असहिष्णुता से परिपूर्ण भगवा पार्टी की लोकतांत्रिक “सोच“ भी माशल्लाह है। पार्टी अपने आलोचकों को नैतिकता और भद्रता का पाठ पढाते-पढाते नहीं अघाती ,मगर खुद “अभद्रता“ की सारी सीमाएं लांघने में कोई कसर नहीं छोडती। राहुल गांधी को पप्प्पू-पप्पू बुलाकर और उन्हें “नादान“, “नासमझ“ , “सामंती“, अपरिपक्व“ जैसे अलंकारों से संबोधित कर भाजपाई खुद को “ भद्र“ मानते हैं। सेक्युलर लोगों को पाकिस्तान चले जाने, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को मोटी-मोटी गालियां देने वाले अगर भद्र हैं, तो “अभद्रता“ की प्रासंगिकता कहां रह जाती है़ ? लोकतंत्र में असहिष्णुता को सहिष्णुता मानने वाले और राजनीति को धर्म से जोडने वालों बाहुबलियों का वर्चस्व व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक है। बहरहाल, “नादान“, “नासमझ“ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भाशणों से इन दिनों भाजपा बौखलाई हुई नजर आ रही है। विडवंना यह है कि एक ओर भाजपाई राहुल गाधी को “नादान“ और “नासमझ“ कहते हैं , वहीं दूसरी तरफ उनके जर्मन और इंग्लैंड के भाशणों से तिलमिलाए हुए है। अरे भाई, “नादान“ और “नासमझ“ को भाव देकर क्यों उनको “महान“ बना रहे हो? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों जर्मनी और इंग्लैंड के दौरे पर हैं। वीरवार को राहुल गांधी ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए भाजपा और प्रधानमंत्री पर तीखे प्रहार किए। अपने भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा की कथित अलगाववादी नीतियों पर कडा प्रहार करते हुए कह है कि अलगाववाद की राजनीति के गंभीर परिणाम हो सकते है जैसा की इराक में दिख चुका है और अब सीरिया में हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा की जननी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस)और भाजपा पर देश को बांटने और नफरत फैलाने के आरोप भी लगाए । भाजपा को सबसे ज्यादा इस बात पर ऐतराज है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने विदेष जाकर अपने देश के बारे उल्टा-सीधा बोलकर भारत की छवि खराब की है। पार्टी अब यह आरोप लगाकर स्वंय को तसल्ली दे रही है कि राहुल गांधी की “ऊल-जलूल“ बातों से कांग्रेस का ही नुकसान हो रहा है। मगर जिस तरह से भाजपाइयों की तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही है, उससे यही लगता है कि राहुल गांधी का भाशण से भगवा पार्टी को ज्यादा चोट पंहुची है। विदेशी मीडिया राहुल गांधी के भाषण से खासा प्रभावित है। बीबीसी ने इसे बेहद संतुलित और प्रभावशाली बताया है। जर्मन मीडिया में भी राहुल के भाषणको प्रभावषाली बताया है। राहुल गांधी विदेषों में ज्यादा प्रभावी और कंफर्टेबल होते हैं हालांकि प्रवासी भारतीयों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ज्यादा लोकप्रिय हैं। राहुल गांधी की फरार्टेदार इंग्लिश और युवा छवि विदेशी मीडिया को प्रभावित करती है। बहरहाल, राहुल गांधी के बर्लिन भाषण में कांग्रेस के रोडमेप की झलक मिलती है। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी के भाशणों में अल्पसंख्यकों, दलितों और सामाजिक तौर पर उपेक्षित तबकों पर खास जोर रहा है और वे इस बात को दोहराना नहीं भूलते कि कांग्रेस ने इन वर्गों के लिए क्या नहीं किया। मोदी सरकार ने भी इन तबकों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में खास तवज्जो दी है। मगर नोटबंदी और जीएसटी के कारण आम आदमी को जो परेषानियां उठानी पडी है, उनसे भाजपा को अब बार-बार सफाई देनी पड रही है। छोटे और सीमांत व्यापारी अर्से से भाजपा से जुडे हुए हैं। एक जमाने में भाजपा की पूर्वज जनसंघ को “व्यापारियों“ की पार्टी कहा जाता था। जीएसटी और नोटबंदी से इस तबके की कमर तोड कर रख दी है। मध्य प्रदेश में यह बात सामने आई है कि भाजपा के नेताओं को इन पर लोगों की नाराजगी झेलनी पड रही है। राहुल गांधी अपने भाषणों में नोटबंदी और जीएसटी से आम आदमी को हुई परेशानी का जिक्र करना कभी नहीं भूलते। “राहुल गांधी नादान हैं, नासमझ हैं, “अपरिपक्व है“ और “कांग्रेस की लुटिया डूबो रहे हैं“, इस तरह की बातें करके भाजपाई यही प्रमाणित कर रहे हैं कि पार्टी को अब उनसे डर लगने लग पडा है।
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