शनिवार, 11 अगस्त 2018

कांग्रेस की एक और पराजय

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस एक और  प्रतिष्ठाशाली  चुनाव हार गई है। राज्यसभा उप-सभापति (वाइस चेयरमैन) चुनाव में बेहतर स्थिति  के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार को हराकर सत्तारूढ गठबंधन राजग प्रत्याषी हरिवंश  सिंह उप-सभापति चुन लिए गए। पिछले महीने  नो-ट्रस्ट  प्रस्ताव के बाद विपक्ष की यह लगातार दूसरी हार है। इस बार भी भाजपा नीत राजग का फ्लोर मेनेजमेंट विपक्ष से कहीं ज्यादा कारगर साबित हुआ। अगस्त  क्रांति की वर्षगांठ  के दिन कांग्रेस को अपनी कमजोर रणनीति के कारण मुंह की खानी पडी। कांग्रेस के हरिप्रसाद विपक्ष के साझा उम्मीदवार थे मगर उन्हें कई दलों का समर्थन ही नहीं मिला। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, आंध्र प्रदेश  की वायएसआर कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडु की टीडीपी के सांसदों ने वोट ही नहीं डाले। अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली तेदपा ने इस बार कांग्रेस का साथ नहीं दिया। कांग्रेस के दो सांसदों समेत 18 सांसदों ने वोट ही नहीं डाले। ओडीशा  की बीजू जनता दल, तेलगांना की टीआरएस और तमिल नाडु की अन्नाद्रमुक ने सत्ताधारी गठबंधन का साथ दिया। यह बात अभी भी रहस्य बनी हुई है कि राकांपा प्रमुख  शरद पवार और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा उप-सभापति में  अपना उम्मीदवार खडा करने से क्यों हाथ खींच लिए थे। विपक्षी पार्टियों में पहले इस पद के लिए राकांपा अथवा तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार खडा करने पर सहमति बनी थी मगर दोनों पार्टियां मुकर गईं। उप-सभापति चुनाव में सताधारी गठबंधन को परास्त करने के लिए जिस सटीक रणनीति की जरुरत थी, कांग्रेस उसके बारे सोच तक नहीं पाई। कई खेमों और दिशाओं में बिखरे गैर-भाजपाई दलों को  एक छत तले लाने के लिए बडे कद और काठी का नेता चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अभी इस फ्रेम में फिट नहीं बैठ रहे हैं। कांग्रेस में आज भी कई सीनियर  नेता हैं, जिनका कद राहुल गांधी से कहीं ऊंचा है। कांग्रेस की सबसे बडी समस्या यह है कि कई राज्यों में पार्टी क्षेत्रीय दलों की प्रमुख प्रतिद्वन्दी  है। ओडिशा   में बीजू जनता दल के लिए भाजपा से ज्यादा कांग्रेस से चुनौती मिल रही है। इसलिए, कांग्रेस बराबर नवीन पटनायक से हाथ मिलाने से कतराती रही है। कांग्रेस की वजह से नवीन पटनायक विपक्ष का साथ नहीं दे रहे हैं। आंध्र प्रदेश  में कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडु की तेदपा और वायएसआर कांग्रेस की प्रमुख प्रतिद्धंद्धी है, इसलिए ये दोनों पार्टियां कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाएगी। तेदपा राजग में लौट सकती है। तेलगांना में भी कांग्रेस टीआरएस के लिए बडी चुनौती है। इन सब हालात में राजग के खिलाफ विपक्ष का साझा मोर्चा दिवास्वप्न जैसा लगता है। कुछ विपक्षी दल अभी से कांग्रेस मुक्त साझा विपक्षी मोर्चे की जुगाड में है। नवंबर-दिसंबर में होने वाले मध्य प्रदेश , राजस्थान, छत्तीसगढ और मिजोरम के विधानसभा चुनाव  कांग्रेस के लिए सबसे बडी चुनौती पेश  करने जा रहे हैं। कांग्रेस इन चारों राज्यों में सत्ता की प्रमुख दावेदार है। भाजपा ने मध्य प्रदेश  और छतीसगढ में कांग्रेस को लंबे समय से सता में नहीं आने दिया है। बहुजन समाज पार्टी इन दोनों राज्यों में कांग्रेस का खेल बिगाड सकती है। मायावती की पार्टी इन राज्यों में भले ही सत्ता में आने की स्थिति में नहीं है मगर बसपा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में है। और अगर समाजवादी पार्टी भी चुनाव में कूद गई, तो कांग्रेस को और ज्यादा नुकसान हो सकता है। कांग्रेस बसपा और सपा से इन राज्यों में गठबंधन करने से इसलिए हिचक रही है कि विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे का फार्मूला लोकसभा चुनाव में भी बरकरार रखना पड सकता है। पार्टी इन सभी राज्यों में सत्ता में आने की उम्मीद लगाए हुए है। लोकसभा चुनाव में कांगेस के लिए  मध्य प्रदेश , राजस्थान, छत्तीसगढ बहुत अहम है । हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और उतराखंड के बाद केवल इन्हीं राज्यों में कांग्रेस का वर्चस्व है।