बालिकाओं का यौन शोषण , मॉब लिंचिंग, असहिषुणता और अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता पर प्रहार, बस यही सब हो रहा डिजीटाइजेश न और सूचना क्रांति की ओर तेजी से बढते भारत में। देश में हर छह घंटे में एक बालिका का बलात्कार किया जाता है। यानी एक दिन में 4 बलात्कार। हर माह लिचिंग के दो मामले सामने आते हैं। आए दिन भाजपाई कभी अल्पसंख्यकों, तो कभी बुद्धिजीवियों को डराते-धमकाते है। शर्म आती है कि हम ऐसे असभ्य समाज में रह रहे हैं जहां यौन के प्रति जानवरों से भी बहशी प्रवृति पाई जाती है। पश्चिम तो क्या, पडोसी मुल्कों का मीडिया भी हमारा मखौल उडा रहा है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि सियासी संरक्षक के बगैर यौन शोषण एवं मॉब लिंचिंग जैसे बहशी और अमानवीय अपराध पनप ही नहीं सकते है। अभी हम बिहार में मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन शोषण रैकेट के सदमे से उभरे भी नहीं थे कि योगी आदित्यनाथ सरकार की नाक तले देवरिया बालिका गृह में बालिकाओं के यौन शोषण रेकेट का भांडा फूट गया। यौन शोषण के इस घृणित कांड में बडे लोगों की संलिप्तता का होना और भी ज्यादा शर्मनाक है। लानत है ऐसे लोगों पर जो अपनी बेट्टियों का ही यौन शोषण करते हैं। ऐसे लोग तो जानवरों से भी ज्यादा बहशी हैं। मुजफ्फरनगर बालिका गृह रेप कांड के प्रमुख आरोपी को अब जेल में भी हर तरह की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। सुचिता राजनीति और पारदर्शी प्रशासन का दावा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मुजफ्फरपुर रेप कांड पर अपनी महिला मंत्री को बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। ऐेसी सरकार की विश्वसनीयता पर संदेह होना स्वभाविक है जो अपने ही आदेशों को अमली जामा नहीं पहना पाए। उत्तर प्रदेश के देवरिया में जिस बालिका गृह में बालिकाओं का यौन शोषण किया जा रहा था, सरकार ने एक साल पहले ही इसकी मान्यता रद्द करा दी थी । मगर इसके बावजूद यह अनैतिक बालिका गृह चलता रहा और बालिकाओं का यौन शोषण बदस्तूर जारी रहा। इतना ही नहीं, बालिकाओं को रात के अंधेरे में सफेदपोशों के पास भेजा जाता मगर प्रशासन को इसकी कानोंकान भनक तक नहीं लगी। जाहिर है इस घृणित कांड में सरकारी अमला भी मिला हुआ था। ऐसे संवेदनशील मामलों में भी सरकार का रवैया “सांप निकल गया, लाठी पीटते रह गए“ जैसा होता है। यौन शोषण का पर्दाफाश होने के बाद देवरिया के डीएम का ट्रांसफर और डीपीओ का निलंबन यही साबित कर रहा है। देवरिया बालिका गृह से लापता 18 बालिकाओं का अभी तक पता नहीं चल पाया है। आए दिन इस तरह की श र्मनाक घटनाएं हो रही हैं। दो-चार दिन सियासी नेता खूब बयानबाजी करते हैं, अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं और फिर सब-कुछ भुला दिया जाता है।
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