रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट (रेरा) को बने लगभग दो साल हो गए हैं मगर अभी भी इसे संजीदगी से लागू नहीं किया जा सका है। “अपना आशियाना“ बनाने के सपने बुनने वाले खरीदारों को जालसाज बिल्डरों से बचाने के लिए 2016 में रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट बनाया गया था। एक मई, 2017 से पूरे देश में यह एक्ट लागू हो चुका है। इस एक्ट को पूरी तरह से लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों पर है। मगर राज्यों की सरकारें रेरा को लागू करने में बिल्कुल संजीदा नहीं है। इस का प्रमाण इस स्थिति से मिलता है कि 28 राज्यों मेंसे अब तक पंजाब समेत केवल 3 राज्य ही रेगुलेटर को नियुक्त कर पाए हैं। इस कानून को लागू करने के लिए हर राज्य को 31 जुलाई, 2017 तक रेरा के नियमों को अधिसूचित किया जाना था। हर राज्य को रेरा पर पोर्टल बनाना और रेगुलेटर नियुक्त करना भी निहायत जरुरी था । 31 जुलाई, 2017 तक 15 राज्यों ने ही इस एकट को अधिसूचित किया था। देश के तमाम रियल एसटेट प्रोजेक्टस को अगस्त, 2017 तक रेरा के तहत रजिस्टर होना अनिवार्य था मगर राज्यों के पास अभी तक इस बात की पुख्ता जानकारी नहीं है कि कितने बिल्डरों ने अपने प्रोजेक्टस की रजिस्ट्रेशन करवाई है, कितनों ने नही। जिन बिल्डरोॅ ने रेरा की स्वीकृति नही ली है, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए थी, मगर अभी तक कहीं भी किसी दोषी बिल्डर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इस एक्ट के तहत हर प्रापर्टी एजेंट का रेरा के तहत पंजीकरण अनिवार्य है। इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। इससे इन आरोपों को बल मिलता है कि राज्यों को इस एक्ट को लागू करने में रुचि नहीं है उन्हें जनहित से ज्यादा बिल्डर्स के हितों की चिंता है है। बहरहाल, हर मामले की तरह बिल्डरों द्वारा ठगे गए लोगों को न्याय के लिए न्यायपालिका के पास जाना पड रहा है। बुधवार को नामी बिल्डर आम्रपाली को खरीदारों के फ्लैटस को समय पर पूरा नहीं करने में आना-कानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए इसके मालिकों को बेघर करने की चेतावनी दी। आम्रपली गु्रप ने हजारों गृह खरीदारों से कीमत तो वसूली ली मगर फ्लैटस दिए ही नहीं। थक हार कर खरीदारों को अदालत की शरण में जाना पडा। सुप्रीम कोर्ट ने 2 अगस्त को नेशनल बिल्डिंग कार्पोरेशन को आम्रपाली के अधूरे प्रोजेक्टस पूरा करने के लिए 30 दिन के भीतर एक्षन प्लान देने को कहा है। न्यायालय इन प्रोजेक्टस को पूरा करने के लिए आम्रपाली की संपत्ति बेचकर वांछित रकम जुटाने का प्रयास कर रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के दखल पर ही एक और नामी बिल्डर जेपी एसोसिएटस को खरीदारों को अधूरे पडे फ्लेटस को पूरा करने के लिए 750 करोड रु जमा कराने पडे थे। सुप्रीम कोर्ट की पहल पर जुलाई में कंपनी को हर महीने 500 फ्लैट्स का निर्माण पूरा कर खरीदारों को सौंपने का आश्वासन देना पडा था। निष्कर्ष यह है कि अगर हर मामले में आम आदमी को न्यायपालिका की श रण लेनी पडे तो सरकार की क्या जिम्मेदारी रह जाती है? रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट मोदी सरकार का क्रांतिकारी कदम है और इसके संजीदगी से लागू किए जाने पर बेलगाम बिल्डरों पर नकेल डाली जा सकती है। मगर इसके लिए राज्यों की सरकारों को दृढ इच्छा शक्ति दिखानी होगी । लोगों को अपने घर का सपने साकार करने में अभी तक खट्टे और कडवे अनुभवों का सामना करना पडा है। एक सर्वे के अनुसार देश के 50 बडे शहरों में 64 फीसदी फ्लैटस-अपार्टमेंटस के निर्माण में विलंब हो रहा है। इनमें 30 फीसदी में दो साल या इससे ज्यादा का विलंब हो रहा है। रेरा के लागू होने पर लोगों को इस विलंब निजात मिल सकती है।
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