शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

देश के “भविष्य" को अंधकारमय करने वालीं को रोको

देश  के  बाल सुधार गृहों, शेल्टर होम्स अथवा चाइल्ड केयर इंस्टिटयूशनज( सीसीआई) से दो लाख से ज्यादा बच्चे गायब हो जाएं और सरकारी एजेंसियों को इसकी कानों-कान खबर न हो, इससे ज्यादा गंभीर मामला नहीं हो सकता। बच्चे देश  का भविष्य  होते हैं पर अगर सरकार और समाज अपने “भविष्य “ को भी संरक्षित न रख पाए, ऐसी व्यवस्था की  विश्चसनीयता  पर सवाल उठने स्वभाविक है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट भी इस जानकारी से हत-प्रत था कि देश  के  शेल्टर होम्स में 2016-17 में 4.73 लाख बच्चे थे मगर इस साल मार्च  में 2.61  लाख ही रह गए हैं। आखिर इन बच्चों को क्या आसमान निगल गया या जमीन खा गई? जाहिर है इन बच्चों को या तो बेच दिया गया या  विभिन्न  शेल्टर होम्स ने  सरकारी मदद लेने के लिए बच्चों की संख्या बढ-चढ कर दिखाई है । लापरवाही की हद यह है कि बच्चे लापता हैं, या  संख्या बढ-चढ कर पेश  किए गए, इसका भी पता नहीं लगाया गया।   जो भी हो, सरकार अपने ही नियमों का पालन करना भूल गई है। 2017 में केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी स्टैंटर्ड  ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स  (एसओपी) के अनुसार चार माह से ज्यादा समय के लापता होने पर फौरन इसकी जांच कराई जानी चाहिए। जुवेनाइल एक्ट के  सेक्शन 2 (14) के तहत भी जांच कराया जाना अनिवार्य  है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि देश  में  जुवेनाइल एक्ट का अक्षरक्ष पालन नहीं हो रहा है। इसी वजह से मुजफ्फरपुर और देवरिया जैसे यौन शोषण   कांड हो रहे हैं। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को लापता बच्चों के मामले में केन्द्र सरकार को दिषानिर्देश  बनाने को कहा था। इसमें चार साल लग गए और इन्हें  2017 में जारी किया गया।  भारत में अभी भी बच्चों और महिलाओं की तस्करी (चाइल्ड-वूमेन ट्रेफिफिंग) बडे पैमाने पर जारी है। नेशनल क्राइम रिकार्ड  ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चे लापता हो जाता है या उसे अगवा करके बेच दिया जाता है। घरेलू काम से लेकर देह व्यापार तक के लिए बच्चों को अगवा करके बेच दिया जाता है। बच्चों को   प्रॉस्टीट्यशन   के दलदल में धकेल दिया जाता है। बच्चों और महिलाओं से वेष्यावृति कराकर मुंबई में हर साल 400 मिलियन डॉलर कमाए जाते हैं।  केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन अनुसार भारत में तीन मिलियन से ज्यादा महिलाओं से वेष्यावृति कराईा जा रही है और इनमें 40 फीसदी बच्चे हैं। पिछले एक दषक में नाबालिग बालिकाओं की तस्करी में 14 गुना का इजाफा हुआ है और 2014 के दौरान इसमें 65 फीसदी का इजाफा हुआ थेए। 2016 में देष से  20,000 बालिकाओं और महिलाओं को  ट्रेफिफिंग का षिकार होना पडा था। एषिया में हर साल 1,35,000 बच्चों की   ट्रेफिफिंग की जती है। वैसे चाइल्ड-वूमेन ट्रेफिफिंग पूरी दुनिया में फन फैलाए हुए है। युद्ध और सषत्र संघर्श  (आर्म्ड कंफ्लिक्ट) के लिए भी बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। यूनिसेफ के अनुसार पूरी दुनिया में तीस से ज्यादा  आर्म्ड कंफ्लिक्टस में कम-से-कम तीन लाख बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमेंसे अधिकांष बच्चों की आयु 15 ंसे  18 साल के बीच होती है। कुछ बच्चे तो 7 से 8 साल आयु के हैं। खूंखार इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन अपने आतंकियों की षारीरिक भूख मिटाने के लिए बच्चों और महिलाओं को बडे पैमाने पर अगवा करता है। भारत में बच्चों के लिए सबसे ज्यादा वेष्यावृति और घरेलू काम के लिए अगवा किया जाता है। गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियां चाइल्ड ट्रेफिफिंग को बढावा देती है। ओडीषा, आंध्र प्रदेष, महाराश्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेष, पष्चिम बंगाल के भूख और गरीबी से पीडित क्षेत्रों को चाइल्ड  ट्रेफिफिंग के लिए निषाना बनाया जाता है। विभिन्न अध्ययनों का निश्कर्श है कि जब तक गरीबी और बेरोजगारी रहेगी, चाइल्ड  ट्रेफिफिंग का सिलसिला चलता रहेगा। सामाजिक-आर्थिक उत्थान ही इसे मिटा सकता है।       
           देष के “भविश्य“ का व्यापार

 देष की बाल सुधार गृहों अथवा षेल्टर होम्स अथवा चाइल्ड केयर इंस्टिटयूषनज( सीसीआई) से दो लाख से ज्यादा बच्चे गायब हो जाएं और सरकारी एजेंसियों को इसकी कानों-कान खबर न हो, इससे ज्यादा गंभीर मामला नहीं हो सकता। बच्चे देष का भविश्य होते हैं पर अगर सरकार और समाज अपने “भविश्य“ को भी संरक्षित न रखा पाए, ऐसी व्यवस्था की विष्वसनीयता पर सवाल उठने स्वभाविक है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को इस जानकारी से हत-प्रत था कि देष के षेल्टर होम्स में 2016-17 में 4.73 लाख बच्चे थे मगर इस साल मार्च  में 2.61  लाख ही रह गए हैं। आखिर इन बच्चों को क्या आसमान निगल गया या जमीन खा गई? जाहिर है इन बच्चों को या तो बेच दिया गया या  विभिन्न षेल्टर होम्स ने  सरकारी मदद लेने के लिए बच्चों की संख्या बढ-चढ कर दिखाई गई। लापरवाही की हद यह है कि बच्चे लापता हैं, या  संख्या बढ-चढ कर पेष किए गए इसका भी पता नहीं लगाया गया।   जो भी हो, सरकार अपने ही नियमों का पालन करना भूल गई है। 2017 में केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी स्टैंटर्ड  ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स  (एसओपी) के अनुसार चार माह से ज्यादा समय के लापता होने पर फौरन इसकी जांच कराई जानी चाहिए। जुवेनाइल एक्ट के सेक्षन 2 (14) के तहत भी जांच कराया जाना अनिवार्य  है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि देष में  जुवेनाइल एक्ट का अक्षरक्ष पालन नहीं हो रहा है। इसी वजह से मुजफ्फरपुर और देवरिया जैसे यौन षोशण के कांड हो रहे हैं। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को लापता बच्चों के मामले में केन्द्र सरकार को दिषानिर्देष बनने को कहा था। इसमें चार साल लग गए और इन्हें  2017 में जारी किया गया।  भारत में अभी भी बच्चों और महिलाओं की तस्करी (चाइल्ड-वूमेन ट्रेफिफिंग) बडे पैमाने पर जारी है। नेषनल क्राइम रिकार्ड  ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चे लापता हो जाता है या उसे अगवा करके बेच दिया जाता है। घरेलू काम से लेकर देह व्यापार तक के लिए बच्चों को अगवा करके बेच दिया जाता है। बच्चों को वेष्यावृति के दलदल में धकेल दिया जाता है। बच्चों और महिलाओं से वेष्यावृति कराकर मुंबई में हर साल 400 मिलियन डॉलर कमाए जाते हैं।  केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन अनुसार भारत में तीन मिलियन से ज्यादा महिलाओं से वेष्यावृति कराईा जा रही है और इनमें 40 फीसदी बच्चे हैं। पिछले एक दषक में नाबालिग बालिकाओं की तस्करी में 14 गुना का इजाफा हुआ है और 2014 के दौरान इसमें 65 फीसदी का इजाफा हुआ थेए। 2016 में देष से  20,000 बालिकाओं और महिलाओं को  ट्रेफिफिंग का षिकार होना पडा था। एषिया में हर साल 1,35,000 बच्चों की   ट्रेफिफिंग की जती है। वैसे चाइल्ड-वूमेन ट्रेफिफिंग पूरी दुनिया में फन फैलाए हुए है। युद्ध और सषत्र संघर्श  (आर्म्ड कंफ्लिक्ट) के लिए भी बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। यूनिसेफ के अनुसार पूरी दुनिया में तीस से ज्यादा  आर्म्ड कंफ्लिक्टस में कम-से-कम तीन लाख बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमेंसे अधिकांष बच्चों की आयु 15 ंसे  18 साल के बीच होती है। कुछ बच्चे तो 7 से 8 साल आयु के हैं। खूंखार इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन अपने आतंकियों की षारीरिक भूख मिटाने के लिए बच्चों और महिलाओं को बडे पैमाने पर अगवा करता है। भारत में बच्चों के लिए सबसे ज्यादा वेष्यावृति और घरेलू काम के लिए अगवा किया जाता है। गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियां चाइल्ड ट्रेफिफिंग को बढावा देती है। ओडीषा, आंध्र प्रदेष, महाराश्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेष, पष्चिम बंगाल के भूख और गरीबी से पीडित क्षेत्रों को चाइल्ड  ट्रेफिफिंग के लिए निषाना बनाया जाता है। विभिन्न अध्ययनों का निश्कर्श है कि जब तक गरीबी और बेरोजगारी रहेगी, चाइल्ड  ट्रेफिफिंग का सिलसिला चलता रहेगा। सामाजिक-आर्थिक उत्थान ही इसे मिटा सकता है।