गुरुवार, 23 अगस्त 2018

रुपया बदहाल, इक्विटी मार्किट मालामाल

 डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की बदहाली चिंता का विषय है। बदहाल रुपए इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि शेयर बाजार में तेजी बरकरार है मगर डॉलर के मुकाबले रुपया निरंतर फिसलता जा रहा है। अखिर ऐसा क्यों हो रहा है और यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा? 2018 में डॉलर के मुकाबले अब तक रुपया 10 फीसदी फिसल चुका है।  पिछले सप्ताह ही एक डॉलर के लिए 70 रुपए से भी ज्यादा का भाव चल रहा था। महंगे डॉलर का सबसे बुरा असर विदेशों  में पढाई करने वाले छात्रों पर पडता है।  आयातित चीजें और महंगी हो जाती है और सीमित बजट से विदेशी यात्रा करने वालों के सपने टूट भी सकते हैं। भारत की अधिकांश  विदेशी  मुद्रा भी तेल आयात पर ही खर्च होती है। तेल के अलावा भारत निर्यात करने वालों के लिए महत्वपूर्ण  कल-पुर्जे, खाद्य तेल और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भी आयात करता है। कमजोर रुपए से ये सब चीजें महंगी हो सकती हैं। इससे चालू खाते का घाटा और बढ सकता है।  इस साल चालू खाता घाटा 75 अरब डॉलर तक पहुचने का अनुमानं है।  कमजोर रुपए के कारण भारत तेल के साथ-साथ मुद्रा-स्फीति भी आयात कर रहा है।  दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से आगे बढने वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद  भारतीय रुपया अपनी बदहाली से उभर नहीं पा रहा है। दुनिया की पांच बदहाल मुद्राओं (करंसी)- भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और तुर्की-  में रुपया भी शामिल है। चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध से भी डॉलर और महंगा हो रहा है। इस युद्ध के कारण चीन का ज्यादा नुकसान हो रहा है। बुधवार को जब पूरे एषियाई मार्केट में तेजी व्याप्त थी, चीनी षेयरों मे मंदी छाई रही। और अब राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की पर निषाना साधा है। इससे पहले से बदहाल तुर्की की मुद्रा लीरा और बदहाल हो रही है। अमेरिका द्वारा तुर्की से आयात किए जा रहे इस्पात और एल्युमिनियम  पर ट्रैरिफ (षुल्क) को दोगुना किए जाने से पूरी एमरजिंग मार्केट्स हिल गई है। विदेषी  संस्थागत निवेषक (एफआईआई) एक-एक करके  एमरजिंग मार्केट्स से हाथ खींच रहे हैं। अर्थव्यवस्था की मजबूती और ब्याज दरे बढने के कारण  विदेषी  संस्थागत निवेषक का रुझान अमेरिका की ओर ज्यादा है। भारत को भी इसका खमियाजा भुगतना पड रहा है। इस साल अब तक विदेषी  संस्थागत निवेषक भारतीय बाजार से सात अरब डॉलर से ज्यादा निकाल चुके हैं। सुखद स्थिति यह है कि तुर्की की तरह भारत के पास पर्याप्त विदेषी मुद्रा भंडार हैं और रिजर्व  बैंक रुपए की बदहाली को रोकने के लिए मार्केट में जब-तब दखल देकर अब तक इसे संभालने में कामयाब रहा है। इस वित्तीय वर्श  के अंत तक  आरबीआई रुपए को संभालने पर 21.8 अरब विदेषी मुद्रा खर्च कर चुका था।  विदेषी संस्थागत निवेषकों (एफआईआई) पर  अत्याधिक निर्भरता को भारतीय रुपए की बदहाली के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। जब तक यह निर्भरता कम नहीं होगी, रुपए की बदहाली जारी रहेगी। वैसे आरबीआई के पूर्व  गवर्नर रघुराम राजन समेत कुछ अर्थषास्त्रियों का मानना है कि भारतीय रुपया रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (रीर) पर पहले से ही  7.6 फीसदी ओवरवैल्यूड है।  रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट मुद्रा स्फीति को ध्यान में रखकर 36 मुद्राओं के मूल्यांकन पर आधारित है। इस  एक्सचेंज रेट  को ज्यादा सटीक माना जाता है। डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपए से ज्यादा चिंतित होने की जरुरत है और इस करेक्षन से भारतीय मार्केट को ज्यादा नुकसान नहीं हो सकता है। तथापि, कमजोर मुद्रा की समस्या से निपटने के लिए भारत को अपने विदेषी कर्ज पर नियंत्रण रखने की जरुरत है। सरकार ने भी माना है कि संप्रग सरकार के समय 2013 में लिए गए चिदेषी कर्ज भुगतान के कारण ही रुपया कमजोर हो रहा है। अगर अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं, तो हर संकट से निपटा जा सकता है।