शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

अगस्त क्रांति:

अगस्त क्रांति को  शायद हम भूल गए हैं। आज किसी भी प्रमुख समाचार पत्र में अगस्त क्रांति से जुडे समारोह का उल्लेख नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने वीरवार को  जरुर संसद में इसका सरसरी उल्लेख किया। राजग के उम्मीदवार हरिवंश  सिंह के राज्यसभा  उप-सभापति (वाइस-चेयरमैन) चुने जाने पर मोदी ने अगस्त क्रांति का जिक्र किया। पत्रकारों को खुश  होना चाहिए हमारी बिरादरी का व्यक्ति राज्यसभा के उप-सभापति पद तक पहुंच गया है । हरिवंश  सिंह ने हिंदी की अग्रणी साप्ताहिक पत्रिका “धर्मयुग से अपना पत्रकारिता का सफर शुरु किया और रविवार पत्रिका से होते हुए प्रभात खबर के प्रधान संपादक तक पहुंच गए। अगस्त क्रांति की बर्ष  गांठ पर पत्रकार किसी  शीर्ष पद को सशोभित करे, अभिव्यक्ति की आजादी के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। दूसरे विश्व  युद्ध में मुंह की खाने के बावजूद फिरंगी भारत को आजादी देने के लिए तैयार नहीं थे। अतंतः महात्मा गांधी को फिरंगी शासन के खिलाफ 9 अगस्त को “भारत छोडो आंदोलन का ऐलान करना पडा। इस आंदोलन के कारण कांग्रेस में फूट पड गई थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड दी। शुरु में जवाहर लाल नेहरु और मौलाना आजाद भी इस आंदोलन के पक्ष में नहीं थे मगर सरदार पटेल और डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद खुलकर आंदोलन के पक्ष में कूद गए थे। हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट भी भारत छोडो आंदोलन के मुखर विरोध कर रहे थे। इसी वजह यह आंदोलन पूरी तरह से अपने मकसद में सफल नहीं हो पाया। यही इस आंदोलन की समकालीन प्रासंगिकता भी है। आजादी के बाद ही नहीं, इससे पहले आजादी की लडाई के समय भी “जयचंदों“ ने आंदोलनकारियों का मनोबल तोडने में कोई कसर नहीं छोडी। इस आंदोलन के लिए  मोहम्मद अली जिन्हा, मुस्लिम लीग और  कम्युनिस्टों ने गांधी जी की मुखर आलोचना की थी। आजादी की लडाई में देश  के सभी संगठनों में एकता नहीं होने से स्वाधीनता आंदोलन और लंबा चला था।  इस आंदोलन ने लोगों में देश  को फिरंगियों से आजाद होने का ऐसा जो भरा कि पांच साल बाद उन्हें भारत छोड कर जाना पडा। इस आंदोलन को कैसे भुलाया  जा सकता है़?