गहरे से गहरे जख्मों को भी भर देता है मगर कुछ जख्म ऐसे होते हैं जो ताउम्र नहीं भरे जा सकते। 1984 के सिख विरोध दंगे ऐसी दर्दनाक त्रासदी है, जिसे भुलाए भी नहीं भुलाया जा सकता। कांग्रेस के बार-बार इन दंगों पर सफाई देने से दंगे पीडित परिजनों के जख्म और भी हरे हो जाते हैं। लंदन में “इंडियन जर्नलिस्टस एसोसिएशन के कार्यक्रम में कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि 1984 के दंगों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार नहीं है, पीडित परिजनों के जख्मों पर नमक छिडकने जैसा है। जिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने परिजनों का संहार होते देखा है और हत्यारों को पहचाना है, वे कांग्रेस अध्यक्ष की इस बात पर कैसे विश्वास कर सकते हैं? 1984 के दंगों में तीन हजार से ज्यादा निर्दोष सिख मारे गए थे। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में 1984 के दंगे को दुनिया की जघन्यतम “मॉब लिंचिंग“ बताया है। फिरंगी शासन के जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद 1984 में सिखों का नरसंहार भारतीय इतिहास का सबसे दुखांत अध्याय है। हत्यारों के किसी समुदाय विशेष से संबंधित होने पर इस समुदाय के निर्दोष लोगों का संहार किया जाना कोई इंसानियत नही है। कांग्रेस अध्यक्ष ने हालांकि 1984 के दंगों को “बेहद दर्दनाक त्रासदी बताया है मगर उनके कहने भर से कांग्रेस आरोप मुक्त नहीं हो जाती। सीबीआई ने भी अपने जांच में इस बात की ताकीद की थी कि कांग्रेस के एक बडे नेता सज्जन कुमार ने हिंसक भीड को दंगों के लिए भडकाया था। सीबीआई ने दिल्ली की एक अदालत को 2012 में बताया था कि 1984 के दंगों में तत्कालीन कांग्रेस सरकार और पुलिस का हाथ था। अमेरिका ने भी माना था कि दंगों में कांग्रेस सरकार का हाथ था। 2011 में विकी केबल लीकस ने इस बात का खुलासा किया था। अमेरिका ने हालांकि 1984 के दंगों को नरसंहार नहीं माना मगर मानवाधिकारों के घोर उल्लघंन के लिए तत्कालीन सरकार को फटकार लगाई थी । 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने दंगों के आरोपी तत्कालीन सांसद सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को पार्टी का टिकट न देकर अप्रत्यक्ष तौर पर इन नेताओं की दंगों में संलिप्तता स्वीकार कर ली थी। पश्चिम के लोगों की सबसे बडी खासियत है कि वे अपनी गलतियों को छिपाने की बजाए, उन्हें फौरन स्वीकार कर पश्चाताप कर लेते हैं। भारत में अपनी गलतियों को छिपाने का चलन है। राहुल गांधी युवा हैं और उनकी पढाई-लिखाई भी पश्चिम में हुई है। उन्हें पश्चिम से सीख लेनी चाहिए और सच्चाई को मान लेने चाहिए। और सच्चाई यही है कि 1984 के दंगों में न तो पाकिस्तान का हाथ है और न ही विपक्षी दलों की इनमें रत्ती भर संलिप्तता थी। इन दंगों मे कुछ अराजक तत्वों का हाथ हो सकता है, जो लूट-पाट के लिए इस तरह से हिंसा फैलाते हैं मगर लुटेरे, नरसंहार नहीं करते। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि दंगें किसने करवाए थे। “दर्दनाक त्रासदी“ को बार-बार झूठ बोलने से लोगों के कटु स्मरणों से मिटाया नहीं जा सकता। आदमी झूठ बोल सकता है, इतिहास झूठ नहीं बोलता। राहुल गांधी अगर यह कहते कि 1984 के दंगों के दोशियों को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी पार्टी से क्यों न हो, तो दंगा पीडित परिवारों के जख्मों पर मलहम-पट्टी हो सकती थी। अपनी गलती मान लेना ही महानता है।
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