नोबेल पुरुस्कार विजेता और भारतीय मूल के नामचीन लेखक वीएस नायॅपाल के निधन से साहित्य ने एक नायाब हीरा खो दिया है। 85 वर्ष की आयु में शनिवार को लंदन में उनका देहावसान हो गया। लेखक इस संसार से विदा होने के बावजूद अपनी कृतियों में हमेशा जीवित रहते हैं। नायॅपाल अपनी अमूल्य कृतियों और क्रांतिकारी विचारों के लिए हमेशा अपने पाठकों के दिलों पर राज करते रहेंगे। त्रिनिदाद में जन्मे नायॅपाल 1950 में आक्सफोर्ड में छात्रवृति में अध्ययन के लिए आए और फिर यहीं के होकर रह गए। उनका परिवार 1880 में ही भारत छोडकर चला गया था। नायॅपाल ओजस्वी लेखनी के लिए जाने जाते थे। उनकी 30 से ज्यादा साहित्य कृतियां हाथोंहाथ बिकीं। वे इस्लाम के मुखर आलोचक थे। नायॅपाल ने इस्लाम को मानवता का सबसे बडा दुश्मन बताया है । उनका कहना था कि इस्लाम ने मानव को केवल गुलाम बनाया है और दुनिया की अन्य संस्कृतियों को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोडी। नायॅपाल का यह भी कहना था कि मुस्लिमों द्वारा धर्मांतरण के बाद मानव की पहचान मिटाने की कोशिश उपनिवेशवाद से भी बदतर रही है। उनका यह भी मानना था कि ईसाईयों ने भारत का इतना नुकसान नहीं किया, जितना इस्लाम ने। नायॅपाल को साहित्य और इतिहास के इन विवरणों पर सख्त ऐतराज था कि “ मुस्लिम भारत आए“। इन विवरणों से तो ऐसा लगता है जैसे मुस्लिम पर्यटकों की तरह बस में बैठकर आए औृ चले गए जबकि वास्तविक यह है कि वे सब भारत को लूट्ने के लिए आए थे। इन्होंने जमकर लूट-पाट की, मंदिर तोडे और लोगों को गुलाम बनाया। इससे ज्यादा अमानवीय कृत्य कोई हो ही नहीं सकता। उनका मानना था कि हारे हुए लोग इतिहास नहीं लिखते। केवल विजेता ही इतिहास लिखते हैं। नायॅपाल ने भारत के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति पर “ ए वंडेड सिविलाइाजेशन“ और “ एन एरिया ऑफ डार्कनेस“ किताबें लिखीं। इन पुस्तकों को लिखने में उन्हें 27 साल लग गए। उनकी प्रखर लेखनी के लिए 1990 में उन्हें नाइटहुड से सम्मानित किया गया। 1971 में बुकर प्राइज और 2001 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । इस महान लेखक को सादर नमन।
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