श्रमिक हडताल की प्रांसगिकता
देश के 10 प्रमुख श्रमिक संगठनों द्वारा बुधवार को आहुत एक दिन की हडताल से जनजीवन प्रभावित हुआ है। श्रमिक मोदी सरकार की पूंजीपति (प्रो-बिजनेस) फ्रेंडली नीतियों का विरोध कर रहे हैं। राजधानी दिल्ली और हैदराबाद समेत कई शहरों में बसों, टैक्सियों और ऑटोरिक्शा के नहीं चलने से लोगों को खासी परेशानी उठानी पडी। हडताल वामंपंथी दलों से जुडे श्रमिक संगठनों-सीटू एवं एटक- के आहवान पर की गई थी, इसलिए पश्चिम बंगाल, केरल जैसे राज्यों में इसका असर काफी गहरा रहा। पश्चिम बंगाल और केरल को वामपंथियों का गढ माना जाता है। भाजपा से जुडे भारतीय मजदूर संघ और नेशनल फ्रंट ऑफ ट्रेड यूनियन इस हडताल से दूर रहे। बैंकिंग, इन्सोयरेंस, माइानिंग, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन से जुडे 15 करोड श्रमिकों ने बुधवार को एक दिन काम नहीं किया। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक को छोडकर देश के सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों और बीमा कंपनियों में पूरी तरह से हडताल रही। 23 राष्ट्रीयकृत , 12 निजी सेक्टर, 55 क्षेत्रीय और 13,000 सहकारी बैंकों के अलावा नाबार्ड, सिडबी और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारियों ने भी इस हडताल में हिस्सा लिया। इससे अधिकतर बैंकों में कोई कामकाज नही हुआ हालांकि एसबीआई के अलावा प्राइवेट सेक्टर के अग्रणी आईसीआईसी, एचडीएफसी और एक्सिस बैंक के खुले रहने से बैंकिग कारोबार पर ज्यादा असर नहीं पडा। देश के सबसे बडे राष्ट्रीयकृत स्टेट बैंक (एसबीआई) के खुले रहने से सरकारी लेनदेन पर भी कोई खास असर नहीं पडा। इस बार प्राइवेट सेक्टर के 12 बैंकों का हडताल से जुडना वामपंथी श्रमिक संगठनों के लिए बडी उपलब्धि है। हडताल में दिहाडीदार मजदूर, हॉकर्स और घरेलू श्रमिक भी शामिल हुए। पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को बेचने और श्रमिक कानूनों में प्रस्तावित बदलाव का श्रमिक संगठन मुखर विरोध कर रहे है। मोदी सरकार भी संप्रग सरकार की तरह सार्वजनिक कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर वित्तीय संसाधन जुटा रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने का वायदा कर रखा है। सुधारों के लिए देश में निवेश फ्रेंडली श्रम कानूनों (लेबर लॉ) की दरकार है। इस बात के दृष्टिगत , मोदी सरकार फैक्टरी इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, बोनस एक्ट और इंडस्ट्रियल रेलेशन्स एक्ट में बदलाव करना चाहती है। सरकार 40 साल से कम श्रमिक रखने वाली छोटी फैक्टरियों को श्रमिक कानूनों के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में है। श्रमिक संगठन श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलाव का मुखर विरोध कर रहे हैं। श्रमिक संगठनों का कहना है कि ऐसा करने से 75 फीसदी से ज्यादा श्रमिक कानूनी सुरक्षा कवच से बाहर हो जाएंगें और इससे उनका और ज्यादा शोषण होगा। श्रमिक संगठनों की इन बातों में दम है। देश में सख्त श्रमिक कानून होने के बावजूद उनका पालन नहीं होता है। अधिकांश छोटे और मझौले उधोग न तो श्रमिकों को वाजिब वेतन-भत्ते देते हैं और न ही इन्सेटिव। कानून, बोनस देना अनिवार्य है मगर अधिकांश उधोग बोनस नहीं देते। 20 से ज्यादा श्रमिक हायर करने आले व्यावसायिक संस्थानों को ईएसआई और कंट्रीब्यूट्री प्रोविडेंट फंड लागू करना अनिवार्य है मगर छोटे और मझौले उधोग एवं संसथान धडल्ले से इन कानूनों का उल्लघंन करते हैं। भ्रष्ट नौकरशाही अपनी जेब गर्म करके कानून तोडने वालों का ही साथ देती है। इन हालात में अगर श्रम कानूनों से छेडछाड की जाती है तो देश का असंगठित श्रमिक कहीं का नहीं रह जाएगा। देश के कुल वर्कफोर्स का 93 फीसदी असंगठित है। सरकार को पूंजीपतियों की बजाय इस विशाल वर्ग के हितों का ख्याल रखना चाहिए।
देश के 10 प्रमुख श्रमिक संगठनों द्वारा बुधवार को आहुत एक दिन की हडताल से जनजीवन प्रभावित हुआ है। श्रमिक मोदी सरकार की पूंजीपति (प्रो-बिजनेस) फ्रेंडली नीतियों का विरोध कर रहे हैं। राजधानी दिल्ली और हैदराबाद समेत कई शहरों में बसों, टैक्सियों और ऑटोरिक्शा के नहीं चलने से लोगों को खासी परेशानी उठानी पडी। हडताल वामंपंथी दलों से जुडे श्रमिक संगठनों-सीटू एवं एटक- के आहवान पर की गई थी, इसलिए पश्चिम बंगाल, केरल जैसे राज्यों में इसका असर काफी गहरा रहा। पश्चिम बंगाल और केरल को वामपंथियों का गढ माना जाता है। भाजपा से जुडे भारतीय मजदूर संघ और नेशनल फ्रंट ऑफ ट्रेड यूनियन इस हडताल से दूर रहे। बैंकिंग, इन्सोयरेंस, माइानिंग, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन से जुडे 15 करोड श्रमिकों ने बुधवार को एक दिन काम नहीं किया। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक को छोडकर देश के सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों और बीमा कंपनियों में पूरी तरह से हडताल रही। 23 राष्ट्रीयकृत , 12 निजी सेक्टर, 55 क्षेत्रीय और 13,000 सहकारी बैंकों के अलावा नाबार्ड, सिडबी और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारियों ने भी इस हडताल में हिस्सा लिया। इससे अधिकतर बैंकों में कोई कामकाज नही हुआ हालांकि एसबीआई के अलावा प्राइवेट सेक्टर के अग्रणी आईसीआईसी, एचडीएफसी और एक्सिस बैंक के खुले रहने से बैंकिग कारोबार पर ज्यादा असर नहीं पडा। देश के सबसे बडे राष्ट्रीयकृत स्टेट बैंक (एसबीआई) के खुले रहने से सरकारी लेनदेन पर भी कोई खास असर नहीं पडा। इस बार प्राइवेट सेक्टर के 12 बैंकों का हडताल से जुडना वामपंथी श्रमिक संगठनों के लिए बडी उपलब्धि है। हडताल में दिहाडीदार मजदूर, हॉकर्स और घरेलू श्रमिक भी शामिल हुए। पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को बेचने और श्रमिक कानूनों में प्रस्तावित बदलाव का श्रमिक संगठन मुखर विरोध कर रहे है। मोदी सरकार भी संप्रग सरकार की तरह सार्वजनिक कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर वित्तीय संसाधन जुटा रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने का वायदा कर रखा है। सुधारों के लिए देश में निवेश फ्रेंडली श्रम कानूनों (लेबर लॉ) की दरकार है। इस बात के दृष्टिगत , मोदी सरकार फैक्टरी इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, बोनस एक्ट और इंडस्ट्रियल रेलेशन्स एक्ट में बदलाव करना चाहती है। सरकार 40 साल से कम श्रमिक रखने वाली छोटी फैक्टरियों को श्रमिक कानूनों के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में है। श्रमिक संगठन श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलाव का मुखर विरोध कर रहे हैं। श्रमिक संगठनों का कहना है कि ऐसा करने से 75 फीसदी से ज्यादा श्रमिक कानूनी सुरक्षा कवच से बाहर हो जाएंगें और इससे उनका और ज्यादा शोषण होगा। श्रमिक संगठनों की इन बातों में दम है। देश में सख्त श्रमिक कानून होने के बावजूद उनका पालन नहीं होता है। अधिकांश छोटे और मझौले उधोग न तो श्रमिकों को वाजिब वेतन-भत्ते देते हैं और न ही इन्सेटिव। कानून, बोनस देना अनिवार्य है मगर अधिकांश उधोग बोनस नहीं देते। 20 से ज्यादा श्रमिक हायर करने आले व्यावसायिक संस्थानों को ईएसआई और कंट्रीब्यूट्री प्रोविडेंट फंड लागू करना अनिवार्य है मगर छोटे और मझौले उधोग एवं संसथान धडल्ले से इन कानूनों का उल्लघंन करते हैं। भ्रष्ट नौकरशाही अपनी जेब गर्म करके कानून तोडने वालों का ही साथ देती है। इन हालात में अगर श्रम कानूनों से छेडछाड की जाती है तो देश का असंगठित श्रमिक कहीं का नहीं रह जाएगा। देश के कुल वर्कफोर्स का 93 फीसदी असंगठित है। सरकार को पूंजीपतियों की बजाय इस विशाल वर्ग के हितों का ख्याल रखना चाहिए।






