इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टकनॉलॉजी (आईआईटी) में पढाई करना देश के हर नॉन-मेडिकल छात्र का सपना होता है मगर इनमें प्रवेश पाना उतना ही चुनौतीपूर्ण है, जितना माउंट एवरेस्ट को फतेह करना अथवा स्वेज नहर को पार करना। हर साल करीब पांच लाख छात्र आईआईटीज की 11,239 सीटों में प्रवेश पाने के लिए परीक्षा देते हैं। 2018 में इन 11,239 सीटों के लिए केवल 18138 परीक्षार्थी ही क्वालिफाई कर पाए थे जबकि 1,55,158 छात्रों ने जेई एडवांस परीक्षा दी थी। शनिवार को प्रधानमंत्री ने मुबई आईआईटी के दीक्षांत समारोह में माना कि आईआईटीज ने दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है और अब ये संस्थाए देश मे तकनीक क्राति के मजबूत पायदान हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को इन आईआईटीज और इनसे निकले इंजीनियर्स पर गर्व है। आईअीटीजी के कारण ही भारत आज टेक्निकल मैनपॉवर“ में दुनिया का बादशाह बना हुआ है। भारत के आईआईटी एलयुम्नस पर अमेरिका समेत पूरी दुनिया की नजर होती है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि कोई भी देश अथवा अर्थव्यवस्था प्रोद्योगिकी और नवोन्मेष (इनोवेशन) के बगैर तरक्की नहीं कर सकता। इनोवेशन और प्रोन्नत प्रोद्योगिकी भारत के तीव्र विकास के लिए निहायत जरुरी है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आईआईटीज का अतुलनीय योगदान रहा है। विभिन्न अध्ययनों का निचोड है कि आईआईटी में लगाए गए हर एक रुपए से देश को 15 रु का रिटर्न मिलता है और हर आईआईटीयन अपने साथ-साथ 100 नए रोजगार सृजित करता है। एक दशक पहले आईआईटी के योगदान पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 2008 तक अपने अस्तित्व के 58 वर्षों में देश के आईआईटीज के दो लाख एलयुम्नस ने 20 लाख करोड (इन्क्रीमेंटल इकनॉमिक वैल्यु क्रिएशन) से भी ज्यादा का योगदान दिया था। 2010 तक दस मेंसे चार आईआईटीयन उधोग और व्ववसायिक जगत के शीर्ष पर पदस्थ थे। हर दस आईआईटीयन मेंसे 7 देश में ही कार्यरत थे और इनमें विदेश से स्वदेश लौटे 2 एलयुम्नस भी शामिल हैं। इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि 70 फीसदी आईआईटीयन स्वदेश में ही कार्यरत हैं और केवल 30 फीसदी ही विदेश जा रहे हैं। कुछ साल पहले एक आईआईटीयन ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके खर्च और योगदान का पूरा हिसाब-किताब लगाकर बताया था कि सरकार जितना एक आम आईआईटीयन पर खर्च कर रही है, उससे लगभग 13 फीसदी ज्यादा उसका न्यूनतम योगदान होता है। कुछ साल पहले आईआईटी, मद्रास के चेयरमैन और अग्रणी उधोगपति पवन गोयनका ने कहा था कि इस संस्था से पास आउट होने वाला हर छात्र साल मे कम-से-कम दस करोड रु का योगदान दे सकता है और 100 लोगों को रोजगार मुहैया करा सकता है। आईआईटीयन की तुलना में सरकार भारतीय प्रशानिक सेवा (आईएएस) की भर्ती (यूपीएस परीक्षा) और ट्रेनिंग पर लगभग 50 लाख रु खर्च करती है। 2014-15 के दौरान आईएस और आईपीएस की ट्रेंनिग पर सरकार ने 4.86 करोड रु खर्च किए थे। इसमें उनका वेतन और यूपीएससी परीक्षा का खर्च शामिल नहीं है। आजादी के बाद से अब तक पिछले सात दशकों में इस बात का आकलन नहीं हो पाया है कि आईआईटीयन की तुलना में आईएएस अधिकारी का देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना योगदान रहता है। और यह भी विड्बना है कि भारत में डाक्टर से आईएएस बने अधिकारी को कृषि विभाग अथवा पीडब्लयू विभाग की जिम्मेदारी दी जाती है। इंजीनियर से आईएएस बने अफसर को हैल्थ और इतिहासकार को वेटेनरी विभाग। यानी आईएएस बन गए तो हर विशय के एक्सपर्ट हो गए। अगर यूपीएससी की परीक्षा मात्र से ही एक्सपर्ट बन जाएं, तो फिर इंजीनियर और मेडिकल खोलने का क्या औचित्य? बहरहाल भारत को अगर दुनिया का सिकंदर बनना है, तो अधिकाधिक आईआईटी खोलने की जरुरत है। भारत को बाबुओं की बजाए आईआईटीयन की कहीं ज्यादा जरूरत है ।
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