संसद से लेकर गली-मोहल्ले तक आरक्षण को लेकर देश में तल्खी का माहौल है। मामला बेहद संवेदनहील है सियासी पार्टियां अपनी -अपनी राजनीतिक गोटियां फिट करने में मशगूल हैं और बार-बार न्यायपालिका का दखल स्थिति को और बिगाड सकता है। समाज के कमजोर वर्गों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मिलना चाहिए, इस पर किसी को ऐतराज नहीं है। पर आजादी के सात दशक बाद भी आर्थिक की बजाए सामाजिक और धार्मिक पिछडापन अथवा जात-पात आरक्षण का आधार हो, यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है। इस पर देश में जब तब चर्चा होती ही रहती है और अब टकराव की स्थिति भी आ गई है। दरअसल, आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक-आर्थिक से कहीं ज्यादा वोट भुनाने का जरिया बन चुका है। आरक्षित तबकों के वोट पाने के लिए सियासी दलों में एक-दूसरे को पीछे छोडने की होड लगी हुई है। पिछले चार साल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बार-बार आरक्षित तबकों को आरक्षण पर आश्वस्त करना यही साबित करता है। और अब यूनिवर्सिटीज में आरक्षित पदों पर शिक्षकों की भर्ती का तरीका क्या हो, इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। 2006 से यूनिवर्सिटीज में भी आरक्षण का रोस्टर लागू है। इसके तहत यूनिवर्सिटी को यूनिट मानकर शिक्षकों की भर्ती में भी अनुसूचित जातियों के लिए 16 फीसदी, जनजातियों के लिए 7.5 फीसदी और ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने आरक्षण के रोस्टर को इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस बिला पर चुनौती कि आरक्षण का आधार यूनिवर्सिटी की बजाए विभाग होना चाहिए। अप्रैल, 2017 को हाई कोर्ट ने याचिका के पक्ष में फैसला सुनाया और यूजीसी ने तुरंत इसे लागू भी कर दिया। यूनिवर्सिटीज में इसी नियम के तहत भर्ती शुरु भी हो गई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यूनिवर्सिटी को यूनिट मानकर अगर आरक्षण लागू किया जाता है तो यह स्थिति भी आ सकती है कि किसी विभाग के सारे पद आरक्षित हो जाएं, तो किसी का एक भी नहीं। हाई कोर्ट ने आरक्षण के इस तरीके को अतार्किक और पक्षपाती बताते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद (आर्टिकल) 14 और 16 का उल्लघंन बताया। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। बाद में यह बात सामने आई कि नए नियम (विभाग वाइज) के तहत आरक्षण लागू होने के कारण दो-तिहाई पद अनारक्षित वर्गोंं को चले गए। इस पर दलित उबल पडे। मामला संसद में भी उठा। सरकार को इलाहाबाद हाई कोर्ट फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पडा और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक यूनिवर्सिटीज में शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगा दी। देश के 41 यूजीसी से सहायता प्राप्त विष्वविधालयों में षिक्षकों के कुल मिलाकर 17,106 पद हैं और अभी भी 35 फीसदी यानी 5,997 खाली हैं और तब तक खाली रहेंगे जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता। बहरहाल, आरक्षण मुद्दे के सियासीकरण के कारण देश में जब-तब टकराव की स्थिति पैदा हो रही है। दलित अपने हितों की रक्षा के लिए संगठित हो चुके हैं और अब स्वर्ण भी आरक्षण के खिलाफ संगठित हो रहे हैं। इससे पहले एससी-एसटी एक्ट (अत्याचार निरोध) पर सुप्रीम कोर्ट फैसले के खिलाफ दलितों ने भारत बंद का आहवान किया था और गैर-दलितों ने इसका विरोधकिया था । मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के मानसून सत्र में बिल पारित करवा कर निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस एकट के तहत शिकायत दर्ज होने पर आरोपी की त्चरित गिरफतारी पर रोक लगा दी थी। स्वर्णोंं को सरकार का यह कदम नागवार गुजरा है। सच कहा जाए तो :मोदी सरकार भी अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए “मनौती“ की वही राजनीति कर रही है जिसकी वह कांग्रेस सरकार के समय मुखर विरोधी रही है। “मनौती“ की राजनीति“ देश का पहले ही खासा नुकसान कर चुकी है। बस करें, अब और ज्यादा नहीं।
यह ब्लॉग खोजें
ब्लॉग आर्काइव
- अप्रैल (2)
- मार्च (1)
- सितंबर (2)
- अगस्त (2)
- जुलाई (3)
- जून (2)
- मई (2)
- अप्रैल (4)
- मार्च (9)
- फ़रवरी (7)
- जनवरी (6)
- दिसंबर (11)
- नवंबर (7)
- अक्टूबर (4)
- सितंबर (10)
- अगस्त (22)
- जुलाई (2)
- जून (11)
- मई (12)
- अप्रैल (7)
- मार्च (6)
- फ़रवरी (1)
- दिसंबर (5)
- नवंबर (4)
- अक्टूबर (5)
- सितंबर (17)
- अगस्त (33)
- जुलाई (28)
- जून (21)
- मई (30)
- अप्रैल (20)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (23)
- जनवरी (23)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (22)
- अक्टूबर (22)
- सितंबर (19)
- अगस्त (22)
- जुलाई (21)
- जून (19)
- मई (20)
- अप्रैल (19)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (20)
- जनवरी (19)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (21)
- अक्टूबर (21)
- सितंबर (21)
- अगस्त (16)
- जुलाई (15)
- जून (20)
- मई (18)
- अप्रैल (21)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (21)
- जनवरी (24)
- दिसंबर (25)
- नवंबर (27)
- अक्टूबर (23)
- सितंबर (27)
- अगस्त (35)
- जुलाई (22)
Copyright 2015 | Chander M Sharma . Blogger द्वारा संचालित.






