शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

डर्टी पॉलिटिक्स ऑफ़ वोट बैंक

भारत में दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुडे फैसले जनहित से कहीं ज्यादा सियासी फायदे को सामने रखकर लिए जाते हैं। दलितों पर अत्याचार को लेकर मोदी सरकार ने सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक का फैसला पलट दिया है। बुधवार को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट के मूल प्रावधान को बनाए रखने का फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट  ने 20 मार्च  को व्यवस्था दी थी कि इस एक्ट के तहत  शिकायत मिलने पर आरोपियों की फौरन गिरफ्तारी नहीं की जा सकती और प्रथम दृष्टया  जांच और उच्चाधिकारियों की अनुमति के बाद ही गिरफ्तारी  की जानी चाहिए। मामला हर नागऱोक के मौलिक अधिकार का है।   न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी थी कि आरोपियों का जमानत दी जा सकती है। अदालत ने गिरफ्तारी से पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी से जांच करवाना अनिवार्य बताया था। अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट (अत्याचार रोकथाम ) के तहत किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के खिलाफ अत्याचार का मामला दर्ज होते ही गिरफ्तारी किए जाने का प्रावधान है। अदालत की इस व्यवस्था से दलित क्षुब्ध हैं। वोट बैंक के खो   जाने के भय से  परेशान राजग सहयोगी दलों के नेता लोजपा के राम बिलास पासवान, रिपब्लिकन पार्टी प्रमुख राम दास अठावले और आरएलएसपी प्रमेख उपेन्द्र कुशवाह  मूल प्रावधान के लिए सरकार पर दबाव डाल रहे थे। पासवान ने 9 अगस्त को आहुत भारत बंद में  शामिल होने तक की धमकी दी थी।  "पॉलिटक्स ऑफ़ ब्लैकमैलंग"है। विभिन्न दलित संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट  के  फैसले के विरोध में 9 अगस्त को “भारत बंद“ का आहवान किया है। एक्ट पर सरकार की पहल के बावजूद दलित संगठनों ने 9 अगस्त को आहुत बंद वापस नहीं लिया है। इस मामले में कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष भी सरकार की हां में हां मिला रहा है। वीरवार को कांग्रेस ने लोकसभा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस एक्ट में बदलाव को खतरनाक बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार दलित हितों की रक्षा  करने में असमर्थ है और जानबूझ कर विलंब कर रही है। भारतीय लोकतंत्र में “वोट की राजनीति“  हमेशा   अन्य ज्वलंत मुद्दों पर भारी पडती  है। देश  की कुल आबादी का एक चौथाई (25 फीसदी) अनुसूचित और जनजाति हैं। इनमें 16.6 फीसदी अनुसूचित और  8.6 फीसदी जनजाति आबादी है। आजादी के बाद लंबे समय तक दलित कांग्रेस के पक्का “वोट बैंक“ रहे  हैं और उनके कल्याण पर दिल खोलकर खर्च  भी किया गया। मगर इतना सब करने पर भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सामाजिक-सामाजिक आर्थिक स्थिति में अपेक्षाकृत सुधार नहीं आया है।  ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी दलितों को सामाजिक तौर पर अपमानित किया जाता है।  स्वर्णोंं द्वारा  दलितों को कुंए से पानी तक भरने नहीं दिया जाता। स्वर्णों की बराबरी करने पर उन पर अत्याचार किए जाते हैं। 79 फीसदी  स्कूलों में मिड-डे मिल के समय अनुसूचित जाति के छात्रों को खाना छूने से रोका जाता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश  के हमीरपुर जिले में भाजपा की महिला विधायक द्वारा मंदिर में  दशनार्थ आने  के बाद परिसर को गंगा जल से धोया गया । केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय की 2015 में जारी एक रिपोर्ट  के अनुसार 44.8 फीसदी जन जाति और  33.8 फीसदी   अनुसूचित जाति आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। शहरी क्षेत्रों में  27.3 फीसदी जनजाति और 21.8 फीसदी अनुसूचित जाति गरीबी रेखा से नीचे हैं।  अनुसूचित जाति के 45 फीसदी और 30 फीसदी आदिवासी भूमिहीन हैं और मजदूरी करके अपना गुजारा करते हैं। प्राइमरी स्कूलों से ड्राप आउट करने वाले 50 फीसदी छात्र अनुसूचित जाति से संबंधित होते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 73 फीसदी दलित और 79 फीसदी आदिवासी देहातों में सभी तरह की सुविधाओं से वंचित थे। इन लोगों को  कानून  में बदलाव हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पडेगा। आंकडों से साफ होता है कि सियासी दलों को दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की इतनी चिंता नहीं है, जितनी इनके वोटों की। दलितों के नाम पर अपनी सियासी दुकानें सजाने वाले राजनीतिक दलों के दबाव में सरकार आ सकती है, न्यायपालिका नहीं।