सदियों से “थोथा चना, बाजे घना“ अथवा “अधजल गगरी, छलकता जाए“ जैसी कहावतें उन अज्ञानियों के लिए प्रचलित हैं जो अक्सर “अपने मुंह मियां मिठ्ठू “ बनने से बाज नहीं आते। सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे पोस्ट दिखती हैं । निसंदेह, सोशल मीडिया संवाद का समकालीन श्रेष्ठ जरिया है। भाग-दौड की मौजूदा व्यस्ततम जिंदगी में हम सामाजिक रिश्ते -नातों और सरोकारों को निभाने में उतरोत्तर पिछडते जा रहे हैं। रिश्तेदारों और मित्रों से मिलना-जुलना उतना संभव नहीं है, जितना पहले हुआ करता था। सरकारी नौकरी है, तो छुट्टी मिल जाती है मगर प्राइवेट सेक्टर, खासकर मीडिया में नौकरी करने वालों को आसानी से छुट्टी नहीं मिलती। इन हालात में सोशल मीडिया हमारी खूब मदद कर रहा है। बच्चे से लेकर वयोवृद्ध तक महिला और पुरुष सभी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। सात-आठ साल का बच्चा भी सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता है। आप आसानी से उनसे संवाद कर सकते हैं। सोशल मीडिया की सबसे बडी खासियत भी यही है कि यह आम आदमी के लिए संवाद का सशक्त माध्यम है। दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे मित्र, रिश्तेदार अथवा परिचित से आप अविलंब संपर्क साध सकते हैं। इंटरनेट ने वाकई पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज बना दिया है। प्रोन्नत टकनॉलॉजी ने दुनिया को और करीब ला दिया है। मगर कुछ लोग हैं जो सोशल मीडिया को अपनी “बपौती“ समझ कर इसके खुलेपन को चुनौती दे रहे है. इन्हीं लोगों की वजह से समकालीन सरकारों को सोशल मीडिया को लेकर कडे नियम बनाने के लिए विवश होना पड रहा है। ऐसे लोग “ विकृत वुद्धि वाले हैकर्स “ से कम नहीं है। सोशल मीडिया आम आदमी के संवाद का मंच है और इस पर पोस्ट होने वाली साम्रगी आम आदमी का साहित्य है। इसमें व्याकरण की अशुद्धियां, भाषा और वाक्य रचना की दुर्बलता का बने रहना स्वभाविक है। आम आदमी जिस संजीदगी और सादगी से लिखता है, वह सतत संवाद के लिए पर्याप्त है। संवाद की भाषा सुस्पष्ट , सरल और अर्थपूर्ण होनी चाहिए। कुछ लोग ताउम्र इस खुशफहमी में रहते हैं कि वह बहुत अच्छा लिखते है और उनसे बेहतर तो कोई लिख ही नहीं सकता। षब्दों का जाल बुनकर लिखना “लफ्फाजी“ कहलाता है। ऐसा लेखन किस काम का जो आम आदमी के पल्ले ही न पडे। महान लेखक मुंशी प्रेमचंद अपने लेखन में सरल भाषा का प्रयोग करते थे। एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि वे अपने बारे में क्यों नहीं लिखते? इस पर उनका जवाब था, “ अपनी महानता बतानी की मुझे जरुरत नहीं है। मैं एक सामान्य आदमी हूं और देश के लाखों लोगों की तरह सामान्य जीवन जीता हूॅ“। यही तो महान लेखकों की विशेषता होती है। वे अपने सृजनात्मक कार्य पर इतराते नहीं है। अपने लेखन पर इतराने वाले और शेघी बधारने वाले सृजनात्मक नहीं हो सकते? सोशल मीडिया को " सोशल" ही रहने दीजिए।
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