असहिष्णुता की पीडा
देष की अखंडता पर मंडरा रहे असहिष्णु माहौल के बादल छंटाने की बजाय भाजपा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वंय सबसे ज्यादा वैचारिक असहिष्णुता और संगठित दुष्प्रचार के शिकार हैं। इसके लिए जेटली ने कांग्रेस और वाम दलों को आडे हाथ लिया है। भाजपा की जननी राष्ट्रीय स्वंय सेवक को इस बात का मलाल है कि दादरी में ”गोमांस“ सेवन के लिए मुसलमान की पीट-पीट कर हत्या जैसे निंदनीय कृत्यों से संगठन को खामख्वाह जोडा जा रहा है। और यह सब हिंदू संस्कृति और संगठनों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। संक्षेप में हर बार की तरह इस बार भी भाजपा और आरएसएस “हिंदुत्व“ की आड में असहिष्णु तल्ख माहौल को सहज करने की बजाय यह संदेश देना चाहते हैं कि कट्टरपंथी जो कुछ भी कर रहे हैं, वह अगर सही नहीं है तो गलत भी नहीं है। साफ-साफ शब्दों में कहा जाए तो देश में असहिष्णुता के लिए भगवा वस्त्रधारी नहीं, बल्कि वो लोग जिम्मेदार हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भगवा पार्टी के विरोधी हैं। यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अगर वैचारिक असहिष्णुता और संगठित दुष्प्रचार का शिकार बनाया जाता है , तो देश का माहौल बिगडना तय है। वित्त मंत्री समेत भाजपाई और आरएसएस नेता अपनी जगह सही हो सकते हैं। दक्षिणपंथी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर वामपंथियों का असहज होना स्वभाविक और इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि उनके खिलाफ संगठित दुष्प्रचार का सिलसिला बढा है। मगर भाजपा को इस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए। भाजपा, आरएसएस और उससे संबंधित संगठन कांग्रेस शासन में यही सब करते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के खिलाफ लंबे समय तक नियोजित दुष्प्रचार किया जाता रहा और उस दौरान नरेन्द्र मोदी को पूरी दुनिया में भारत की हर समस्या को चुटकियों में हल करने वाले “विकास का मसीहा“ के रुप में पेश किया गया। दरअसल, आरएसएस और हिंदूवादी विचारधारा के समर्थकों की मीडिया और संबंधित माध्यमों में जबरदस्त घुसपैठ है। आरएसएस एवं दक्षिणपंथी फ्रेंडली मीडिया ने गुजरात में विकास के ”छदम मॉडल” को खडा करके मोदी को पिछले तीन दशकों में सुनियोजित तरीके से पेश किया। उस दौरान कांग्रेस, वामपंथी और सोनिया गांधी-राहुल गांधी को खलनायक और मोदी और भाजपा को नायक बनाया गया। अब यही प्रचार भाजपा पर भारी पड रहा है। केन्द्र में मोदी सरकार के बनने से काफी पहले वेस्टर्न मीडिया का आकलन था कि भारत जैसे सांस्कृतिक-सामाजिक विविधता वाले देश में खालिस दक्षिणपंथी सरकार देश को अशांत कर सकती है। इससे आस-पडोस का माहौल भी अशांत हो सकता है। इसकी वजह भी है। भगवा पार्टी के लोग और उससे सम्बद्ध संगठनों को नियंत्रित करना किसी के वश में नहीं है। 6 दिसंबर,1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाते समय भगवा कार्यकर्ताओं को वरिष्ठ नेता भी नियंत्रित नहीं कर पाए थे। भगवा पार्टी के कार्यकर्ताओं में हिंदू एजेंडे को लेकर आज भी वही जज्बा और समर्पण की भावना है, जो 1992 में थी। केन्द्र में सतारूढ होने के लिए भगवा कार्यकर्ताओं को लंबा इंतजार करना पडा है। अब जबकि केन्द्र में भगवा पार्टी सत्ता में आ ही गई है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी भगवा कार्यकर्ताओं को “हिंदूवादी एजेंडे पर चलने से रोक नहीं सकते। मौजूदा असहिष्णु माहौल इसी स्थिति का नतीजा है। यही वजह है कि दादरी जैसी देश अहितकारी कृत्यों पर भी भाजपा के शीर्ष नेता त्वरित प्रतिक्रियाएं देने से कतराते हैं। देश के समक्ष इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि वैचारिक असहिष्णुता तल्ख माहौल को कैसे सहज किया जाए? एक-दूसरे पर दोषारोपण से तो माहौल सुधरने से रहा। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का असहिष्णुता का शिकार होना नई बात नहीं है। प्रधानंमत्री को बचाने और उन्हें इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए विशाल शासकीय और पार्टी तंत्र उपलब्ध है। मगर आम आदमी को असहिष्णुता जनित हिंसा से कौन बचाएगा?
देष की अखंडता पर मंडरा रहे असहिष्णु माहौल के बादल छंटाने की बजाय भाजपा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वंय सबसे ज्यादा वैचारिक असहिष्णुता और संगठित दुष्प्रचार के शिकार हैं। इसके लिए जेटली ने कांग्रेस और वाम दलों को आडे हाथ लिया है। भाजपा की जननी राष्ट्रीय स्वंय सेवक को इस बात का मलाल है कि दादरी में ”गोमांस“ सेवन के लिए मुसलमान की पीट-पीट कर हत्या जैसे निंदनीय कृत्यों से संगठन को खामख्वाह जोडा जा रहा है। और यह सब हिंदू संस्कृति और संगठनों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। संक्षेप में हर बार की तरह इस बार भी भाजपा और आरएसएस “हिंदुत्व“ की आड में असहिष्णु तल्ख माहौल को सहज करने की बजाय यह संदेश देना चाहते हैं कि कट्टरपंथी जो कुछ भी कर रहे हैं, वह अगर सही नहीं है तो गलत भी नहीं है। साफ-साफ शब्दों में कहा जाए तो देश में असहिष्णुता के लिए भगवा वस्त्रधारी नहीं, बल्कि वो लोग जिम्मेदार हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भगवा पार्टी के विरोधी हैं। यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अगर वैचारिक असहिष्णुता और संगठित दुष्प्रचार का शिकार बनाया जाता है , तो देश का माहौल बिगडना तय है। वित्त मंत्री समेत भाजपाई और आरएसएस नेता अपनी जगह सही हो सकते हैं। दक्षिणपंथी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर वामपंथियों का असहज होना स्वभाविक और इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि उनके खिलाफ संगठित दुष्प्रचार का सिलसिला बढा है। मगर भाजपा को इस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए। भाजपा, आरएसएस और उससे संबंधित संगठन कांग्रेस शासन में यही सब करते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के खिलाफ लंबे समय तक नियोजित दुष्प्रचार किया जाता रहा और उस दौरान नरेन्द्र मोदी को पूरी दुनिया में भारत की हर समस्या को चुटकियों में हल करने वाले “विकास का मसीहा“ के रुप में पेश किया गया। दरअसल, आरएसएस और हिंदूवादी विचारधारा के समर्थकों की मीडिया और संबंधित माध्यमों में जबरदस्त घुसपैठ है। आरएसएस एवं दक्षिणपंथी फ्रेंडली मीडिया ने गुजरात में विकास के ”छदम मॉडल” को खडा करके मोदी को पिछले तीन दशकों में सुनियोजित तरीके से पेश किया। उस दौरान कांग्रेस, वामपंथी और सोनिया गांधी-राहुल गांधी को खलनायक और मोदी और भाजपा को नायक बनाया गया। अब यही प्रचार भाजपा पर भारी पड रहा है। केन्द्र में मोदी सरकार के बनने से काफी पहले वेस्टर्न मीडिया का आकलन था कि भारत जैसे सांस्कृतिक-सामाजिक विविधता वाले देश में खालिस दक्षिणपंथी सरकार देश को अशांत कर सकती है। इससे आस-पडोस का माहौल भी अशांत हो सकता है। इसकी वजह भी है। भगवा पार्टी के लोग और उससे सम्बद्ध संगठनों को नियंत्रित करना किसी के वश में नहीं है। 6 दिसंबर,1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाते समय भगवा कार्यकर्ताओं को वरिष्ठ नेता भी नियंत्रित नहीं कर पाए थे। भगवा पार्टी के कार्यकर्ताओं में हिंदू एजेंडे को लेकर आज भी वही जज्बा और समर्पण की भावना है, जो 1992 में थी। केन्द्र में सतारूढ होने के लिए भगवा कार्यकर्ताओं को लंबा इंतजार करना पडा है। अब जबकि केन्द्र में भगवा पार्टी सत्ता में आ ही गई है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी भगवा कार्यकर्ताओं को “हिंदूवादी एजेंडे पर चलने से रोक नहीं सकते। मौजूदा असहिष्णु माहौल इसी स्थिति का नतीजा है। यही वजह है कि दादरी जैसी देश अहितकारी कृत्यों पर भी भाजपा के शीर्ष नेता त्वरित प्रतिक्रियाएं देने से कतराते हैं। देश के समक्ष इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि वैचारिक असहिष्णुता तल्ख माहौल को कैसे सहज किया जाए? एक-दूसरे पर दोषारोपण से तो माहौल सुधरने से रहा। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का असहिष्णुता का शिकार होना नई बात नहीं है। प्रधानंमत्री को बचाने और उन्हें इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए विशाल शासकीय और पार्टी तंत्र उपलब्ध है। मगर आम आदमी को असहिष्णुता जनित हिंसा से कौन बचाएगा?






