बुधवार, 2 सितंबर 2015

"One Rank, One Pension":Modi Govt Cheats Army Veterans

                                                      सरकार की बदनीयत

“वन रैंक, वन पेंशन" को  लेकर  वित्त मंत्री अरुण जेटली के ताजा बयान से इस संवेदनशील मुद्दे पर मोदी सरकार का स्टैंड साफ हो गया है। देश  का वित्त मंत्री अगर यह कह रहा है कि “ हर साल पेंशन का सिस्टम बदल नहीं सकता, तो इसके यह अभिप्राय निकाले जाएंगें कि सरकार ने पूर्व सैनिकों की मांग एक तरह से खारिज कर दी है। जेटली का यह भी कहना है कि सरकार भावनाओं में नहीं बहती है, अलबत्ता जमीन सच्चाई को सामने रख कर सोचती है। जेटली ने साफ-साफ शब्दों में  कहा है कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना पडता है और अगर एक वर्ग की मांगें मान ली जाती हैं, तो दूसरे भी वैसी ही माँगें  उठा सकते हैं। वित्त  मंत्री का कथन है कि सरकार भावनाओं में नही बहती और जमीनी सच्चाई को ध्यान में रखकर ही अपने फैसले लेती है। जेटली की बातों से मोदी सरकार की बदनीयत का पता चलता है। सैनिकों के लिए यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण  है कि सरकार अभी तक “वन रैंक, वन पेंशन" की परिभाषा  को भी ठीक तरीके से समझ नहीं पाई है।  अगर सरकार को अभी तक “वन रैंक, वन  पेंशन" की ही समझ नहीं है, तो सरकार का पूर्व  सैनिकों की मागों को मानने का दावा खोखला लगता है।  वित्तमंत्री अपनी जगह सही हो सकते हैं मगर इन सब बातों पर लोकसभा चुनाव से पहले पूर्व  सैनिकों को वायदे करते समय गौर किया जाना चाहिए था। अरुण जेटली आज जो कुछ भी कह रहे हैं, यही तर्क पूर्व  संप्रग सरकार भी दिया करती थी। सरकार चलाना एक बात है और खोखले वायदे करके चुनाव जीतना दूसरी बात। मोदी सरकार को अब समझ में आ रहा है कि संप्रग सरकार पूर्व  सैनिकों की “वन रैंक, वन पेंशन" की मांगें क्यों नहीं पूरी कर पाई?  अमूमन, पेंशन" की गणना के लिए लैंथ ऑफ सर्विस को ध्यान में रखा जाता है। 1973 तक सैनिकों को एक रैंक, वन पेंशन ही मिला करती थी और रैंक में पेंशन" का निर्धारण लैंंथ ऑफ सर्विस के अनुसार किया जाता था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने तीसरे वेतन आयोग की सिफारिषें आने के बाद “वन रैंक, वन पेंशन" को समाप्त कर दिया था। इसके बाद से सैनिकों में इस निर्णय पर जबरदस्त आक्रोश  है और पूर्व सैनिक लंबे समय से “वन रैंक, वन पेंशन" ” की मांग कर रहे हैं। 2011 में भाजपा के वरिष्ठ  सदस्य भगत सिंह कोश्यारी  की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति ने तत्कालीन सरकार से अविलंब “वन रैंक, वन पेंशन"“ लागू करने की सिफारिश  की थी। मगर संप्रग सरकार इसे लागू नहीं कर पाई। और अब वही बहाने बनाकर मोदी सरकार सीमाओं के प्रहरियों से छल कर रही है। इससे मोदी सरकार की बदनीयत साफ झलक रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर पूर्व  सैनिक 80 दिन से संघर्ष  कर रहे हैं। पांच भूख हडताली अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं। और अब सरकार कहे कि हर साल पेंशन नहीं बदल सकती, सैनिकों के लिए  इससे ज्यादा दुखद स्थिति हो ही नहीं सकती। अपने 16 माह के कार्यकाल में मोदी सरकार एक भी चुनावी वायदा पूरा नहीं कर पाई है। “अच्छे दिन“ के वायदे से सरकार मुकर चुकी है और अब “वन रैंक, वन पेंशन" के वायदे से भी पीछे हट रही है। महंगाई पर सरकारी आकंडे कुछ भी कहें, महंगाई कम नहीं हुई है। और तो और कर्ज  भी सस्ता नही हुआ है जबकि दुनिया के कई देश  मंदी की चपेट में है और यूरोप में कर्ज  बेहद सस्ता है। कच्चे तेल की कीमतें घटने से, सरकार को काफी राहत मिली है, मगर न तो माल भाडा सस्ता हुआ है और न ही यात्री किराया। इन हालात में  पारदर्शी  सरकार और सुशासन के दावे दिल को चुभते हैं।