अशांत कश्मीर घाटी पिछले दो दिन से अनुच्छेद 35ए पर विरोध-प्रदर्शन की आग में सुलग रही है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 35ए को निरस्त करने के लिए दिल्ली की स्वंयसेवी संस्था द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई होनी थी। कश्मीर के अलगाववादियों ने इसी के विरोध में दो दिन के बंद का ऐलान किया था। बंद का खासा असर रहा और राजधानी श्रीनगर समेत पूरी कश्मीर घाटी में दो दिन सामान्य जीवन ठप्प रहा। जाहिर है यह सब न्यायपालिका पर दबाव डालने के लिए किया गया। राज्य में पंचायती संस्थाओं के चुनाव के दृष्टिगत राज्य सरकार के आग्रह पर सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी। इससे पहले 14 मई को भी अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी थी। फिलहाल, सुनवाई टलने से राज्य सरकार ने राहत की सांस ली है। राज्य सरकार पहले ही अदालत से सुनवाई के लिए अगले तारीख की गुहार लगा चुकी थी। राज्य में इस समय राज्यपाल शासन है मगर बावजूद इसके हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। वैसे कश्मीर में पिछले कई सालों से हालात सामान्य कहां रह गए हैं? घाटी में अलगाववादी, राष्ट्रीय मुख्यधारा के हिमायतियों पर भारी पड चुके हैं। आए दिन विरोध-प्रदर्शन , बंद, हिंसा और सुरक्षा कर्मियों तथा आतंकियों में मुठभेड ने दुनिया में जन्नत मानी जाने वाली कश्मीर घाटी को नरक से भी बदतर बना दिया है। उस पर भगवा संगठन आग में घी डालने का काम रहे हैं। कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 और 35-ए बेहद संवेदनशील मामला है। अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ है। अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर में बाहरी नागरिक भी न तो यहां बस सकते है और न ही कोई संपति खरीद सकते हैं। यहां तक कि राज्य सरकार में उन्हें नौकरी भी नहीं मिल सकती और राज्य सरकारी की किसी भी योजना का कोई लाभ नहीं मिल सकता है। अनुच्छेद 35ए को 1954 में तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश से 370 के साथ जोडा गया था। दिल्ली की एक स्वंयसेवी संस्था ने 35ए को इस बिला पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है कि इस व्यवस्था को संसद की स्वीकृति नहीं मिली हुई है और इससे देश के नागरिकों के साथ भेदभाव हो रहा है। कश्मीर के लोगों को शक है कि यह सारा खेल मोदी सरकार का है। भाजपा शुरू से अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने की मांग करती रही है। जम्मू संभाग के भाजपाई नेता आज भी गला फाड-फाड कर अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने की मांग करते हैं़। भारत सरकार ने कश्मीर के तत्कालीन कद्दावर नेता शेख अब्बदुला के साथ करार करने के बाद 1954 में अनुच्छेद 35ए को प्रभावी बनाया था और यह ऐतिहासिक विवशता थी। इसकी पृष्ठभूमि में आजादी से पहले क्षीर रियासत के शासक महाराज हरि सिंह द्वारा 1927 मे बनाया गया कानून था। कश्मीर में सयुक्त पंजाब के लोगों को बसने से रोकने के लिए 1927 में महाराज ने कानून बनाया था कि बाहरी लोग कश्मीर में न तो बस सकते थे और न ही संपत्ति खरीद सकते थे। 1954 में बनाया गया कानून 35ए भी इसी का भारतीय वर्जन है। आजादी से पहले और आजादी के बाद इस कानून का मूल मकसद कश्मीरियों की विशिष्ठ पहचान को बनाए रखना है। कश्मीरियों को तो इनका जिक्र करना तक भी गवारा नहीं है। 2010 के आईएएस टॉपर शाह फैसल के अनुसार अगर 35ए को खत्म किया गया तो कश्मीर का भारत से संबंध ही टूट जाएगा। क्या यह चेतावनी केन्द्र और राज्य सरकार के लिए काफी नहीं है? बहरहाल, कश्मीर की अवाम को समझना होगा कि सुप्रीम कोर्ट 35ए पर क्या व्यवस्था देता है, इसमें सरकार का कोई दखल नहीं हो सकता।
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