देश के वरिष्ठतम नेता और तमिल नाडु के सबसे बडे सियासी स्क्रिप्टराइटर मुथुवेल करुणानिधि के निधन ने तमिल राजनीति में शून्य पैदा कर दिया है। पांच बार तमिल नाडु का मुख्यमंत्री बनना और छह दशक तक विधायक रहना कोई सामान्य काम नहीं है। व्यक्तितौर पर करुणानिधि ने कोई चुनाव नहीं हारा। केवल लोकप्रिय जननेता ही यह मुकाम हासिल कर सकता है। समकालीन राजनीति में उनका योगदान जितना बेमिसाल है, उतना ही अतुलनीय योगदान उनका तमिल नाडु को आर्थिक और सामाजिक तौर पर प्रगतिशील राज्य बनाने में है। निम्न वर्गीय परिवार में पैदा हुए करुणानिधि ने आठ दशक से भी ज्यादा समय राजनीति में गुजारे हैं । किशोरावस्था में उन्होंने राजनीति में कदम रख लिया था। 17 साल की आयु में राजनीति में खासे सक्रिए हो गए थे। पचास के दशक में तमिल नाडु में हिंदी के खिलाफ जबरदस्त विरोध की लहर थी और द्रविड अस्मिता के लिए युवाओं में खासा उत्साह था। मद्रास प्रेसीडेंसी के स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदी को शामिल करने के विरोध-प्रदर्शनों में करुणानिधि ने बढ-चढ कर भाग लिया और “तमिल स्टूडेंट फोरम' के नाम से छात्र संगठन बनाया। इसी संगठन के लिए हस्त लिखित पत्रिका भी निकाली। आजादी से पहले 1940 के दशक में करुणानिधि की मुलाकात अपने राजनीतिक गुरु सीएन अन्नादुरै से हो गई थी। यहीं से उनका राजनीतिक सफर भी शुरु हुआ। आजादी से पहले ही तमिल नाडु में “ब्राह्मणों“ के वर्चस्ब के खिलाफ आंदोलन खडा हुआ था और पेरियार ईवी रामास्वामी इसके लीडर थे। पेरियार अन्नादुरै के राजनीतिक गुरु थे। कांग्रेस में ब्राह्मणों के वर्चस्व को लेकर पेरियार ने 1925 में कांग्रेस को छोडा दिया और द्रविडार कझगम (डीके) नाम की पार्टी बनाई थी। करुणानिधि के राजनीतिक गुरु सीएन अन्नादुरै इस पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता थे। मगर बाद में द्रविडों के लिए अलग राज्य के मुद्दे पर पेरियार से गहरे मतभेद होने के कारण अन्नादुरै ने द्रविड मुनैत्र कझगम (डीएमके) नाम की अपनी पार्टी बना ली थी। 25 साल की आयु में करुणानिधि को इस पार्टी की प्रचार समिति में शामिल किया गया। इसके बाद करुणानिधि ने पीछे मुडकर नहीं देखा। कल्लाक्कुडी का नाम डालमियानगर बदलने पर हिंसक विरोध- प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए उन्हें छह माह जेल में रहना पडा था। करुणानिधि अपने गुरु अन्नादुरै की तरह प्रखर लेखक और वक्ता थे। तमिल नाडु की सियासत में सिनेमा की अहम भूमिका रही है। राजनीति के साथ-साथ करुणानिधि ने बतौर डायलॉग राइटर फिल्मी दुनिया में कदम रखा और सफल भी हुए। करुणानिधि के लिखे डायलॉग के कारण 1952 में बनाई गई फिल्म “पराषक्ति“ बेहद सफल रही। करुणानिधि के डायलॉग में सामाजिक न्याय और प्रगतिषील समाज पर जोर रहता था। उन्होंने सिनेमा के माध्यम से अंधविश्वास , धार्मिक कटटरता के खिलाफ समाज को जागरुक किया । करुणानिधि की अन्नाद्रमुक नेता जयललिता से कभी नहीं बनी। दोनों के बीच रिश्तों में बहुत खटास थे और दोनों एक-दूसरे से नफरत करते थे। करुणानिधि जयललिता को पैराशूटी नेता मानते थे। उनका मानना था कि जयललिता द्रविड संस्कृति की राजनीतिक उपज नहीं थी और न ही वे संगठनात्मक फयदान पार कर आगे बढी थीं। एमजी रामचन्द्रन (एमजीआर) द्वारा 1972 में डीएमके छोडकर अपनी अलग पार्टी (एआईएडीएमके) बनाने पर जयललिता को पार्टी का प्रचार सचिव बनाया गया था। यही से जयललिता का राजनीतिक सफर शुरु हुआ था। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जयललिता बाहृण थीं और डीएमके हमेशा बाहृणों के खिलाफ लडती रही है। करुणानिधि को भी ताउम्र बाहृणों से लडना पडा। तमिल नाडु में ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी जयललिता उनकी सबसे बडी प्रतिद्धंद्धी थी। और अब मरणोपररांत भी करुणानिधि की देह को मरीना बीच पर एक अदद जमीन के टुकडे के लिए लडना पडा । बहरहाल, जयललिता के निधन के बाद अब करुणानिधि के दुनिया से रुखस्त हो जाने से तमिल नाडु की सियासत में एक युग का अंत हो गया है।
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