बुधवार, 16 सितंबर 2015

Is India Moving Towards Deflation?

                                                    इन्फ्लेशन से  डेफलेशन   की ओर

थोक मुद्रा स्फीति (ड्ब्ल्यूपीआई-होलसेल प्राइस  इंडेक्स) में पिछले दस महीने से लगातार गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था के सुस्त पडने की आशंका बलवित  हो रही है। सोमवार को जारी आंकडों में बताया गया है कि अगस्त में थोक मुद्रा स्फीति  शून्य से भी 4.95 फीसदी नीचे आ गई थी। जुलाई में थोक मुद्रा स्फीति  शून्य से 4.05 फीसदी नीचे थी। नवंबर 2014 से थोक मुद्रा स्फीति में लगातार गिरावट आ रही है। रिटेल मुद्रा स्फीति भी गिरकर अगस्त में 3.66 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई थी। इसके स्पष्ट  अर्थ हैं कि भारत भी तेजी से अपस्फीति (डिफलेशन) की ओर अग्रसर हो रहा है। तथापि, मुद्रा स्फीति आंकने का यह मकडजाल आम आदमी की समझ से बाहर है। आटा-दाल, फल-सब्जी, दूध और अन्य खाद्य वस्तुए अभी भी काफी महंगी है। यहां तक कि इस बार मौसमी सब्जियों की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। प्याज 60 से 80 रु किलो बिक रहा है। दूग्ध उत्पाद लगातार महंगे हो रहे हैं और फलों की कीमतें  आसमान छू रही हैं। इसी कारण जुलाई में उपभोक्ता मूल्य सूचांक (कंज्युमर प्राइस इंडेक्स-सीपीआई) में 0. 1 फीसदी का उछाल आया है। 12 माह का ऑल आइटम इंडेक्स भी जुलाई में 0. 2 फीसदी बढा है। भारत में मुद्रा स्फीति का आकलन उपभोक्ता मूल्य सूचांक (सीपीआई)  की बजाय थोक मूल्य सूचांक (डब्ल्यूपीआई) से किया जाता है।  लगभग 435 कमोडीटीज पर आधारित डब्ल्यूपीआई में खाद्य वस्तुओं को कम वेटेज और फ्यूल  एव मैन्युफैक्चरिंग को  कहीं ज्यादा  वेटेज दिया जाता है। अब जबकि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है, थोक मुद्रा स्फीति का शून्य से नीचे आना स्वभाविक है। पैट्रोल और डीजल सस्ता होने के बावजूद खाद्य वस्तुओ की कीमतों में गिरावट नहीं आने की सबसे बडी वजह  है कि माल भाडे में कोई कमी नहीं आई है। तेल की कीमतें बढते ही माला भाडा बढाने में जरा भी विलंब नहीं किया जाता मगर कीमतें गिरने पर भाडा कम नहीं किया जाता। ऐसा क्यों  ? तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा सरकार, व्यापारी, ट्रांसपोर्टर और साधन सपन्न तबको को ही मिला है। सरकार के आयात बिल में भारी कमी आई क्योंकि 75 फीसदी आयात तेल होता है। दुनिया में आज भी सीपीआई को थोक मुद्रा स्फीति (डब्ल्यूपीआई) की तुलना में महंगाई आंकने का पुख्ता तरीका माना जाता है। सीपीआई से मुद्रा-स्फीति के रुझान का बेहतर आकलन किया जा सकता है। अब प्रश्न  यह है कि सरकार महंगाई को  सीपीआई की बजाए डब्ल्यूपीआई से ही क्यों आंकती है? इसकी प्रमुख वजह यह है कि डब्ल्यूपीआई के आंकडे हर सप्ताह मिल जाते हैं जबकि सीपीआई के आंकडे माहवार मिलते है। सरकार पहले हर सप्ताह डब्ल्यूपीआई के आंकडे जारी करती थी मगर अब माहवार जारी किए जा रहे हैं। सीपीआई का कोई एकीकृत इंडेक्स भी नहीं है। भारत में पहले चार सीपीआई हुआ करते थे। इस समय तीन सीपीआई हैं। औद्योगिक श्रमिकों के अलावा, एग्रीकल्चरल लेबर्स  और रुरल लेबर्स के लिए अलग-अलग कंज्युमर प्राइस इंडेक्स हैं। भारतीय रिजर्व  बैंक (आरबीआई) अपनी मौद्रिक नीति प्राइस इंडेकस के अनुसार निर्धारित करता है, इसलिए एकीकृत डब्ल्यूपीआई को ज्यादा कारगर और उपयोगी माना गया  है। बहरहाल, दस माह से मुद्रा स्फीति लगातार गिरने के बावजूद आरबीआई को ब्याज कम करने को तैयार नहीं है हालांकि अब उसके पास कर्ज सस्ता करने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। डिफ्लेशन से बचने के लिए  बाजार में मांग को उठाना बेहद जरुरी है। आरबीआई को बहुत पहले ऐसा कर लेना चाहिए था। इस समय रिटेल मुद्रा स्फीति आबीआई द्वारा निर्धारित 4 फीसदी के न्यूनतम स्तर से भी कम है। इस स्थिति में कर्ज  को सस्ता करके मांग को उठाया जा सकता। डिफ्लेशन की स्थिति खतरनाक होती है।