लैंड बिल पर सरकार की “लाचारी“
सोमवार को भूमि अधिग्रहण पर जारी अध्यादेश के लैप्स होते ही मोदी सरकार द्वारा संशोधित कानून स्वतः निरस्त हो गया । रविवार को आकाशवाणी द्वारा प्रसारित “मन की बात“ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संकेत दे दिए थे की सरकार चौथी बार भूमि अहिग्रहण पर अध्यादेश जारी नहीं करेगी। संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल को संसद द्वारा मंजूरी नहीं मिलने के कारण मोदी सरकार को तीन बार संशोधित बिल को कानून बनाने के लिए अध्यादेश जारी करने पडे थे। तीन-तीन अध्यादेश जारी के बावजूद सरकार संशोधित भूमि बिल को संसद से पारित नहीं करवा सकी। लोकसभा से तो यह बिल पारित करवा लिया गया था, क्योंकि निचले सदन में सरकार के पास पर्याप्त बहुमत था मगर राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण संशोधित बिल पारित नहीं हो सका। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल संशोधित बिल के खिलाफ थे। देश के किसान संगठन भी संशोधित बिल का मुखर विरोध कर रहे थे। मोदी सरकार ने कॉरपोरेट जगत की मांग पर 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल में समाहित 80 फीसदी भू-मालिकों की सहमति और सोशल इम्पैक्ट सर्वे जैसे किसान फ्रेंडली प्रावधान हटा लिए थे। संप्रग सरकार ने 2013 में लगभग 120 साल पुराने 1894 के भूमि अधिग्रहण बिल (लैंड एक्वीजीशन बिल-1894) को संशोधित करके इसमें कुछ क्रांतिकारी बदलाव किए थे। संशोधित कानून में जमीन मालिकों को मार्केट रेट पर मुआवजा देने, अधिग्रहण के लिए कम-से-कम 80 फीसदी किसानों की सहमति की अनिवार्यता और सोशल इम्पैक्ट रिपोर्ट बनाने के प्रावधान किए गए थे। इन संशोधनों के बाद देश में भूमि अधिग्रहण लगभग पूरी तरह से रुक गया था। कॉरपोरेट जगत को इस बात का गिला था कि 80 फीसदी सहमति वाले प्रावधान और सोशल इम्पैक्ट सर्वे की शर्तों के चलते भूमि का अधिग्रहण लगभग असंभव हो गया था। इससे देश में निवेश आना ही बंद हो गया था। बड़े और इंफरास्ट्रक्चर से संबंधित प्रोजेक्टस को काफी बडी जमीन की दरकार होती है मगर 2013 के संशोधित कानून बनने से जमीन मिलनी बंद हो गई थी। इसके अलावा निवेशकों का आकलन था कि मार्केट रेट पर जमीन का मुआवजा, उस पर सोशल इम्पैक्ट सर्वे की लागत और भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रकिया से कोई भी प्रोजेक्ट वाइबल नहीं रह गया था। मोदी सरकार सुधारों को लागू करके देश में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहती थी। देश में अगर निवेश आता है तो रोजगार का सृजन होता है। रोजगार बढने से आय बढती है और इससे आर्थिक खुशाहली आती है। मोदी सरकार का मकसद नेक था। दुनिया में तेजी से बढती अर्थव्यवस्थाएं निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। मोदी सरकार की विवशता यह है कि उसके पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं है। कांग्रेस समेत अधिकतर विपक्षी दल मोदी सरकार से महत्वपूर्ण मामलों में भी सहयोग करने को तैयार नहीं है। लैंड बिल के खिलाफ तो कांग्रेस राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन कर रही थी और किसान संगठन उसका साथ दे रहे थे। मोदी सरकार ने दीवारों पर लिखी इबारत पढ ली। भाजपा के सहयोगी दल भी 2013 के भूमि-अधिग्रहण बिल में संशोधन का विरोध कर रहे थे। भारत में हर छोटे-बडा निर्णय मैरिट की बजाय राजनीतिक हितों को सामने रख कर लिया जाता है। कोई भी सियासी दल किसानों को नाराज नहीं कर सकता। इसी बात के दृष्टिगत प्रधानमंत्री ने संशोधित बिल में किसानों के हित वाले 13 बिंदुओं का जिक्र किया है हालांकि 2013 के कानून में इनका उल्लेख है। इन बिंदुओं से संबंधित अधिसूचना दिंसबर, 2014 तक जारी हो जानी चाहिए थी। पिछले सप्ताह ही सरकार ने इसे जारी किया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार किसानों की कितनी चिंता करती है?
सोमवार को भूमि अधिग्रहण पर जारी अध्यादेश के लैप्स होते ही मोदी सरकार द्वारा संशोधित कानून स्वतः निरस्त हो गया । रविवार को आकाशवाणी द्वारा प्रसारित “मन की बात“ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संकेत दे दिए थे की सरकार चौथी बार भूमि अहिग्रहण पर अध्यादेश जारी नहीं करेगी। संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल को संसद द्वारा मंजूरी नहीं मिलने के कारण मोदी सरकार को तीन बार संशोधित बिल को कानून बनाने के लिए अध्यादेश जारी करने पडे थे। तीन-तीन अध्यादेश जारी के बावजूद सरकार संशोधित भूमि बिल को संसद से पारित नहीं करवा सकी। लोकसभा से तो यह बिल पारित करवा लिया गया था, क्योंकि निचले सदन में सरकार के पास पर्याप्त बहुमत था मगर राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण संशोधित बिल पारित नहीं हो सका। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल संशोधित बिल के खिलाफ थे। देश के किसान संगठन भी संशोधित बिल का मुखर विरोध कर रहे थे। मोदी सरकार ने कॉरपोरेट जगत की मांग पर 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल में समाहित 80 फीसदी भू-मालिकों की सहमति और सोशल इम्पैक्ट सर्वे जैसे किसान फ्रेंडली प्रावधान हटा लिए थे। संप्रग सरकार ने 2013 में लगभग 120 साल पुराने 1894 के भूमि अधिग्रहण बिल (लैंड एक्वीजीशन बिल-1894) को संशोधित करके इसमें कुछ क्रांतिकारी बदलाव किए थे। संशोधित कानून में जमीन मालिकों को मार्केट रेट पर मुआवजा देने, अधिग्रहण के लिए कम-से-कम 80 फीसदी किसानों की सहमति की अनिवार्यता और सोशल इम्पैक्ट रिपोर्ट बनाने के प्रावधान किए गए थे। इन संशोधनों के बाद देश में भूमि अधिग्रहण लगभग पूरी तरह से रुक गया था। कॉरपोरेट जगत को इस बात का गिला था कि 80 फीसदी सहमति वाले प्रावधान और सोशल इम्पैक्ट सर्वे की शर्तों के चलते भूमि का अधिग्रहण लगभग असंभव हो गया था। इससे देश में निवेश आना ही बंद हो गया था। बड़े और इंफरास्ट्रक्चर से संबंधित प्रोजेक्टस को काफी बडी जमीन की दरकार होती है मगर 2013 के संशोधित कानून बनने से जमीन मिलनी बंद हो गई थी। इसके अलावा निवेशकों का आकलन था कि मार्केट रेट पर जमीन का मुआवजा, उस पर सोशल इम्पैक्ट सर्वे की लागत और भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रकिया से कोई भी प्रोजेक्ट वाइबल नहीं रह गया था। मोदी सरकार सुधारों को लागू करके देश में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहती थी। देश में अगर निवेश आता है तो रोजगार का सृजन होता है। रोजगार बढने से आय बढती है और इससे आर्थिक खुशाहली आती है। मोदी सरकार का मकसद नेक था। दुनिया में तेजी से बढती अर्थव्यवस्थाएं निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। मोदी सरकार की विवशता यह है कि उसके पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं है। कांग्रेस समेत अधिकतर विपक्षी दल मोदी सरकार से महत्वपूर्ण मामलों में भी सहयोग करने को तैयार नहीं है। लैंड बिल के खिलाफ तो कांग्रेस राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन कर रही थी और किसान संगठन उसका साथ दे रहे थे। मोदी सरकार ने दीवारों पर लिखी इबारत पढ ली। भाजपा के सहयोगी दल भी 2013 के भूमि-अधिग्रहण बिल में संशोधन का विरोध कर रहे थे। भारत में हर छोटे-बडा निर्णय मैरिट की बजाय राजनीतिक हितों को सामने रख कर लिया जाता है। कोई भी सियासी दल किसानों को नाराज नहीं कर सकता। इसी बात के दृष्टिगत प्रधानमंत्री ने संशोधित बिल में किसानों के हित वाले 13 बिंदुओं का जिक्र किया है हालांकि 2013 के कानून में इनका उल्लेख है। इन बिंदुओं से संबंधित अधिसूचना दिंसबर, 2014 तक जारी हो जानी चाहिए थी। पिछले सप्ताह ही सरकार ने इसे जारी किया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार किसानों की कितनी चिंता करती है?






