बुधवार, 15 अगस्त 2018

बस आजादी, आजादी,,,,आजादी

नई उमंगों, उम्मीदों और भरपूर उल्लास के साथ आज  भारत अपना 72वां स्वाधीनता दिवस  मना रहा है। लालकिले की प्राचीर से जब प्रधानमंत्री तिरंगा लहराते हैं, हर भारतीय  का सर गर्व से ऊंचा हो जाता है। आजादी से पांच साल पहले रचित कवि प्रदीप का यह गीत “ दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है“, आज भी उतना ही मधुर, उत्साहवर्धक और प्रासंगिक है, जितना तब था। इस गीत ने फिरंगियों की नींद हराम कर दी थी। आज भी यह गीत  हमें  प्रेरित  करता है। भारत   को उपनिवेशवादी गुलामी की बेडियों से आजाद कराने के लिए लोगों में जो जज्बा था, आजादी मिलते ही वह शनै-शनै काफूर होता चला गया और 71 वर्ष  बाद अब किसी कोने में दुबका पडा है। किसी भी देश  अथवा समाज के लिए निमित्तमात्र राजनीतिक आजादी ही काफी नही है, आर्थिक और मानसिक आजादी इससे कहीं ज्यादा मायने रखती है।  आजादी मिलने से बहुत पहले  नोबेल प्राइज विजेता महानतम कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आजाद भारत को लेकर “जहां मन भय से मुक्त हो (व्हेयर माइंड इज विथआउट फीयर)“ नाम की अद्धितीय रचना लिखी थी। इस रचना की अतिम पंक्ति थी “ उस स्वत्रंत्रता के स्वर्ग  में, हे परमपिता! मेरे देश  को जागृत कर दें“। यह काव्य रचना आज भी हर इंसान के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।  ब्रहांड में हर जीव आजादी चाहता है। अपनी पसंदीदा जगह में रहने की आजादी, खाने-पीने, विचरने, चलने-फिरने, वंश  बढाने की आजादी। हर तरह की आजादी। मानव  अन्य जीवों से और ज्यादा आजादी चाहता है। उसे सबसे ज्यादा “अभिव्यक्ति की आजादी की दरकार होती है। मानसिक गुलामी मानव विरोधी गतिविधि है। यह षारीरिक गुलामी सें भी ज्यादा खतरनाक है। मानसिक रुप से गुलाम लोग लोकतंत्र के लिए सबसे बडा खतरा। भारत में  चुनाव जात-पात, धर्म, नस्ल और समुदाय के मुद्दों पर लडे जाते हैं। गुलाम मानसिकता लोकतंत्र  कमजोर करती  है  ।  चुनाव में धन और बल का खुलकर प्रयोग किया जाता है। देश  को बांटने और विखंडित करने वालों मुद्दों से तथा झूठे दस्तावेज सौंपकर चुनाव लडे और जीते जाते हैं। चुनाव खर्च  को लेकर कोई भी उम्मीदवार सच नहीं बोलता। जितना बताया जाता है, उससे कहीं ज्यादा खर्च किया जाता है। जिस व्यवस्था में झूठ-फरेब ही चुनाव की बुनियाद हो, वहा कैसा लोकतंत्र?  इन हालात में लोकतंत्र तो उसी क्षण हार जाता है, जब चुनाव लडने के लिए झूठ-फरेब, जात-पात, रंग-भेद जैसे मुद्दों को आधार बनाया जाता है। तथापि, इन सात दशकों में भारत ने उल्लेखनीय तरक्की की है। इस दौरान हमने ब्रिटिश  अर्थव्यवस्था को भी पछाड दिया है। भारत जल्द ही दुनिया की पांचवीं बडी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। ग्रोथ में भारत ने चीन को पीछे छोड दिया है। अंतरिक्ष टकनॉलॉजी में भारत की कोई सानी नहीं है। सस्ती मगर प्रोन्नत  टकनॉलॉजी विकसित कर दुनिया को चकित कर दिया है। हमारे पास मानव संसाधन का विशाल भंडार है। भारतीय प्रतिभा ने दुनिया भर में अपना सिक्का जमा रखा है। दुनिया में सबसे ज्यादा रेमेंटेंस (अप्रवासी भारतीयों द्वारा स्वदेश  भेजा गया धन) भारत में आता है।  64 फीसदी वर्किंग आबादी के साथ 2020 तक भारत दुनिया का युवातम देश  बन जाएगा। वैज्ञानिकों, इंजीनियरों किसानों, कामगारों, व्यवसायियों और मेहनतकश  लोगों ने इस देश  को सात दषक में बुलदियों पर पहुंचाया है। मगर सियासी नेताओं ने क्या किया?  बस, भाषण  झाड़े , देश को बांटा , अपना  हित साधा। अपने लिए  पेंशन लगाई और  चुनाव लड़ने के लिए धन्ना सेठों  से पैसा कर , उन्हें  समृद्ध बनाने  की खातिर   नीतियों तोडा-मरोड़ा ।   आर्थिक गुलामी भारत में आज भी सर चढ कर बोलती है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया के गरीबतम मुल्क नाइजीरिया से भी अढाई गुना ज्यादा गरीब हैं। दुनिया का हर तीसरा भूखा आदमी भारत में रहता है। अमीर, गरीब के बीच की खाई अभी भी बहुत ज्यादा है  भारत की परचेजिंग पॉवर पैरिटी (पीपीपी) 3700 डालर चीन की 7600 डालर और ब्राजील की 8,600 डालर से काफी कम है।  अमेरिका में यह 43,500 डॉलर, और ब्रिटेन में 31,400 डॉलर है। मगर इन सब खामियों के बावजूद हम आजाद हैं, हमारे लिए यही पर्याप्त। अपनी तरक्की का मार्ग हम खुद प्रशस्त कर लेंगे।