मित्रों, क्या कभी आपने काली त्वचा को गोरा करने वाली क्रीम, दांतों को कीडों से बचाने के दंत मंजन, मधुमेह (डायबिटज) को जड से खत्म करने, कद ऊंचा करने, मोटापा घटाने, सेक्स पॉवर बढाने, गंजापन दूर करने, यहां तक कि कैंसर जैसे लाइजाल रोग का उपचार करने वाली दवा की टीवी, समाचार पत्र-पत्रकियों और इंटरनेट पर प्रसारित-प्रकाशित हो रहे विज्ञापनों की सत्यता जानने की कोशिश की है? 60 फीसदी से भी ज्यादा विज्ञापन उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले होते हैं। सौ फीसदी कीटाणु (जर्म) मुक्त वाटर प्युरिफायर और फल, सब्जियों को तरोताजा रखने वाले फ्रिज-रेफरिजेटर्स के विज्ञापन भी भ्रामक हैं। हैल्थ, पौष्टिक आहार, दवाओं और खाद्यान्न के उत्पादों के भ्रामक उत्पादों का जानलेवा असर हो सकता है। उभोक्ताओं को ललचाने वाले ये विज्ञापनों वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं। और क्या आप यह बात भी जानते हैं कि उत्पाद लागत में 70 फीसदी विज्ञापन और सेल्स पर खर्च होता है। और अगर इस लागत को बचाया जा सके, तो हर बडा उत्पाद ज्यादा नहीं तो 60 फीसदी सस्ता हो सकता है। दुखद स्थिति यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी अभी तक इन भ्रामक विज्ञापनों से कानूनन निपटने की कोई व्यवस्था नहीं है। देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति से लेकर छोटे से छोटे तबके का आदमी उपभोक्ता है और कभी-न-कभी ठगा जरुर गया है। फिर भी इस ठगी से लोगों को बचाने के लिए अभी तक सख्त कानून नहीं है। एडवरटाइजिंग स्टैंडर्डस काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) नाम की एक सेल्फ रेगुलेटर संस्था है, जो विज्ञापन इंडस्ट्री पर नजर रखती है। इस संस्था के मानकों के अनुसार विज्ञापनदाता को विज्ञापन जारी करने से पहले उसकी सत्यता को पूरी तरह से जांच -परख लेना चाहिए। विज्ञापनदाता ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें कानून का कोई भय नहीं है। 2017 में एएससीआई ने इलेक्ट्रानिक मीडिया पर प्रसारित होने वाले 500 से ज्यादा विज्ञापनों को भ्रामक बताया था। योग गुरु बाबा रामदेव की पीताजंलि के 33 मेंसे 25 विज्ञापन एएससीआई के मानकों का उल्लघन कर रहे थे। मगर क्या हुआ़? किसी को न तो सजा हुई और न ही भ्रामक विज्ञापन बंद हुए। विज्ञापनों को लेकर अब तक 9 कानून बन चुके हैं मगर इन सब के बावजूद भ्रामक विज्ञापनों का प्रसारित होना रुका नहीं है। मीडिया की कमाई ही विज्ञापनों से होती है, इसलिए समाज का चौथा प्रहरी भी इन्हें प्रसारित=प्रकाशित करने से गुरेज नहीं करता है। मगर भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ अब जागरुकता बढ रही है। 2017 में केन्द्रीय उपभोक्ता मंत्रालय की वेबसाइट पर भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ 3302 कम्प्लेंट्स दर्ज की गईं थी। 2016 में 2032 कम्प्लेंट्स आई थीं। मंत्रालय ने एएससीआई से करार करके चार साल पहले भ्रामक विज्ञापनों की कम्प्लेंट्स की जानकारी सार्वजनिक करने के लिए इस पोर्टल को आरंभ किया था। बहरहाल, सख्त कानून के अभाव में सरकार भी इस मामले में कुछ नहीं कर पा रही है। मोदी सरकार ने हाल ही में भ्रामक विज्ञापन को रोकने और दोषियों को कडी सजा देने के लिए उपभोकता संरक्षण बिल, 2017 में संशोधन किया है। इसके तहत केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) स्थापित करने के अलावा भ्रामक विज्ञापन दाताओं और उनके सेलेब्रटी ब्रांड एम्बैसडर को जुर्माने के साथ-साथ कडी सजा का भी प्रावधान। इस कानून के बनने से भ्रामक विज्ञापनों पर अंकुश लग सकता है। चलिए, उपभोक्ताओं के हित में कुछ तो हुआ।
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