इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन से देश के सियासी नेताओं का दिल भर गया है और अब फिर से अगले लोकसभा चुनाव बैलट पेपर्स से कराने के लिए विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस की अगुवाई में सोलह विपक्षी दलों ने एक स्वर से अगले लोकसभा चुनाव बैलट पेपर्स से कराने की मांग की है। हाल ही में पहली बार विपक्षी दलों में पुराने बैलेट पेपर्स से चुनाव कराने के लिए इतनी जबरदस्त एकता देखने को मिली है। इससे पहले भूमि अधिग्रहण कानून पर विपक्षी दलों में इस कद्र एकता देखने को मिली थी। विपक्षी दलों का आरोप है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में टैंपरिंग करके चुनावों में हेराफेरी की जा सकती है और जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद सतारूढ दल चुनाव नतीजे अपने पक्ष में कर सकता है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा सत्र के समय इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में टैंपरिंग का नमूना भी पेश किया था मगर बाद में पार्टी इसे निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रमाणित नहीं कर पाई थी। सतारूढ दल को छोडकर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में टैंपरिंग के आरोप तो सभी लगा रहे हैं मगर आज तक कोई प्रमाणित नहीं कर पाया है। निर्वाचन आयोग इस साल के अंत तक देश के तमाम चुनावों को बैलट पेपर्स की बजाए वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) आधारित इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों से कराने का काम लगभग पूरा कर लेगा। एक इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन पर लगभग 10,500 से 12,000 रु का खर्चा आता है। 2017-18 और 2018-19 में 16,15, 000 वीवीपीएटी के लिए केन्द्र सरकार निर्चाचन आयोग को लगभग 3173 करोड रु जारी कर चुकी है और इनके लिए आर्डर भी दिए जा चुके है। इससे पहले 2016-17 में सरकार निर्वाचन आयोग को 14 लाख नई इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की खरीद के लिए 9,200 करोड रु जारी कर चुकी है। निर्वाचन आयोग के लिए अब पीछे हटना आसान नहीं है। बैलेट पेपर्स की जगह इलेक्ट्रानिक वोटिंग का प्रयोग देश में चुनाव सुधारों की दिशा में कारगर कदम माना गया था और कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने इसका स्वागत किया था। लोकसभा चुनाव में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल से दस हजार टन कागज की बचत होती है। विगत 23 सालों में निर्वाचन आयोग इलेक्ट्रानिक वोटिंग सिस्टम से लोकसभा के 3 और विधानसभाओं के 107 चुनाव सफलतापूर्वक करा चुका है। तीन में से दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नीत संप्रग और एक मे राजग नीत भाजपा सरकार चुनी गई है। बैलट पेपर्स की तुलना में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के कई फायदे हैं़। ईवीएम से मतदान करना न केवल ज्यादा सुविधाजनक है, अलबता इससे समय की बचत होती है। मतदाता को अपना वोट डालने के लिए मात्र बटन दबाना है। इलेक्ट्रानिक वोटिंग से अवैध मतों (इनवेलिड) की संख्या काफी कम होती है जबकि बैलेट पेपर्स मतदान में अवैध मतों की संख्या कहीं ज्यादा रहती है और कई मामलें में तो जीत के अंतर से भी ज्यादा। चुनाव नतीजे भी तेजी से निकाले जाते हैं । मतदान केन्द्र में गिनती करने वाला गलती-दर-गलती कर सकता है मगर मशीन नहीं करती। देश की दो बडी सार्वजनिक कंपनियां इलेक्ट्रानिक वोटिंग मषीनों को तैयार करती है और इनका कई बार टेस्ट किया जाता है। मतदान से कई माह पहले ईवीएम के पहले टेस्ट से लेकर मतदान के 13 दिन पहले सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में अंतिम टेस्ट तक कई टेस्ट किए जाते हैं। किस चुनाव क्षेत्र के लिए कौनसी मशीन भेजी जानी है, इसका रैंडम चयन कम्प्यूटर से किया जाता है। इन हालात में टैंपरिंग की गुजाइंश ही कहां रह आती है? इसके बावजूद भी अगर विपक्षी दलों निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर संदेह करते है, तो लोकतंत्र के लिए यह खतरे की घंटी है।
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